भारतकोश
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करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

योग और भोग-दानों से ऊपर उठकर जब सद्गुरु द्वारा 'नाम' की प्राप्ति करेगा, तभी गुरु का बच्चा बन सकेगा, तभी पूर्ण हो पायेगा; अन्यथा कच्चा ही रह जायेगा, अपूर्ण ही रह जायेगा । इसका मतलब है कि गुरु ने जो 'नाम' दिया, वो मूल आध्यात्मिक उर्जा थी। उसके बिना जीव संसार-सागर से पार नहीं हो सकता। गुरु के दर्शन से यह उर्जा बढ़ती जाती है। ध्यान करने पर भी यह उर्जा हमें मिल सकती है, पर यदि गुरुजन साक्षात् सामने हों तो यह उर्जा अधिक प्राप्त होती है। ध्यान तो दर्शन न कर पाने के विकल्प के रूप में किया जाता है। ध्यान में भी तो हम गुरुजनों की मूरत को चित्त में बिठाने का प्रयास करते हैं और यह उर्जा प्राप्त करते हैं। पर यदि गुरुजन सामने हों तो सीधे यह उर्जा हमें मिल जाती है । इसलिए शास्त्रानुसार यदि गुरुजन सामने हों तो हमें उनके समक्ष आँखें बंद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि तब हमें सीधे-सीधे यह उर्जा मिल रही होती है; उस समय ध्यान की कोई आवश्यकता नहीं । इसलिए गुरु - दर्शन के महत्त्व को समझाते हुए साहिब आगे कह रहे हैं-

बार-बार न करि सके, पक्षे पक्ष करे सोय ।

कहै कबीर ता दास का जन्म सुफल ही होय ॥

कह रहे हैं कि यदि हफ्तें में एक बार भी सम्भव न हो सके तो फिर 15-15 दिन में ही कर लो; जीवन सफल हो जायेगा । पर किसी कारणवश इतना भी सम्भव नहीं हो पाता है। कई परेशानियों, दुनिया के झंझटों में मनुष्य उलझा रहता है। तो फिर ... ! फिर उसके लिए भी साहिब आगे बोल रहे हैं।

पक्षे पक्ष न करि सके, मास-मास करु जाय ।

यामें देर न लाइये, कहैं कबीर समुझाय ।।

कह रहे हैं कि फिर महीने में एक बार ज़रूर कर लो। साहिब सतर्क करते हुए समझा रहे हैं कि महीने में एक दिन गुरु के दर्शन को पहुँचना ही पहुँचना है। कमी तो आ जाएगी; मन का ज़ोर भी बढ़ जायेगा; पर फिर भी यदि महीने में एक बार भी गुरु का दर्शन कर लिया तो वो उर्जा मिलते ही कमी पूरी होनी शुरू हो जायेगी।

जिन परिस्थितियों में हम गुरु का दर्शन नहीं कर पाते हैं, उन परिस्थितियों में हमें गुरु का ध्यान करना चाहिए । सम्भव हो सके तो गुरु का दर्शन करना चाहिए, पर यदि ऐसा सम्भव न हो सके तो फिर उसका विकल्प है—‘ध्यान'। पर दर्शन तो फिर भी करने - ही करने हैं। अगर कुछ भक्त-जन, जो गुरु से बहुत दूर हों, किराए के पैसे भी न जुटा पाते हों, तो उनकी मजबूरी को समझते हुए साहिब कह रहे हैं—

मास-मास ना करि सके, छठे मास अलबत्त ।

या में ढील न कीजिये, कहै कबीर अविगत्त ॥

फिर छह महीने में एक बार कर लो; पर इसमें ढील न बरतना। क्योंकि यदि इसमें ढील बरती तो वो उर्जा कम हो जायेगी, जिससे आत्मा कुंद हो जायेगी। फिर ग़लतियाँ भी होने लग जायेंगी । लेकिन कुछ भक्त- जन, जो गुरु से इतनी ज़्यादा दूर हों कि छठे महीने में पहुँचना भी जिनके लिए सम्भव न हो सके तो केवल उनके लिए अंतिम विकल्प देते हुए साहिब कह रहे हैं—

छठे मास न करि सके, बरस दिना करि लेहि ।

कहै कबीर सो सन्त जन, यमहिं चुनौती देहि ॥

कह रहे हैं कि ऐसे भक्त - जन, जो छठे मास में भी गुरु दर्शन को न पहुँच सकें, वे बरस में एक बार ज़रूर गुरु का दर्शन करें। ऐसे भक्त - जन भी यम को चुनौती दे सकते हैं अर्थात् उनका आवागमन भी मिट सकता है। लेकिन यदि कोई ऐसा भी न कर सके यानी वर्ष में एक बार भी गुरु-दर्शन को न पहुँचे तो उस अभागे के लिए साहिब के पास भी कोई विकल्प नहीं है-

बरस बरस न कर सके, ताको लागे दोष ।

कहै कबीर वा जीव सो, कबहुँ न पावे मोक्ष॥

11. सहज मार्ग है हमारा

सहज-मार्ग है हमारा

परमात्म-तत्व की प्राप्ति के लिए तीन सूत्र नज़र आ रहे हैं- 1. योग - मार्ग 2. ज्ञान - योग 3. भक्ति - योग कोई योग-मार्ग बोल रहा है, कोई ज्ञान - योग बोल रहा है तो कोई भक्ति-योग बोल रहा है। तीन मार्ग दिखाई दे रहे हैं। अगर खामोशी से देखें तो दुनिया में जितने भी लोग हैं, इन तीन रास्तों का अनुकरण कर रहे हैं । ये तीनों मार्ग नज़र आ रहे हैं । इस तीन सूत्रों पर अच्छी तरह से चिंतन करना होगा । इन तीन पर चलकर हम कहाँ पहुँच सकते हैं! क्या है योग-मार्ग अंदर की दुनिया में जाने के लिए तीन सूत्र हैं - मीन, पपील और विहंगम । इस तरह काफ़ी लोग योग, कमाई की बात कर रहे हैं । जब भी योग या ध्यान की तरफ चलेंगे तो पंच मुद्राएँ हैं। योग पंच मुद्राओं की तरफ है। भारत के बड़े-बड़े जो पंथ हैं, वो इन्हीं की ओर इशारा कर रहे हैं। पर क्या चाचरी मुद्रा से परम-मोक्ष की प्राप्ति मिल जायेगी ? साहिब ने आपेक्ष किया, कहा कि नहीं होगा ऐसा । कुछ शक्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं, लेकिन इस योग मुद्रा से हम परम तत्व की प्राप्ति कतई नहीं कर सकते हैं । इससे हम अंदर की विरोधी शक्तियों से बाहर नहीं निकल सकते हैं। बड़े-बड़े योगियों ने बड़ी कठिन तपस्याएँ की, पर विरोधी शक्तियों ने आगे नहीं बढ़ने दिया। पराशर आदि बड़ी तपस्याएँ करके भी काम को नहीं जीत पाए । कपिल मुनि आदि की तपस्या भी क्रोध ने समाप्त कर दी। इस तरह पता चल रहा है कि जिनके द्वारा आत्मा आच्छादित है, उनको हम योग आदि के द्वारा काबू में नहीं

