करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुरु सेवा बाकी निश्चय कर ॥
पहला गुरु की सेवा और फिर गुरु शब्द का भरोसा । यानी बचन का भरोसा।
जो कोई गहे चले यम जीती ॥
जो इन दोनों को धारण कर लेगा, संसार - सागर को जीतकर अपने ठिकाने चल पड़ेगा। गुरु शिष्य और ईश्वर, मिल कीना भक्ति विवेक । तीनों त्रिधारा बनीं, आगे गंगा
एक ॥
गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह | बिलगाए बिलगे नहीं, एक रूप दो
देह ॥
साहिब ने तो यहाँ तक कह दिया-
गुरु का कथन मान सब लीजे । सत्य असत्य विचार न कीजे ।।
कह रहे हैं कि गुरु की हर बात को मान लेना । उसपर अपनी अक्ल नहीं लड़ाना कि ठीक है या गलत। जैसे फसल के लिए जमीन उत्तम होनी चाहिए, किसान को ज्ञान होना चाहिए। इस तरह नाम - प्राप्ति के बाद शिष्य उत्तम हो । खेलना हो तो खेलिए, पक्का होकर खेल । कच्ची सरसों पेर के, खड़ी भया न
तेल ॥
सत्संग में आएँ जितनी देर आप सत्संग में बैठे हैं, यह गुरु-भक्ति में शुमार होगा। यह ध्यान - भजन से भी बढ़कर है। जब तक सत्संग न मिला, भक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती है। गोस्वामी जी कह रहे हैं—
भक्ति स्वतंत्र सकल गुण खानी । बिनु सत्संग न पावत प्राणी ॥
भक्ति निरुपण विविध विधाना । क्षमा दया सत शील निधाना ॥
भक्ति वो है, जिसके अंदर सद्गुण रूपी फल लगता है। अब सत्संग क्या है ? हमने किस्से-कहानियों को सत्संग मान लिया। कथा यानी जो हो चुका । साहिब ने बड़ा प्यारा कहा-
माला लक्कड़ पूजा पत्थर, तीरथ है सब पानी ।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, चारों वेद कहानी ॥