करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुर्मति भाजे पातक नाशे ॥
दुर्मति भाग जायेगी। पापों को नाश हो जायेगा । सुभागा यानी भाग्यवान । सद्गुरु की सेवा सफल है । यह तीनों तरह से होनी चाहिए । एक जगह साहिब शिष्य के चार धर्म बता रहे हैं । शिष्य में चार धर्म होने चाहिए। पहला-
तन मन धन से गुरु की सेवा ॥
क्योंकि गुरु की सेवा दूसरे के लिए परमात्म-तत्व तक पहुँचने का रास्ता प्रश्स्त करती है। इसलिए धर्म - शास्त्रों में गुरु-सेवा के लिए बोला। गुरु के दिल में अपने लिए खास जगह बनानी हो तो सेवा करना, नहीं तो कभी नहीं बन पायेगी जिंदगी में । नानक देव ऐसे ही नहीं कह रहे हैं- 'सुसेवा बस साहिबा ।' साहिब वाणी में कह रहे हैं-
नामवंत बहुते मिले, ध्यानवंत अनेक ।
कहैं कबीर धर्मदास से, गुरुवंता कोई एक ॥
दूसरा—
सेवा में विषय को त्यागे ॥
अर्थात उसका रहन-सहन विषयों से रहित हो । दिन-भर नाटक करता रहे, विषय-विकारों में उलझा रहे और सोचे कि भक्त हूँ तो यह नहीं है । उसका चाल-चलन अलग होना चाहिए; उसकी जीवन-शैली अलग रहे। तीसरा-
मन में अहंकार न आने ॥
मन में सेवा का घमण्ड भी न रहे । चौथा-
गुरु के शब्द प्रतीती ॥
साहिब कह रहे हैं—
गुरु आज्ञा ले आवही, गुरु आज्ञा ले जाहीं ।
कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक डर नाहीं ॥
गुरु समरथ जेहि सम खड़े, कमी काहू को दास ।
रिद्धि सिद्धि सेवा करें, मुक्ति न छाड़े साथ ॥
इसलिए भरोसा हो। ये चार धर्म होने चाहिए शिष्य में। इनमें से दो सर्वोपरि हैं ।