कर सकते हैं। क्योंकि घोर साधनाएँ करने वाले भी इनसे प्रभावित हुए।

जब तक मनुष्य मन-माया के नियंत्रण में है, तब तक मोक्ष का प्रश्न ही नहीं उठता है । साहिब कह रहे हैं- हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई ।

पाँच पचीस तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई ॥

आपका बैरी मन के अलावा और कोई नहीं है । इसलिए योग की क्रियाओं के द्वारा मन को नहीं जीत सकते हैं । जब भी कोई साधना पर चले तो उसे चिंतन करना होगा कि प्राप्त क्या होगा और सही सूत्र क्या है ! पंच मुद्राओं में कुछ ओंकार का नाम जपते हैं। ओंकार निरंजन का ही नाम है। पर सच्चा नाम गुप्त है । इसलिए ओंकार के द्वारा परम तत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती है। इस तरह सोहं के द्वारा भी परम तत्व को नहीं पाया जा सकता है। साहिब कह रहे हैं- जो जन होइहैं जौहरी, शब्द लेहु बिलगाय । सोहं सोहं जप मुआ,

मिथ्या जन्म गँवाय॥

सोहं शब्द के विशेषज्ञ शुकदेव जी थे, पर उन्हें आगे का रास्ता तय करने के लिए उनमुनि मुद्रा में जाना पड़ा। उन्हें राजा जनक से दीक्षा लेनी पड़ी। राजा जनक उनमुनि मुद्रा के विशेषज्ञ थे, पर उन्हें भी आगे की मंजिल तय करने के लिए अष्टावक्र के पास जाना पड़ा। फिर आगे ररंकार शब्द है, जो दसवें द्वार की ओर जाता है । ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि यह साधना करते हैं, पर साहिब कह रहे हैं— ब्रह्मा विष्णु महेशादि ले, ररंकार को जाना।

उसके आगे पुरुष पुरातन, उसकी ख़बर न जाना ॥

दसवें द्वार के खुलने पर भी यह आत्मा काल के दायरे से बाहर नहीं निकल सकती है। सिद्ध साध त्रिदेवादि ले, पाँच शब्द में अटके ।

मुद्रा साध रहे घट भीतर, फिर औंधे मुँह लटके ॥

बार-बार मृत्यु लोक में आना पड़ता है । इस तरह कोई भी मुद्रा, जो हमारे ऋषि-मुनि, योगी, योगेश्वर आदि कर रहे थे, हमें अमर - लोक यानी महानिर्वाण की ओर नहीं ले जा सकती है ।

इन मुद्राओं से हम कतई अमर - लोक नहीं जा सकते हैं। इसलिए साहिब ने तथा संतों ने ऋषि-मुनियों, पीर पैगंबरों आदि का उदाहरण नहीं दिया, देव- चरित्र पर भी ज़्यादा व्याख्या नहीं की। क्या निंदा की ? नहीं, वो कह रहे हैं कि ये सब तीन-लोक के दायरे में हैं । साहिब की वाणी कह रही है कि पहले जितने भी लोग आए, तीन- लोक तक ही गये, आगे का यात्रा कोई नहीं कर पाया। आप देखें कि हॉलिकाप्टर पर बैठकर मंगल पर जाने की सोचें तो नहीं हो पायेगा न! उसकी क्षमता से बाहर है । इस तरह पंच मुद्राओं की क्षमता से बाहर है वो देश। इसलिए साहिब ऋषि-मुनियों के ज़्यादा उदाहरण नहीं दे रहे हैं। इसलिए उनका विरोध भी हुआ। क्योंकि हम जन्म-जन्मांतरों से जिन सूत्रों पर चलते आ रहे हैं, जिन सूत्रों को हमने बड़ी देर से पकड़ रखा है, उनसे आगे या उनसे हटकर नहीं जाना चाहते हैं । हमारे दिल में भय उत्पन्न होता है कि कहीं पाप न लग जाए। .....तो संतों ने कहा कि योग के द्वारा परम-तत्व की प्राप्ति नहीं हो पायेगी। जब साहिब की गोरखनाथ जी से गोष्ठी हुई तो कहा- इड़ा विनशे पिंगला विनशे, विनशे सुषुम्ना नाड़ी।

कहैं कबीर सुनो हो गोरख, कहाँ लगाओ ताड़ी ॥

जब भी बंकनाल में जाता है, तो स्वाँसा पर नियंत्रण करता है । मृत्यु के समय पर ये नष्ट हो जाती है, फिर कहाँ करना है ध्यान! यानी संतत्व की धारा योग पर केंद्रित नहीं कर रही है। साहिब कह रहे हैं कि इससे सूक्ष्म मन के तंत्र से बाहर नहीं निकल सकते हैं । आप देखें, योगियों को समय-समय पर क्रोध भी आया, वासना भी आई। योग को बुरा नहीं बोल रहे हैं। इससे शक्तियाँ मिल जायेंगी, बहुत शक्तियाँ मिल जायेंगी, पर उससे कुछ नहीं होने वाला, क्योंकि सब सिद्धियाँ - शक्तियाँ माया का खेल है। यही तो निरंजन ने जीव को आत्म- ज्ञान में जाने के लिए बाधा के रूप में रख रखीं हैं, ताकि जीव इनको प्राप्त करके इन्हीं में खो जाए, आगे बढ़ने की कोशिश न करे । इसी पर तो साहिब कह रहे हैं-

कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥

बस, इन शक्तियों को प्राप्त करके जीव सच्चे लक्ष्य से भटक जाता है।

फिर आप देखें कि इन शक्तियों को प्राप्त करके ऋषि-मुनियों ने हिंसा, क्रूरता ही तो दिखाई। इस शक्तियों को प्राप्त करके दूसरों को कष्ट ही तो दिया । पर एक महात्मा किसी को कष्ट नहीं देता है । उनकी निंदा नहीं कर रहे, क्योंकि उनकी ग़लती नहीं थी, निरंजन के दायरे में थे न । मौका आने पर कपिल मुनि ने राजा सगर के 60 हज़ार पुत्रों को जो भस्म किया, वो क्या था! यानी अंदर के विकारों को नहीं जीत पाए थे न ! दुर्वासा जी ने 56 कोटि यादवों को जो शाप दिया, वो क्या था ! अगर इतनी तपस्या करके वो क्रोध को नहीं जीत सके, तो फिर तपस्या से आत्म-ज्ञान कैसे प्राप्त करोगे! वहाँ तो मन को पूरी तरह से मारना होता है जबकि काम को तो मन का एक ही हाथ समझो, क्रोध तो मन का एक ही हाथ समझो । पराशर ऋषि को ही ले लें। मछोदरी के साथ जो किया, क्या एक आत्म- ज्ञानी कर सकता है ! तपस्या की तो क्या यही प्राप्त करके आए थे ! क्या हासिल किया फिर तपस्या से ! लड़की तो बचना चाह रही थी । उसने कहा कि सूर्य देव देख रहा है। ऋषि ने अपनी तपस्या के बल से सूर्यदेव को बादलों से ढक दिया। लड़की ने कहा कि जल देवता देख रहा है । पराशर ने हाथ घुमाया, जल पर रेत-ही-रेत हो गयी । उसे भी गुम कर दिया। लड़की फिर बचना चाह रही थी, कहा कि मैं मच्छोदरी हूँ, मेरे शरीर से मच्छी की बदबू आती है। ऋषि ने अपनी तपस्या के बल से लड़की के शरीर को भी महकदार बना दिया, योजन दूरी तक उसके शरीर की महक फैलने लगी। तपस्या से यही सब प्राप्त कर पाए थे ऋषिवर । सबने यही सब शक्तियाँ ही तो प्राप्त की। पर जो काम ऋषि पर सवार हुआ था, उससे नहीं बच सके और अंत में लड़की के साथ रति-क्रिया की । लड़की बेचारी बचना चाह रही थी, पर शक्तिशाली ऋषि से बच नहीं सकी। क्या आत्म- ज्ञानी कहेंगे ऋषि को! आत्मज्ञानी को तो सबमें एक आत्मा ही नज़र आती है। वो शरीर की तरफ आकर्षित होता ही नहीं । यह निंदा है क्या ! यह तो तपस्या से क्या हासिल होगा, यह समझाने के लिए कहा । इस तरह देवी - देवताओं की भक्ति से आप अमर-लोक नहीं जा सकते हैं, साहिब यह कह रहे हैं, निंदा तो की ही नहीं, किस भक्ति से क्या प्राप्त होगा, किसी भक्ति से कहाँ तक जाओगे, यह सब बताया। दुनिया है कि लड़ने आ जाती है। तो इसका मतलब है कि योग के द्वारा मन - माया से बाहर नहीं

निकल सकता है। मन बहुत ताक़तवर है, प्रमाण मिलते हैं कि योग-साधनाएँ करने के बाद भी मनुष्य अपने मन को नहीं जीत पाया । क्या है ज्ञान-मार्ग ज्ञान-मार्ग का मतलब है कि ज्ञान के द्वारा परम-तत्व की प्राप्ति करना । क्या हम ज्ञान के विरोधी हैं ? नहीं। रावण बहुत बड़ा ज्ञानी था, लेकिन कामातुर होकर परस्त्री को उठा लाया। वो चार वेदों का ज्ञाता था । राजनीति में भी वो निपुण था। जब मरणासन्न अवस्था में पड़ा था तो राम जी ने लक्ष्मण जी से कहा कि जाओ, रावण से राजनीति की शिक्षा लेकर आओ । यानी इतना बड़ा ज्ञान था, पर मन - माया के दायरे में ही रहा न । इन चीज़ों से बाहर नहीं निकल सका। क्या है भक्ति-योग भक्त का मतलब ही है—विषयों का त्याग। वही भक्त है, जो भग न भोगे। यानी संभोग न करे । अष्ट प्रकार के मैथुन हैं, उनसे दूर रहे। लेकिन कलयुग में मनुष्य भक्ति नहीं कर पा रहा है । पर संत कह रहे हैं कि चिंता मत करो, सद्गुरु पार कर देगा । योग में गुरु का इतना महात्म नहीं है । तो आप कहेंगे कि भक्ति का खण्डन है । नहीं ।

भक्ति स्वतंत्र सकल गुण खानी । बिनु सत्संग न पावे प्राणी ॥

पर भक्ति आसान नहीं है । इस तरह ये तीन मार्ग बताए । अब संतों का मार्ग इस तीनों से परे है । आओ, संत- मार्ग को समझते हैं । क्या है संतों का सहज-मार्ग संतत्व की धारा सहज - मार्ग की ओर जा रही है । वो है शरणागति । साहिब कह रहे हैं कि आपको कुछ नहीं करना है; सद्गुरु पार कर देगा । योग-मार्ग में योग का महात्म है, गुरु कृपा का नहीं; ज्ञान-मार्ग में ज्ञान का महात्म है, गुरु कृपा का नहीं; भक्ति मार्ग में भक्ति का महात्म है, गुरु-कृपा का नहीं। पर संतत्व की धारा में, संत - मार्ग में केवल गुरु कृपा का

महात्म है। शिष्य को केवल गुरु की शरणागत में रहना है। सारा काम गुरु का है । साहिब कह रहे हैं- तीन लोक नव खण्ड में, गुरु से बड़ा ना कोय |

कर्त्ता करे ना कर सके, गुरु करे सो होय ॥

गुरु ही सब करेगा। साहिब की वाणियाँ गुरुत्व को स्थापित कर रही हैं।

कबीर हरि के रूठते, गुरु की शरणी जाय ।

कहैं कबीर गुरु रूठते, प्रभु नहीं होत सहाय ॥

कबीर ते नर अँध हैं, गुरु को कहते और ।

हरि रूठे गुरु ठौर हैं, गुरु रूठे नहीं ठौर॥

क्या अन्य जगह यह बात मिलती है ! नहीं, इतना महात्म गुरु का कहीं नहीं मिलेगा। यदि योग- काल में जाते हैं तो गुरु-शिष्य की लड़ाई भी होती रही है, पर संतत्व की धारा बोल रही है-

