भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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दुर्मति भाजे पातक नाशे ॥

दुर्मति भाग जायेगी। पापों को नाश हो जायेगा । सुभागा यानी भाग्यवान । सद्गुरु की सेवा सफल है । यह तीनों तरह से होनी चाहिए । एक जगह साहिब शिष्य के चार धर्म बता रहे हैं । शिष्य में चार धर्म होने चाहिए। पहला-

तन मन धन से गुरु की सेवा ॥

क्योंकि गुरु की सेवा दूसरे के लिए परमात्म-तत्व तक पहुँचने का रास्ता प्रश्स्त करती है। इसलिए धर्म - शास्त्रों में गुरु-सेवा के लिए बोला। गुरु के दिल में अपने लिए खास जगह बनानी हो तो सेवा करना, नहीं तो कभी नहीं बन पायेगी जिंदगी में । नानक देव ऐसे ही नहीं कह रहे हैं- 'सुसेवा बस साहिबा ।' साहिब वाणी में कह रहे हैं-

नामवंत बहुते मिले, ध्यानवंत अनेक ।

कहैं कबीर धर्मदास से, गुरुवंता कोई एक ॥

दूसरा—

सेवा में विषय को त्यागे ॥

अर्थात उसका रहन-सहन विषयों से रहित हो । दिन-भर नाटक करता रहे, विषय-विकारों में उलझा रहे और सोचे कि भक्त हूँ तो यह नहीं है । उसका चाल-चलन अलग होना चाहिए; उसकी जीवन-शैली अलग रहे। तीसरा-

मन में अहंकार न आने ॥

मन में सेवा का घमण्ड भी न रहे । चौथा-

गुरु के शब्द प्रतीती ॥

साहिब कह रहे हैं—

गुरु आज्ञा ले आवही, गुरु आज्ञा ले जाहीं ।

कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक डर नाहीं ॥

गुरु समरथ जेहि सम खड़े, कमी काहू को दास ।

रिद्धि सिद्धि सेवा करें, मुक्ति न छाड़े साथ ॥

इसलिए भरोसा हो। ये चार धर्म होने चाहिए शिष्य में। इनमें से दो सर्वोपरि हैं ।