भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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कर सकते हैं। क्योंकि घोर साधनाएँ करने वाले भी इनसे प्रभावित हुए।

जब तक मनुष्य मन-माया के नियंत्रण में है, तब तक मोक्ष का प्रश्न ही नहीं उठता है । साहिब कह रहे हैं- हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई ।

पाँच पचीस तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई ॥

आपका बैरी मन के अलावा और कोई नहीं है । इसलिए योग की क्रियाओं के द्वारा मन को नहीं जीत सकते हैं । जब भी कोई साधना पर चले तो उसे चिंतन करना होगा कि प्राप्त क्या होगा और सही सूत्र क्या है ! पंच मुद्राओं में कुछ ओंकार का नाम जपते हैं। ओंकार निरंजन का ही नाम है। पर सच्चा नाम गुप्त है । इसलिए ओंकार के द्वारा परम तत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती है। इस तरह सोहं के द्वारा भी परम तत्व को नहीं पाया जा सकता है। साहिब कह रहे हैं- जो जन होइहैं जौहरी, शब्द लेहु बिलगाय । सोहं सोहं जप मुआ,

मिथ्या जन्म गँवाय॥

सोहं शब्द के विशेषज्ञ शुकदेव जी थे, पर उन्हें आगे का रास्ता तय करने के लिए उनमुनि मुद्रा में जाना पड़ा। उन्हें राजा जनक से दीक्षा लेनी पड़ी। राजा जनक उनमुनि मुद्रा के विशेषज्ञ थे, पर उन्हें भी आगे की मंजिल तय करने के लिए अष्टावक्र के पास जाना पड़ा। फिर आगे ररंकार शब्द है, जो दसवें द्वार की ओर जाता है । ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि यह साधना करते हैं, पर साहिब कह रहे हैं— ब्रह्मा विष्णु महेशादि ले, ररंकार को जाना।

उसके आगे पुरुष पुरातन, उसकी ख़बर न जाना ॥

दसवें द्वार के खुलने पर भी यह आत्मा काल के दायरे से बाहर नहीं निकल सकती है। सिद्ध साध त्रिदेवादि ले, पाँच शब्द में अटके ।

मुद्रा साध रहे घट भीतर, फिर औंधे मुँह लटके ॥

बार-बार मृत्यु लोक में आना पड़ता है । इस तरह कोई भी मुद्रा, जो हमारे ऋषि-मुनि, योगी, योगेश्वर आदि कर रहे थे, हमें अमर - लोक यानी महानिर्वाण की ओर नहीं ले जा सकती है ।