गुरु गूँगे गुरु बाँवरे, गुरु के रहिये दास ।

जो गुरु भेजें नरक में, तो रखिये स्वर्ग की आस ॥

....तो शरणागति की बात आई । शरणागति बहुत बड़ी चीज़ होती है। जो जिसकी शरण में जाता है, वो उसकी रक्षा करता है ....... पक्का करता है। I देखो, विभीषण रामजी की शरण में गया था। युद्ध में रावण ने विभीषण पर शक्ति चलायी तो रामचंद्र जी ने आगे होकर उसे अपने ऊपर लिया था। अगर आप सद्गुरु की शरण में आ जायेंगे तो फिर सद्गुरु की ताक़तें आपकी रक्षा करेंगी। तब आपको अपने कल्याण का प्रयत्न करने की ज़रूरत नहीं रहेगी।

जो सतगुरु की शरण हो ताकी । तेहि कुछ यतन रहै नहिं बाकी ।।

ताते शरणागत सब पर है । शरण गहै ते जीव उबर है ।।

अगर शरण ग्रहण के बाद भी उसे अपने कल्याण का प्रयास करने की ज़रूरत है तो फिर समझो कि अभी शरणागति हुई ही नहीं । वास्तव में शरणागति अपने-आप में बहुत बड़ी भक्ति है । शरणागत में ज्ञान भी खुद आ जाएगा, ताक़तें भी खुद आ जायेंगी, समस्त पापों का नाश हो जायेगा । शरणागति महान् चीज़ है।

शरणागत कह सब गुण आवै । ज्ञान भक्ति तेहि माहिं समावै ।।

शरण हो जब यह निश्चय आई । प्रभु मोहि दोनो सकल सहाई ।।

सकल पाप ताको जरि जावै । जो सतगुरु की शरण में आवै ।।

सद्गुरुकी, प्रभु की शरण में होता है, उसके सब काम वे स्वयं ही कर लेते हैं । यही बात किसी सत्संग में एक महात्मा जी कह रहे थे । एक बंदा वहाँ पर बैठा हुआ था। उसने कहा- अगर हम खाना नहीं खाएँ तो क्या प्रभु खिलाएगा? महात्मा ने कहा- हाँ खिलाएगा। उस बंदे ने उस दिन से खाना खाना ही छोड़ दिया, सोचा, देखता हूँ, वो प्रभु कैसे खिलाता है। एक पूरे दिन खाना नहीं खाया। उसकी बीवी कहने लगी- खाना खाओ। पहले दिन प्रभु बीवी में बैठकर प्यार से खिलाने लगा। पर उस बंदे ने भी जिद्द पकड़ी थी, कहा—मैं नहीं खाता । अब दूसरे दिन भूख बड़ी, घर में खाने की महक भी आ रही थी तो मन भी करने लगा। उसने सोचा, इधर तो मन कर रहा है, पर मुझे देखना है कि वो प्रभु खिलाता कैसे है.... .. जाकर जंगल में बैठ गया । पास के गाँव में किसी की शादी थी। बहुत सारे पकवान बने थे। एक आदमी को जंगल में सुबह से बैठे हुए देख उन्होंने सोचा, इसे भी खिला देते हैं । यह सोच, दो आदमी खाना लेकर उसके पास गये, कहा- यह लो, खाओ। यह था प्रभु । पर वह बंदा भी बड़ा जिद्दी था, कहा- नहीं, मैं नहीं खाता, मुझे भूख नहीं है । वे कहने लगे, भाई, तू सुबह से भूखा बैठा है, खा । लेकिन जब वह बंदा नहीं माना तो यह सोचकर कि जब भूख लगेगी तो खा लेगा, वे खाना वहीं पेड़ के नीचे रखकर चले गये । अब महक भी आ रही थी खाने की । उसने सोचा कि यहाँ तो खाना पड़ जायेगा, इसलिए वो उठकर दूसरे पेड़ के नीचे चला गया। कुदरती दो चोर रात के 12 बजे चोरी करके आ रहे थे; वहीं बैठकर अपना हिस्सा बाँटने लगे। इतने में खाने की महक आई । वे भूखे भी थे, पर जैसे ही खाने लगे, एक में प्रभु बैठा, उसने दूसरे से कहा कि मत खाओ, इसमें ज़हर भी हो सकता है, हो सकता है कि किसी ने रखा हो । दूसरे ने भी कहा- - हाँ, हो सकता है, ढूँढ़ो, यहाँ कोई है तो नहीं। वो बंदा वहाँ पेड़ के नीचे बैठा दिखा। उन्होंने सोचा कि यह यहाँ क्यों बैठा हुआ है। वो उसे पकड़कर ले आए, कहने लगे कि बड़े चालाक निकले, हमें ज़हर खिलाकर सारा माल हड़प लेना चाहते थे । उसने कहा कि नहीं, मुझे कुछ नहीं पता। मैंने कोई ज़हर नहीं रखा।

एक ने कहा तो खा फिर लड्डू । उसने कहा कि नहीं, मुझे नहीं खाना लड्डू । दूसरे चोर ने कहा कि पक्का कोई बात है। मारे दो- -चार तमाचे और ठूंस दिये लड्डू उसके मुँह में। फिर पहले चोर ने धीरे से कहा कि पूड़ी भी खिलाओ। वो फिर कहने लगा कि मुझे नहीं खानी पूड़ी। फिर पड़े 5-6 तमाचे...... खा पूड़ी। खिला दी वो भी । इस तरह फिर हलवा, फिर मिठाइयाँ... . सब कुछ खिला दिया । दूसरे दिन बंदा महात्मा के पास आया, चरणों पर गिर पड़ा, कहा सच है, प्रभु जब चाहे, खिला के छोड़ता है। चाहे हम नहीं खाएँ, वो तब भी खिला देगा। सच है, पहले वो सीधे तरीके से काम करता है, फिर डंडे-सोटे मारकर भी खिला देगा। यदि हममे विश्वास है, हममे श्रद्धा है, तभी हो पायेगा ऐसा। लेकिन हममें छल, कपट है, तो नहीं हो पायेगा ऐसा । इसलिए शरणागति पक्की करना.... .. दिल से । आओ, बताता हूँ, शरणागति क्या चीज़ है ।

शरणागत हो षटगुण गहिये । ऐसे ताको व्यौरा कहिये ।।

विषि निषेध निजगुरु की टेवा । दुतिये सतगुरु प्रीत अरु सेवा।।

तृतीये यह निश्चय उर धारे। मो अध बिसरि नाथ मोहि तारे ।।

चौथे यह निश्चय मन माही । प्रभु तजि मोर सहायक नाहीं ।।

कैसे हु दुख सांकरे गूढा । प्रभु तजि और सहाय न ढूँढ़ा।।

पंचम सतगुरु मूर्ति को ध्याना । ताके सन्मुख विनती ठाना ।।

प्रभु तजि मोर ठिकाना नाहीं । पावन पतित नाम प्रभु आहीं।।

मो सम पतित न कतहु निहारा । प्रभु सम और न तारनहारा।।

छठयें आपको प्रभुहिं समर्पे । तोको कबहुँ काल नहिं दर्पे ।।

यह षटगुन जो कोई धारा । शरणागत पल में कर पारा ।।

कह रहे हैं कि शरणागत में छ: गुण होने चाहिए। जिसमें ये गुण आ गये, वो पल-भर में पार हो जायेगा । गुरु के बताए नियमों का पालन करना यानी जो नियम गुरु ने बताए हैं, उनका उल्लंघन न करे । जैसे आपको नाम-दान के समय सात नियम बताए, उनमें से किसी भी नियम का उल्लंघन

