करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिन परिस्थितियों में हम गुरु का दर्शन नहीं कर पाते हैं, उन परिस्थितियों में हमें गुरु का ध्यान करना चाहिए । सम्भव हो सके तो गुरु का दर्शन करना चाहिए, पर यदि ऐसा सम्भव न हो सके तो फिर उसका विकल्प है—‘ध्यान'। पर दर्शन तो फिर भी करने - ही करने हैं। अगर कुछ भक्त-जन, जो गुरु से बहुत दूर हों, किराए के पैसे भी न जुटा पाते हों, तो उनकी मजबूरी को समझते हुए साहिब कह रहे हैं—
मास-मास ना करि सके, छठे मास अलबत्त ।
या में ढील न कीजिये, कहै कबीर अविगत्त ॥
फिर छह महीने में एक बार कर लो; पर इसमें ढील न बरतना। क्योंकि यदि इसमें ढील बरती तो वो उर्जा कम हो जायेगी, जिससे आत्मा कुंद हो जायेगी। फिर ग़लतियाँ भी होने लग जायेंगी । लेकिन कुछ भक्त- जन, जो गुरु से इतनी ज़्यादा दूर हों कि छठे महीने में पहुँचना भी जिनके लिए सम्भव न हो सके तो केवल उनके लिए अंतिम विकल्प देते हुए साहिब कह रहे हैं—
छठे मास न करि सके, बरस दिना करि लेहि ।
कहै कबीर सो सन्त जन, यमहिं चुनौती देहि ॥
कह रहे हैं कि ऐसे भक्त - जन, जो छठे मास में भी गुरु दर्शन को न पहुँच सकें, वे बरस में एक बार ज़रूर गुरु का दर्शन करें। ऐसे भक्त - जन भी यम को चुनौती दे सकते हैं अर्थात् उनका आवागमन भी मिट सकता है। लेकिन यदि कोई ऐसा भी न कर सके यानी वर्ष में एक बार भी गुरु-दर्शन को न पहुँचे तो उस अभागे के लिए साहिब के पास भी कोई विकल्प नहीं है-
बरस बरस न कर सके, ताको लागे दोष ।
कहै कबीर वा जीव सो, कबहुँ न पावे मोक्ष॥