भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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नाम के साथ ही आपके पितरों का भी कल्याण हो जाता है, इसलिए उनके कल्याण के लिए भी चिंता नहीं करनी है। श्राद्ध आदि जो किया जाता है, जरुरी नहीं है। मृत्यु-लोक का एक वर्ष पितर-लोक का एक दिन होता है । जिसे नाम मिल जाता है, उसकी 71 पीढ़ी तर जाती है। इसलिए अब पितरों के कल्याण के लिए कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है । फिर किसी भी तरह से पितरों की भक्ति न हो, यह भी ध्यान रखना है । वासुदेव कृष्ण ने भी अर्जुन को यही शिक्षा दी थी कि तू देवताओं की भक्ति मत कर, पितरों की भक्ति भी मत कर, प्रेतों की भक्ति भी मत कर, तू केवल मुझमें समा । क्योंकि वे अर्जुन के गुरु थे। इसलिए चाहे आपके पितर स्वर्ग - लोक, पितर- लोक आदि में चले गये हों या प्रेतात्मा बनकर भटक रहे हों, उनके लिए कुछ चिंता नहीं करना। फिर आपके जो पितर नाम लेकर शरीर छोड़ दिये हैं, वो तो अमर-लोक में गये हैं और वहाँ कोई भूख, प्यास आदि भी नहीं है, इसलिए उनके लिए भोजन भेजने की चिंता मत करो। फिर यह पितरों की भक्ति भी हो जायेगी । इसलिए गुरु में ही ध्यान रखना । ऐसे व्रत, तिथि-त्यौहार आदि, जिनमें काल या बाहरी अन्य भक्ति के काम करने होते हैं, कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है। आपको सब भ्रमों, बाहरी भक्ति और वहमों से आज़ाद कर दिया है। अब गुरु के अलावा कहीं भी मन को नहीं लगाना । कोई भी काम ऐसा नहीं करना, जिससे आपकी भक्ति दूषित हो, जिससे गुरुजन नाराज़ हों । अन्यान्य भी पूजने की ज़रूरत नहीं है । यह इसलिए कि आपका ध्यान दूसरी जगह न लगे । यह भी अन्य भक्ति में आ जाता है। आपको तो बस गुरु की ही भक्ति करनी है, गुरु को ही रिझाना है। सुक्खन आदि नहीं करनी है । यदि नाम से पहले की हो तो भी उसे पूरा करने की ज़रूरत अब नहीं है, क्योंकि सब पिछले कर्म काट दिये गुरुने। माता जी से या किसी और से हमारी लड़ाई नहीं है, पर यह केवल इसलिए कि आपका ध्यान, आपका भरोसा एक जगह पर रहे, जगह-जगह भटके नहीं। तभी गुरु भक्ति जमेगी, तभी आपका ध्यान भी जमेगा, तभी आप सत्लोक जा पायेंगे ।