नहीं करना । यदि कहा है कि माँस नहीं खाना, तो कभी नहीं खाना । जुआ नहीं खेलना कहा है तो कभी नहीं खेलना । यदि किसी भी नियम का उल्लंघन करोगे तो बुद्धि पर कुप्रभाव पड़ेगा, कुंद हो जायेगी बुद्धि। आपको ज़रूरत ही क्या पड़ी है छल, कपट की, चोरी की । एक समय खाना मिले तो उसी में गुज़ारा कर लेना, उसी में खुश रह लेना, पर भूले से भी कभी चोरी नहीं करना । किसी भी नियम के विरुद्ध नहीं जाना । यह बहुत बड़ी भक्ति है । यह शरणागति की आधारशिला है, पहली सीढ़ी है। सतगुरु प्रीत अरु सेवा यानी तन, मन, धन से गुरु की सेवा करें। जब आपने नाम लिया तो मैंने आपसे एक बात बोली, कहा कि अपना तन, मन, धन मुझे दो। पर ऐसे नहीं; कहा— आँखें बंद करके सच्चे दिल से दो । आपने कहा- दिया । आपने दे दिया। गोरखनाथ जिसे दीक्षा देता था, फिर उसका तन उसे वापिस नहीं करता था, अपने साथ-साथ गेड़े खिलाता था । पर हमने ऐसा नहीं किया। हमने आपका तन आपको वापिस कर दिया, कहा - आज से हमारा मानकर इसकी सुरक्षा करना, हमारी अमानत मानना । आज के बाद इससे कोई ग़लत काम नहीं करना । आपको वापिस इसलिए किया कि घर में माता-पिता होंगे, बड़े- बूढ़े होंगे, उनकी सेवा करना । पर जब ज़रूरत होगी तो बुला लूँगा। शिष्य को चाहिए कि जब-जब समय मिले, गुरु- आश्रम में आकर सेवा करे, जिसके भी वो लायक हो । तन से सेवा करोगे तो तन के रोग नहीं सतायेंगे । फिर आपका मन भी हमने आपको वापिस कर दिया, कहा- घर - परिवार के पालन के लिए इसकी ज़रूरत पड़ेगी, इसलिए इसे भी अपने पास ही रखो। पर आज के बाद इसका इस्तेमाल कहीं ज़लत जगह नहीं करना, किसी पर झूठा मुकद्दमा नहीं करना । शास्त्रानुसार शिष्य को अपनी कमाई का 10वां अंश गुरुजनों की सेवा में लगाना चाहिए, पर मैंने आपसे यह नहीं कहा, क्योंकि यदि आप नहीं दे पाओगे तो गुरु का शब्द कट जायेगा । इसलिए शब्द में आपको नहीं बाँधा । फिर तीसरी चीज़ थी - आपका मन । यह हमने आपको वापिस नहीं किया, कहा - इसे मेरे पास ही रखना । यह मन वापिस क्यों नहीं किया ? क्योंकि इसी मन से रिश्ते-नाते हैं,

इसी से पूरी दुनिया है, इसी कारण आत्मा मेरा-मेरा कह रही है। जब मन गुरु ने ले लिया तो आपका अपना मान कैसा रहा ! इसलिए गुरुजनों से कभी मान नहीं चाहना । उनकी बात काटकर कभी अपनी न चलाना ।

गुरु की बात मान सब लीजे । सत्य असत्य विचार न कीजे ॥

अपना दिमाग़ नहीं लड़ाना कि गुरु जी सत्य कह रहे हैं या असत्य। जो कहें, मान लेना; जो कहें, बिना अपने तर्क लड़ाए कर देना। जीवन में कभी गुरु- आज्ञा न टालना। गुरु के आगे अपनी नहीं चलानी है, चाहे आपको आपके हित में लगे या नहीं । गुरु की सेवा ही सफल है । यह मानव-तन में सेवा को मौका मिला है तो इससे गुरु की सेवा कर लो। इस शरीर को तो निचोड़ देना है, क्योंकि- आखिर यह तन ख़ाक मिलेगा... इसलिए जुट जाना है। बाकी जितने भी कर्म हैं, किसी खाते में नहीं आयेंगे। यदि दिन-रात खेती-बाड़ी की, नौकरी-पेशा किया, कोई काम नहीं आयेगा। पर गुरु की जो सेवा की, वो ही काम आयेगी। यदि शिष्य गुरु की सेवा नहीं किया तो यह अपराध है । इसलिए यह ज़रूरी है।

नानक जो गुरु सेवे अपना, हौं तिस बलिहारी जाऊँ ॥

गुरु-सेवा बहुत बड़ी बात है । साहिब कह रहे हैं-

गुरु सेवे कटे दुख पापा । जनम जनम को मिटे सन्तापा ॥

गुरु की सेवा सदा चित दीजे । जीवन जन्म सुफल करि लीजै ॥

चौबीस रूप हरि आपुहि धरिया । गुरु सेवा करि सबहि बिरिया ॥

शिव बिरंचि गुरु सेवा कीन्हा | नारद दीक्षा ध्रुव को दीन्हा ॥

सकल मुनि गुरु सेवा चाही । गुरु सेवा करि पंथ अवगाही ॥

गुरु की सेवा मुक्ति निज पावे । बहुरि न हंसा भवजल आवे॥

गुरु-सेवा की बड़ी महिमा है । बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने भी गुरु- सेवा की। हरि ने भी अवतार धारण करके गुरु- सेवा में मन को लगाया। जिसने मानव-तन को पाकर गुरु धारण नहीं किया वो तो अभागा है ही, पर जिसने गुरु धारण करके फिर उनकी सेवा नहीं की, वो महामूर्ख है।

