भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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ऐसे करें सतगुरु भक्ति

क्यों करें गुरु भक्ति गुरु-भक्ति क्यों करें? क्या पड़ी है गुरु- सेवा की ? सीधा परमात्मा (परम- पुरुष) की भक्ति कर लेते हैं। आख़िर गुरु-भक्ति के लिए क्यों बोला गया ?

शिष्य को ऐसा चाहिए, गुरु रिझाय आपा खोई ॥

समझें। वो परमात्मा निर्द्वन्द्व है, मायातीत है, व्योमातीत है । उसकी तरंगें आपको नहीं समझा सकती हैं। वो आपको नहीं समझा सकता है । आप उसे नहीं समझ सकते हैं। जबकि गुरु माया में है, मन में है, इंद्रियों में है, इसलिए वो आपको समझा सकता है, आप उसे समझ सकते हैं। वो माया में रहते हुए भी माया से परे है । पर वो इसमें रह रहा है, इसलिए वो आपको ठीक से समझा सकता है, पर परमात्मा (परम - पुरुष ) आपको समझाने में सक्षम नहीं है। आप परम-पुरुष को समझ सकने में सक्षम नहीं हैं । इसलिए उसकी भक्ति करना चाँद पर पत्थर फेंकने की तरह है । साहिब ने तो धर्मदास से कहा कि परम-पुरुष की भक्ति का कोई मतलब नहीं है, कोई लाभ नहीं है। बेकार है उसकी भक्ति करना । जैसे सूर्य को आप स्थूल आँखों से नहीं देख सकते हैं। अँधेरा छा जायेगा। पर चंद्रमा की तरफ देख सकते हैं । उसमें जो प्रकाश है, वो भी सूर्य का ही है, पर वो सौम्य है । इस तरह गुरु सहज है । गुरु में वो सत्ता चेतन है । सत्य पुरुष की आरसी, संतन केरी देह । लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में लख

लेह ॥

इसलिए गुरु-भक्ति बोली । कैसे करें गुरु भक्ति जो-जो गुरु ने मना किया, वो कतई नहीं करना । वो मनमुखता है। जो- जो गुरु ने बताया, केवल वही करना । यही गुरुमुखता है। यही गुरु-भक्ति है ।