करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवो : सत्संग नहीं सुनता हूँ।
: यह दर्शन की ताक़त है । वो : हाँ! दर्शन बहुत करता हूँ । सच यह था कि मैं जल्दी यह बात बोलना नहीं चाहता था, पर अंत में मजबूर होकर यह कहना पड़ा मुझे। दर्शन से बड़ी उर्जा मिलती है। ध्यान तो दर्शन न कर पाने के विकल्प में किया जाता है | जब हम संत-सद्गुरुओं के पास जाते हैं तो तीन तरह से यह आध्यात्मिक ऊर्जा हमें प्राप्त होती है । दृष्टि द्वारा: सबसे पहले जब गुरुजनों की दृष्टि हम पर पड़ती है तो वह आध्यात्मिक ऊर्जा हमारे अन्दर आती है । इसलिए हम गुरुजनों के पास जाकर कहते हैं कि कृपा की दृष्टि रखना । देखो, गाँधारी ने दृष्टि से ही तो दुर्योधन के शरीर को वज्र के समान किया था न ! यानी दृष्टि से दिव्य शक्तियाँ चल सकती हैं तो आध्यात्मिक शक्तियाँ क्यों नहीं चलेंगी ! वाणी द्वारा: फिर दूसरे वाणी द्वारा ये शक्तियाँ हम तक पहुँचती हैं। इसलिए सत्संग का बड़ा महत्व है । 'धन्य घड़ी जब हो सत्संगा'। आपने सुना होगा कि फलाने ऋषि ने शाप देकर फलाने को भस्म कर दिया। यानी वाणी द्वारा दिव्य शक्तियाँ चलीं। इस तरह आध्यात्मिक शक्तियाँ भी चलती हैं। स्पर्श द्वारा: इसी तरह तीसरे यह उर्जा हमें स्पर्श द्वारा भी मिलती है। कहीं भी स्पर्श करके यह उर्जा ली जा सकती है, पर अदब के लिए केवल पाँव छूना ही नियम बना दिया गया। इसी कारण से गुरु-दर्शन का इतना महत्त्व है । जब भी गुरु-जन हमारे निकट हों तो हमें उनका दर्शन करते रहना चाहिए। इसलिए साहिब कह रहे हैं-
कई बार न होइ सके, दोय वक्त कर लेइ ।
सद्गुरु दर्शन के किये, काल दग़ा नहि देइ ॥
कह रहे हैं कि दिन में ज़्यादा बार नहीं हो सके तो दो बार ही कर लो । इससे काल का ज़ोर नहीं चल सकेगा। लेकिन यदि इतना भी सम्भव न हो सके तो इस पर साहिब कह रहे हैं-