योग दान जप तीर्थ नहाना । गुरु सेवा बिनु निष्फल जाना ॥

गुरु सेवा बिनु बहु पछतावे । फिरि फिरि यम के द्वारे जावे ॥

गुरु सेवा बिनु कौन जो तारे । भव सागर से बाहर डारे ॥

गुरु सेवा बिनु कछु न सरि है । महाअन्ध कूपै महँ परि है ॥

गुरु सेवा बिनु घट अँधियारा । कैसे प्रकटे ज्ञान उजियारा॥

गुरु सेवा बिनु द्वन्द अँधेरा । गुरु सेवा बिनु काल को चेरा ॥

गुरु सेवा बिनु प्रेम विहूना । दिन दिन मोह होय भ्रम दूना ॥

साहिब कह रहे हैं गुरु-सेवा के बिना योग, जप, तप, तीर्थ सब व्यर्थ हैं। यदि गुरु की सेवा नहीं की तो बाद में पछताना ही पड़ेगा । गुरु-सेवा के बिना ज्ञान का प्रकाश नहीं हो सकता है। गुरु सेवा से हृदय प्रकाशित होता है । जिसमें गुरु-सेवा का भाव नहीं है, वो गुरु- प्रेम से रहित है। शिष्य को चाहिए कि गुरु-सेवा करते हुए मन में अहंकार न आने दे। यदि अहंकार होगा तो गुरु सेवा किसी काम की नहीं रह जायेगी । गुरु के अधीन होकर ही रहना है, ताकि उनकी कृपा मिलती रहे ।

गुरु आगे राखे माथ । करै विनय दुख मेटो नाथ ॥

अहौं अधीन तुम्हारे दासा । देहू अपने चरनन वासा ॥

यह तन मैं तोहि भेंट चढ़ायो । अपनी इच्छा कुछ न रखायो ॥

जो चाहो सो तुम अब करो । या भांड को जेहि विधि भरो ॥

भावै धूप छाँह में डारो । भावै बोरो भावै तारो॥

गुण पौरुष कछु ओ नहिं मेरो । सब विधि शरण गही गुरु तेरो ॥

मैं अब बैठा नाव तुम्हारी । आशा नदी सो करिये पारी ॥

अपना कीजै गरिये बाहीं । धरिये शिरपर हाथ गोसाईं ॥

बहु विधि विनती गुरु से करई । मान मोह हृदय नहिं धरई ॥

देखि विनय गुरु होहिं अनन्दा | तब पावै सिख परमानन्दा ॥

देखि प्रसन्नता गुरु की भाई । गुरु ते कहिये शीश नवाई ॥

ऋद्धि सिद्धि फल मैं कछु नहिं चाहूँ । जगत कामना को नहिं लाहूँ ॥

चौरासी में बहु दुख पायो । ताते शरण तुम्हरी आयो ॥

होहु दयाल दया अब कीजे । डूबत भव में बाँह गहीजे ॥

शिष्य का विनय भाव देखकर गुरु शीघ्रता से प्रसन्न हो जाते हैं। जब गुरु प्रसन्न हो जाएँ तो जो कहना है, कह लें ।

जितनी महिमा गुरु-सेवा की है, उतनी किसी अन्य चीज़ की नहीं । साहिब कह रहे हैं— नामवंत कहैं कबीर धर्मदास से, गुरुवंता कोई एक ॥ बहुते मिले, ज्ञानवंत अनेक । गुरु-सेवा में सब फल मिल जायेंगे, सब सुखों को प्राप्ति हो जायेगी। साहिब कह रहे हैं—

गंगा यमुना बद्रीश समेते । जगन्नाथादि धाम हैं तेते॥

सेवे फल प्राप्त होय न तेतो । गुरु सेवा में पावै फल तेतो ॥

कह रहे हैं कि गंगा, यमुना, बद्रीनाथ, जगन्नाथ आदि धाम जाकर भी वो फल प्राप्त नहीं होने वाला, जो फल गुरु की सेवा में मिल जायेगा ।

यह निश्चय उर धारे, मो अघ बिसरि नाथ मोहि तारे ॥

यानी भरोसा रहे, चाहे मैं कुछ करूँ या नहीं, मेरे गुरु मुझे पार कर देंगे। यह विश्वास, यह भरोसा बहुत बड़ी चीज़ है । तन सबको नहीं देते। पर आपने दे दिया। एक भरोसा, एक विश्वास था । मैंने नाम-दान के समय आपसे कुछ नहीं माँगा, केवल विश्वास ही माँगा था । विश्वास क्या ? विश्वास यह कि कभी झूठ नहीं बोलते । विश्वास यह कि—

गुरु को अखंड ब्रह्म कर जाने । गुरु को नहीं मानुष कर माने ।।

यह निश्चय मन माहीं । गुरु तजि मोर सहायक नाहीं ॥

गुरु के अलावा कोई सहारा न ढूँढ़ना । यह भरोसा रखना कि के अलावा मेरा कोई सहायक नहीं हो सकता है । जब सच्चा सद्गुरु मिल गया तो कहीं माथा पटकने की आपको ज़रूरत ही क्या पड़ी है ! मत करो ऐसा । दो किश्तियों में पाँव मत रखो। सद्गुरु मिल गया तो सद्गुरु की ताक़त सुपर है, वहीं सब कुछ मिल जायेगा । नहीं भी मिला तो भी उसी की रज़ा में रहना । | चाहे कितनी भी आफत आ जाए, यही सोचना-

दुनिया के लखां सहारे, मेरा सहारा तू है ।।

यह नहीं कि थोड़ी-सी मुसीबत आई तो कहीं सयाने के पास चल पड़े तो कहीं ज्योतिषि के पास । ऐसा न हो।

गुरु शरणागति छाड़ि करि, करै भरोसा और ।

सुख सम्पत्ति की कह चली, नहीं नरक में ठौर ।।

तो शरणागति पक्की रखना ।

एक आस विश्वास तुम्हारी । पड़ा द्वार सब विधि मैं हारी।।

विश्वास को ठीक से समझना । कच्चा जीव विचलित हो जायेगा । मुझे एक उदाहरण याद आ गया। एक माता आई, कहा- माता : सिर में दर्द होता है मैं : भजन करो माता : भजन भी करती हूँ, आरती भी करती हूँ, माता की जोत भी जगाती हूँ। यह क्या था! मतलब कि वो भक्ति ठीक से नहीं समझ पाई। एक पागल लड़के को उसके माता-पिता मेरे पास लाए, कहा कि आपका नाम लेकर कुछ देर ठीक रहा, फिर नुक्स हो गया है। मैंने लड़के से पूछा तो उसने कहा कि आपकी कृपा है, कुछ नहीं, ठीक हूँ । ये ऐसे ही कभी सयाने के पास ले जाते हैं, कभी डोरा बाँध देते हैं। मेरा पूरा विश्वास है, पर ये मानते नहीं है। तो मैं पूछना चाहता हूँ कि यह कितनी कपट थी ! बस, यह नहीं करना, यह विश्वास नहीं है ।

