भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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इन मुद्राओं से हम कतई अमर - लोक नहीं जा सकते हैं। इसलिए साहिब ने तथा संतों ने ऋषि-मुनियों, पीर पैगंबरों आदि का उदाहरण नहीं दिया, देव- चरित्र पर भी ज़्यादा व्याख्या नहीं की। क्या निंदा की ? नहीं, वो कह रहे हैं कि ये सब तीन-लोक के दायरे में हैं । साहिब की वाणी कह रही है कि पहले जितने भी लोग आए, तीन- लोक तक ही गये, आगे का यात्रा कोई नहीं कर पाया। आप देखें कि हॉलिकाप्टर पर बैठकर मंगल पर जाने की सोचें तो नहीं हो पायेगा न! उसकी क्षमता से बाहर है । इस तरह पंच मुद्राओं की क्षमता से बाहर है वो देश। इसलिए साहिब ऋषि-मुनियों के ज़्यादा उदाहरण नहीं दे रहे हैं। इसलिए उनका विरोध भी हुआ। क्योंकि हम जन्म-जन्मांतरों से जिन सूत्रों पर चलते आ रहे हैं, जिन सूत्रों को हमने बड़ी देर से पकड़ रखा है, उनसे आगे या उनसे हटकर नहीं जाना चाहते हैं । हमारे दिल में भय उत्पन्न होता है कि कहीं पाप न लग जाए। .....तो संतों ने कहा कि योग के द्वारा परम-तत्व की प्राप्ति नहीं हो पायेगी। जब साहिब की गोरखनाथ जी से गोष्ठी हुई तो कहा- इड़ा विनशे पिंगला विनशे, विनशे सुषुम्ना नाड़ी।

कहैं कबीर सुनो हो गोरख, कहाँ लगाओ ताड़ी ॥

जब भी बंकनाल में जाता है, तो स्वाँसा पर नियंत्रण करता है । मृत्यु के समय पर ये नष्ट हो जाती है, फिर कहाँ करना है ध्यान! यानी संतत्व की धारा योग पर केंद्रित नहीं कर रही है। साहिब कह रहे हैं कि इससे सूक्ष्म मन के तंत्र से बाहर नहीं निकल सकते हैं । आप देखें, योगियों को समय-समय पर क्रोध भी आया, वासना भी आई। योग को बुरा नहीं बोल रहे हैं। इससे शक्तियाँ मिल जायेंगी, बहुत शक्तियाँ मिल जायेंगी, पर उससे कुछ नहीं होने वाला, क्योंकि सब सिद्धियाँ - शक्तियाँ माया का खेल है। यही तो निरंजन ने जीव को आत्म- ज्ञान में जाने के लिए बाधा के रूप में रख रखीं हैं, ताकि जीव इनको प्राप्त करके इन्हीं में खो जाए, आगे बढ़ने की कोशिश न करे । इसी पर तो साहिब कह रहे हैं-

कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥

बस, इन शक्तियों को प्राप्त करके जीव सच्चे लक्ष्य से भटक जाता है।