करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 213, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंयोग और भोग-दानों से ऊपर उठकर जब सद्गुरु द्वारा 'नाम' की प्राप्ति करेगा, तभी गुरु का बच्चा बन सकेगा, तभी पूर्ण हो पायेगा; अन्यथा कच्चा ही रह जायेगा, अपूर्ण ही रह जायेगा । इसका मतलब है कि गुरु ने जो 'नाम' दिया, वो मूल आध्यात्मिक उर्जा थी। उसके बिना जीव संसार-सागर से पार नहीं हो सकता। गुरु के दर्शन से यह उर्जा बढ़ती जाती है। ध्यान करने पर भी यह उर्जा हमें मिल सकती है, पर यदि गुरुजन साक्षात् सामने हों तो यह उर्जा अधिक प्राप्त होती है। ध्यान तो दर्शन न कर पाने के विकल्प के रूप में किया जाता है। ध्यान में भी तो हम गुरुजनों की मूरत को चित्त में बिठाने का प्रयास करते हैं और यह उर्जा प्राप्त करते हैं। पर यदि गुरुजन सामने हों तो सीधे यह उर्जा हमें मिल जाती है । इसलिए शास्त्रानुसार यदि गुरुजन सामने हों तो हमें उनके समक्ष आँखें बंद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि तब हमें सीधे-सीधे यह उर्जा मिल रही होती है; उस समय ध्यान की कोई आवश्यकता नहीं । इसलिए गुरु - दर्शन के महत्त्व को समझाते हुए साहिब आगे कह रहे हैं-
बार-बार न करि सके, पक्षे पक्ष करे सोय ।
कहै कबीर ता दास का जन्म सुफल ही होय ॥
कह रहे हैं कि यदि हफ्तें में एक बार भी सम्भव न हो सके तो फिर 15-15 दिन में ही कर लो; जीवन सफल हो जायेगा । पर किसी कारणवश इतना भी सम्भव नहीं हो पाता है। कई परेशानियों, दुनिया के झंझटों में मनुष्य उलझा रहता है। तो फिर ... ! फिर उसके लिए भी साहिब आगे बोल रहे हैं।
पक्षे पक्ष न करि सके, मास-मास करु जाय ।
यामें देर न लाइये, कहैं कबीर समुझाय ।।
कह रहे हैं कि फिर महीने में एक बार ज़रूर कर लो। साहिब सतर्क करते हुए समझा रहे हैं कि महीने में एक दिन गुरु के दर्शन को पहुँचना ही पहुँचना है। कमी तो आ जाएगी; मन का ज़ोर भी बढ़ जायेगा; पर फिर भी यदि महीने में एक बार भी गुरु का दर्शन कर लिया तो वो उर्जा मिलते ही कमी पूरी होनी शुरू हो जायेगी।