सद्गुरु मूर्ति को ध्याना । ताके सन्मुख विनती ठाना ॥

यानी गुरु का ही ध्यान करता रहे। सोच यही हो -

मो सम पतित न कतहुँ निहारा । प्रभु सम और न तारनहारा ।।

गुरु के आगे कभी अपने गुणों का बखान नहीं करना, हमेशा अपने दोषों को ही बताना ताकि वे दयाल हों और दोषों को निकाल दें। मैं कामी मैं कुटलू, मैं अवगुण की खान । मो पर कृपा न छाड़िए,

दास आपनो जान ॥

अवगुण किये तो बहु किये, करत न मानी हार । भावे बंदा बक्श दो, भावे गर्दन

मार ॥

सतगुरु दीन दयाल जी, तुम लग मेरी दौड़ । जैसे काग जहाज पर सूझत कतहु न

ठौर ॥

यानी इन विरह की प्रार्थनाओं से मिल रहा है कि मैं सक्षम नहीं हूँ । अपनी बढ़ाई करोगे तो कुछ नहीं रह जायेगा । साहिब बड़ा प्यारा शब्द कह रहे हैं—

गुरु को शब्द न सुने अज्ञानी । भवसागर डूबे अभिमानी ॥

सतगुरु की मरयाद न धरई । लख चौरासी कुण्ड में परई ॥

साहिब कह रहे हैं कि हमेशा गुरु-मर्यादा में रहना है। जो गुरु-मर्यादा का उलंघन करता है, वो चौरासी में ही पड़ेगा।

गुरु को देख धरत अभिमाना । व्यास बचन पड नरकनिधाना ॥

जो गुरु के आगे अपना अहंकार दिखाता है, वो तो सीधा नरक में जायेगा।

गुरु को ज्ञान मेटि मत थापी । तीन लोक में बड़ो ते पापी ॥

गुरु को मेटि बखानत आपा । धरती भार मरत तेहि पापा ॥

गुरु से ऊँचा चढ़ि बैठे । सात कुण्ड नरक में पैठे॥

जो गुरु के ज्ञान को काटकर अपना ज्ञान दिखाता है, वो तीन लोक में सबसे बड़ा पापी कहलाता है । ऐसे पापी का भार धरती भी सहन नहीं कर पाती है। वो तो गुरु से ऊँचा चढ़कर बैठने का प्रयास कर रहा है। इसलिए जो ऐसा कर रहा है, वो सप्त कुंभी नरकों में ही पड़ता है।

गुरु से उलटा बचन सुनावै । सात जनम कोढ़ी को पावै ॥

गुरु को उलट सुनावै बैना । सात जनम अँधा होय सो नैना ॥

जो गुरु से बहस करता है, उन्हें उलटे बचन सुनाता है, वो सात जन्मों तक कोढ़ी का शरीर पाता है या फिर सात जन्म अँधा होता है ।

गुरु के सम्मुख हमेशा विनय के शब्द ही बोलने हैं।

दोउ कर जोरि गुरु के आगे । करि बहु विनती चरनन लागे ॥

अति शीतल बोलै सब बैना । मेटे सकल कप के बैना ॥

हे गुरु तुम हो दीनदयाला। मैं हूँ दीन करो प्रतिपाला॥

तुम बन्दीछोर अतिहि अनाथा । भवजल बूडत पकड़ो हाथा ॥

यो अधीन होय शिष जबहीं । शिष पर कृपा करै गुरु तबहीं ॥

साहिब कह रहे हैं कि जब शिष्य गुरु के अधीन हो जाता है तब ही गुरु की कृपा मिलती है ।

छठयें आपको प्रभुहिं समर्पे । ताको कबहुँ काल नहिं दर्पे ॥

यानी खुद को समर्पित कर दे। आप अपने जीवन का सब भार साहिब पर सौंपकर देखना। दिल में यही भाव रखना-

जीवन का सब सौंप दिया अब भार तुम्हारे हाथों में ।

है जीत तुम्हारे हाथों में, है हार तुम्हारे हाथों में ।।

समर्पण ध्यान-भजन से भी बढ़कर है । यदि श्रद्धा है तो बहुत लाभ मिल जायेगा। उदाहरण देता हूँ। एक बंदे ने नाम लिया; बड़ा भोला था। नाम लेने के कुछ समय बाद वो आया, कहा- गुरु जी, जबसे नाम लिया है, बड़े मज़े में हूँ। वो कहने लगा, गुरु जी, आपने नाम-दान के समय कहा था न कि तन, मन, धन तीनों आँख बंद करके दो। मैंने सोचा, सच में देने पड़ रहे हैं। मैंने दे दिये गुरु जी । मैंने सोचा, अब बीवी, बच्चे, घर सब आपका, क्योंकि सब कुछ दे दिया था। गुरु जी, मेरी छोटी-सी दुकान है। जब मैं खोलता हूँ तो आपकी समझकर। 24 घंटे गुरु जी आप खड़े रहते हैं, मेरा सब काम करते हैं। सच में गुरुजी, पूरी दुकान आप चला रहे हैं । कहीं घाटा होने वाला हो तो खुद ही खड़े हो जाते हो। मेरा तो कुछ चल ही नहीं रहा है। अब आप - ही - आप हो । मैं तो समझ रहा हूँ कि बीवी भी आपकी, बच्चे भी आपके, बस, मैं तो नौकर हूँ, जिसे आपने अपने आश्रम में न रखकर घर-परिवार की सेवा का काम सौंप दिया है। मेरी सारी ममता ही ख़त्म हो गयी है। उसने बहुत कुछ कहा। बड़ा भोला था वो, कहा—गुरु जी, एक बात बताऊँ, कभी-कभी रात को आप आते हो, मुझे घुमाने भी ले चलते हो । देखा न, कितना भोला था ! उसने सच में समर्पण कर दिया था, इसलिए साहिब को उसका सारा काम करना पड़ा। क्या तत्व की प्राप्ति में हम भागीदार हो सकते हैं? हमें क्या करना है ? साहिब ने एक बात बोली । इसमें वज़न है । भृंग का प्रमाण दिया। वो किसी भी कीट को पकड़ कर आवाज़ से बदल देता है । पर यहाँ एक शर्त है। भृंगी शब्द कीट जो माना ।

