करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंकि बदला कैसे लें। देखा, इतनी चीजें एक-साथ आ गयीं । आप उलझ गये और ध्यान कहीं का कहीं चला गया। मानत नहीं मन मोरा साधो, मानत नहीं मन मोरा....... मन बहाए जा रहा है। कहीं कल्पनाओं में, कहीं इच्छाओं में। इच्छा करनी है, तो भी आत्मा का साथ चाहिए । आत्मा के बिना कुछ नहीं हो सकता। चित्त भी आत्मा के सहयोग बिना कुछ याद करने में सक्षम नहीं । इसलिए समझ आ गया तो मन को काबू करना मुश्किल नहीं है। मन की क्रिया स्वाभाविक नहीं है। आत्मा के साथ बिना कुछ नहीं हो सकता। स्वाँसा खुद नहीं चल रही है; आप ले रहे हैं; लेने के लिए एक क्रिया कर रहे हैं। वो कोई ले रहा है। आँखों के पीछे बैठ कोई चेतन ले रहा है। बस, जब आप इन पाँच बातों को देख लेंगे, मन वश में हो जाएगा और आप गुरु को समर्पित हो जायेंगे। तब ही आपका ध्यान जम सकेगा । ध्यान में यह मत सोचना कि अब यह दिखे, अब उडूं, अब चाँद दिखेगा, अब सूर्य दिखेगा। यह भी मन का खेल है। आप बस देखना कि यह मन कहाँ जा रहा है । मन को पकड़ना है; उसे ही मारना है । इसे ही कहते हैं 'मैं' को मारना । जब 'मैं' मर गयी तो समझो मन मर गया। इस मन को मारकर ही तो उस दुनिया में जाना है। जब मन के चारों रूपों – मन, बुद्धि, चित और अहंकार को हरकत नहीं करने दोगे तब वो पल आ जायेगा, जिसके लिए आप ध्यान करते हैं । भक्ति- भक्ति सब जगत बखाना, भक्ति भेद कोई बिरला जाना । आगे भक्त भये भव सारी,
करी भक्ति पर युक्ति न धारी ॥