करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 193, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ें4-6 माइयों को उधर ही हत्या आ जाती थी । यहाँ पर तीन कार्रवाही करते हैं । पहला तो चिल्लाने वाला नाटक होता है, फिर डरावनी शक्ल बना लेते हैं और अंत में सिर घुमाना शुरू कर देते हैं। मैंने पहले सोचा कि यह यहाँ नयी किस्म की बीमारी है शायद। पहले तो लिहाज़ किया। फिर मैंने कहा कि यह सब नहीं चलेगा। दो-तीन तगड़ी लड़कियों को तैयार किया; कहा कि जो भी ऐसा करे, उसका जूड़ा पकड़कर कसना । उसके बाद कोई नहीं करता है यह नाटक। तो हम कह रहे हैं कि नाम की ताक़त आयेगी तो भूत-प्रेतों से तो छुटकारा मिलेगा ही, पुरखों का भी कल्याण हो जायेगा । हमारी न तो शिवजी से लड़ाई है और न ही हनुमान जी से कोई झगड़ा है। न तो हम कंस हैं कि कृष्ण जी से कोई युद्ध चल रहा है और न रावण हैं कि राम जी से लड़ाई है। मैं भैरो हूँ कि माता जी से कोई लड़ाई चल रही है। ये तो लोगों ने कहानियाँ बनाई हुई हैं। एक माई मुझे मानती थी, पर उसने दीक्षा नहीं ली थी। परिवार के लोग लिए थे। माई भक्तिन थी । जैसे बंदे चेतन हैं, ऐसे ही माताएँ भी चेतन हैं । जैसे बंदे झंझटी हैं, ऐसे माताएँ भी झंझटी हैं। जैसे बंदे झगड़ालू हैं, ऐसे माताएँ भी हैं। मैं दोनों को समान मानता हूँ। तो माता ने सवाल किया कि ख़ानदान में मैंने यह चीज़ देखी कि जब भी कोई काम बन जाता था, पूरा होने वाला होता था तो अंत में आकर बिगड़ जाता था । पूर्वजों के पीछे ऐसी ताक़तें लगी थीं। यही बात दादा की थी, यही बात मैंने पिता में भी देखी और यही बात अपने साथ भी देख रही हूँ । दादा जी को भी देखा। उनको भी यही समस्या थी । बाप के साथ भी यही समस्या आती थी । यह काम मैंने अपने जीवन में भी देखा । जब काम होने लगता है तो अंत में बिगड़ जाता है। उसने कहा कि बताओ कि क्या मामला है ? जब मैं गहराई में उतरा तो एक आदमी को पकड़ा। जैसे पुराने जमाने में कुएँ में कुछ गिर जाए तो बिल्ली भेजते थे । रस्सी से बाँधकर भेजते थे । उसमें कुण्डे लगे होते थे। तो वो घुमाते थे। जो चीज़ होती थी, किसी में फँस जाती थी। तो मैंने भी ऐसा किया; देखा कि कारण क्या है । निराकार रूप में एक बंदा था। मैंने उसे पकड़कर ऊपर किया, कहा कि तू है ? कहा- हाँ । मैंने कहा कि तू क्या करता है ? कहा कि अंत में दिमाग़ में बैठकर पूरी गड़बड़ कर देता हूँ। वो इतनी बारीकी से काम करता था कि पता ही नहीं चलता था।