वरण फेर आपन कर जाना ॥

कोई कोई कीट परम सुखदाई |

प्रथम आवाज़ गहे चित्तलाई ॥

कोई दूजे कोई तीजे मानै । तन मन रहित शब्द हित जानै ॥

भृंगी शब्द कीट ना गहई । तौ पुनि कीट आसरे रहई ॥

कोई-कोई कीट पहली आवाज़ में ही शब्द को ग्रहण कर लेता है, कोई दूसरे और कोई तीसरे शब्द में ग्रहण करता है । कुछ-कुछ कीट कठिन हैं, जो पहली में परिवर्तित नहीं होते हैं। हालांकि वो आवाज़ सुनाई दी, पर कीट डर जाता है, भयभीत हो जाता है, संशय में आ जाता है। जैसे माताएँ बच्चों को बंदगी करवाने महापुरुष के पास ले जाती हैं तो वो बच्चा रोता है, सोचता है कि शायद डॉ० है, मुझे टीका लगा देगा। क्योंकि वो डॉ० के पास जा चुका होता है। ऐसे ही कीट को शंका होती है कि कहीं यह मुझे खा न ले । पर वो हितैषी है, सुखदायी है।

गुरु शब्द निश्चय सत्य माने, भृंगि मत तब पावई ।

तजि सकल आसा शब्द बासा, कागा हंस कहावई॥

ऐसे ही गुरु-शब्द सुखदाई है । भृंगे की भू-भू की प्रक्रिया में स्पन्दन है। कुछ कीट पहले में नहीं हो पाते हैं परिवर्तित । क्यों नहीं हुए। क्योंकि समर्पित नहीं होते । जब तक समर्पित होकर नहीं सुनता, उसका परिवर्तन नहीं हो पाता। फिर तीन बार में भी न हो तो भृंगा उसे छोड़ देता है, दूसरे को ढूँढ़ता है। तो पुनि कीट आसरे रहई .... फिर नहीं बन पाता है वो भृंगा ..... कीट ही रह जाता है । स्वामी परमानंद जी ने इसी बात को बड़े प्यारे शब्द में कहा है-

भृंगी जो आन कीट को खुद रंग लगावे ।

आवाज़ अपनी आनसिक्ख कान सिखावे ॥

वह रूप पहला रहा एक न बाकी ।

गुरु शब्द से फिलफौर रंग पलट सो जावे ॥

कोई और क़िस्म कर्म को ज़िनदार न देखे।

भृंगी जो अपने ढंग कीट ढूँढ़ के लावे ॥

वह ढूँढ़ काम अपने ही हम रंग हमेशा ।

दिल दे के उसको तबही अपने रूप बनावे ॥

दिल उसको देना चाहिए दिलदार कोई हो ।

हिंदू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥

हैं कीट लाख सदमें कोई एक ही मेरा ।

जहाँ जाके बार बार भृंग करता है फेरा ॥

वही कीट जेहल अपने से गुरुबात न माने ।

तब जाके पास उसके भृंग करता है डेरा ॥

कहता है कीट तुमको लगी आन खराबी ।

नहीं अक्ल ठिकाने रही नहीं इल्म है तेरा ॥

तू बात मेरी मान अबकी बार कान धर।

हो मेरी तू दमशक्ल तेरा होवे निबटेरा ॥

दिल उसको देना चाहिए दिलदार कोई हो ।

हिंदू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥

लाखों में कोई कीट ही होता है, जिसे भृंग बनाने के लिए कीट बार- बार फेरा लगाता है। वो उसको अपना दिल देकर फिर अपने समान करता है । इसलिए कह रहे हैं कि दिल उसे देना चाहिए, जो दिलदार हो, जो सच्चा ख़रीदार हो। इस तरह समर्पण चाहिए। मन में विचार आ सकता है कि क्यों चाह रहा है, क्या ज़रूरत है । यथार्थ में तीनों बंधनकारक हैं। आत्मा मानती है कि धन आवश्यक है तो उसके लिए कई तरह की क्रियाएँ करती है । आख़िर तन, मन, धन की ज़रूरत क्या पड़ी? क्यों लिया जा रहा है हमसे ? आत्मा ने माना कि तन मेरा है। जैसे माना, एक त्रुटि आ गयी । आत्मा देहाभास में आ गयी तो काम करने लगी।

जबते जीव भयो संसारी । छूटे न ग्रंथी न होय सुखारी ॥

फिर धन को अपना मान लिया, उसके लिए बड़े प्रयास कर रही है। चाहे उचित हो, चाहे अनुचित हो, पर काम कर रही है। इस तरह मन से पूरा ब्रह्माण्ड है । यही बंधनकारक है । ये तीनों लिये। क्या मतलब है ? तन दिया, एक भ्रम समाप्त हुआ कि शरीर हूँ। धन लिया तो लोभ समाप्त हुआ । मन क्या है ? यानी बुद्धि, अहंकार आदि का इस्तेमाल नहीं करना । ऐसा क्यों ? जो भी इस मन से करोगे, धोखा होगा। जो भी बुद्धि से काम कर रहे हैं, जो भी चित्त से काम कर रहे हैं, जो भी अहंकार से कर रहे हैं, विनाशकारी हैं। ये चारों बहुत भ्रमित करते हैं।

इसलिए कहा कि समर्पित हो जाओ। तब आप गुरुजी की बात को स्वीकार करेंगे। जो भी कहें, स्वीकार करना है । ....तो ये छ: गुण जिसमें आ गये, वो पल में पार हो जायेगा। उसे कुछ करने की ज़रूरत नहीं है । जैसे बच्चा जब तक छोटा होता है, जब तक माँ की शरण मे रहता है, तब तक माँ उसका कितना ख़्याल रखती है ! हाथों से खाना खिलाती है, पानी पिलाती है, सुलाती है, सब काम करती है। लेकिन जब वही बच्चा बड़ा हो जाता है तो फिर थोड़े इतना ख़्याल रखती है । खाना बनाकर आगे ज़रूर रख देती है, पर अपने हाथों से खिलाती थोड़े है। ऐसे ही जब तक जीव सद्गुरु की शरण में रहता है, तब तक सद्गुरु को उसका बड़ा ध्यान रहता है। ज्ञानी शिष्य की चिंता गुरु को ज़्यादा नहीं है । इसलिए हमें हमेशा गुरुजनों के सामने छोटे बनकर रहना है, शरणागति में रहना है ताकि सद्गुरु को बराबर हमारा ध्यान रहे और हम सहजता से अपने लक्ष्य को पा लें।

बलिहारी गुरु आपने, घड़ी-घड़ी सौ-सौ बार ।

मनुष्य से देवता किया, करत न लागी बार ॥

चाह मिटी चिन्ता, मिटी मनुआ बेपरवाह ।

वोही शहनशाह है, जिसको नाहीं चाह ॥