करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिद्धि भी आ जाए तो भी समझो पूर्ण नहीं हुआ । ओह ! अभी भी अपूर्ण ही रहा । जो कोइ कहे पुरुष अविनाशी, ज्योति स्वरूप लखावेगा।
वेद विविध के मारग छाने, तन लक्कड़ करि डारेगा ।
तबहूँ नाहिं गुरु कै बच्चा, अबहीं कच्चा रे कच्चा॥
यदि चारों वेदों का ज्ञान हो जाए; तपस्या करके तन को लकड़ी कर दे, तो भी साहिब कह रहे हैं कि अभी पूर्ण नहीं हुआ। वाह ! अभी भी 'कच्चा रे कच्चा ।' फिर कह रहे हैं- जोगी होयके जोग कमावे, रोम रोम करि छानेगा।
तीन लोक में कछु न छोड़े, पूरा जोग कमावेगा ।
तबहूँ नाहीं गुरु कै बच्चा, अबहीं कच्चा रे कच्चा ॥
कितना भी योग क्यों न कर ले। इतनी शक्ति आ जाए कि तीन- लोक में कहीं भी पहुँच जाए, तो भी समझो – ' तबहूँ नाहीं - गुरु कै बच्चा, अबहीं कच्चा रे कच्चा ।' आगे कह रहे हैं- एक शून्य को कौन कहावै, सात शून्य ले जावेगा ।
महाशून्य पर आसन मारे, सोहं का घर पावेगा ।
तबहूँ नाहीं गुरु कै बच्चा, अबहीं कच्चा रे कच्चा ॥
शून्य से ऊपर महाशून्य में भी पहुँच जाए; सोहं की प्राप्ति भी कर ले तो भी अपूर्ण ही रहेगा । वाह ! इतना कुछ करने के बाद भी पूर्ण नहीं हुआ। क्यों! क्योंकि अभी भी सद्गुरु से मिलने वाली मूल उर्जा नहीं मिल पाई । तभी तो कह रहे हैं- जोग भोग से न्यारा होवै, निः अक्षर नहिं भावैगा । हद बेहद अजपा से भागे, निज स्वरूप को पावैगा
अब भया रे गुरु कै बच्चा, अब पक्का रे पक्का ॥
कहैं 'कबीर' ठहर पद अपने, जो तीन काल नहिं नासत । नाम रूप यश जोड़ा बहुतै; परखत छूटै साँसत ।
अब भया रे गुरु कै बच्चा, अब पक्का रे पक्का ॥