करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 218, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंफिर आप देखें कि इन शक्तियों को प्राप्त करके ऋषि-मुनियों ने हिंसा, क्रूरता ही तो दिखाई। इस शक्तियों को प्राप्त करके दूसरों को कष्ट ही तो दिया । पर एक महात्मा किसी को कष्ट नहीं देता है । उनकी निंदा नहीं कर रहे, क्योंकि उनकी ग़लती नहीं थी, निरंजन के दायरे में थे न । मौका आने पर कपिल मुनि ने राजा सगर के 60 हज़ार पुत्रों को जो भस्म किया, वो क्या था! यानी अंदर के विकारों को नहीं जीत पाए थे न ! दुर्वासा जी ने 56 कोटि यादवों को जो शाप दिया, वो क्या था ! अगर इतनी तपस्या करके वो क्रोध को नहीं जीत सके, तो फिर तपस्या से आत्म-ज्ञान कैसे प्राप्त करोगे! वहाँ तो मन को पूरी तरह से मारना होता है जबकि काम को तो मन का एक ही हाथ समझो, क्रोध तो मन का एक ही हाथ समझो । पराशर ऋषि को ही ले लें। मछोदरी के साथ जो किया, क्या एक आत्म- ज्ञानी कर सकता है ! तपस्या की तो क्या यही प्राप्त करके आए थे ! क्या हासिल किया फिर तपस्या से ! लड़की तो बचना चाह रही थी । उसने कहा कि सूर्य देव देख रहा है। ऋषि ने अपनी तपस्या के बल से सूर्यदेव को बादलों से ढक दिया। लड़की ने कहा कि जल देवता देख रहा है । पराशर ने हाथ घुमाया, जल पर रेत-ही-रेत हो गयी । उसे भी गुम कर दिया। लड़की फिर बचना चाह रही थी, कहा कि मैं मच्छोदरी हूँ, मेरे शरीर से मच्छी की बदबू आती है। ऋषि ने अपनी तपस्या के बल से लड़की के शरीर को भी महकदार बना दिया, योजन दूरी तक उसके शरीर की महक फैलने लगी। तपस्या से यही सब प्राप्त कर पाए थे ऋषिवर । सबने यही सब शक्तियाँ ही तो प्राप्त की। पर जो काम ऋषि पर सवार हुआ था, उससे नहीं बच सके और अंत में लड़की के साथ रति-क्रिया की । लड़की बेचारी बचना चाह रही थी, पर शक्तिशाली ऋषि से बच नहीं सकी। क्या आत्म- ज्ञानी कहेंगे ऋषि को! आत्मज्ञानी को तो सबमें एक आत्मा ही नज़र आती है। वो शरीर की तरफ आकर्षित होता ही नहीं । यह निंदा है क्या ! यह तो तपस्या से क्या हासिल होगा, यह समझाने के लिए कहा । इस तरह देवी - देवताओं की भक्ति से आप अमर-लोक नहीं जा सकते हैं, साहिब यह कह रहे हैं, निंदा तो की ही नहीं, किस भक्ति से क्या प्राप्त होगा, किसी भक्ति से कहाँ तक जाओगे, यह सब बताया। दुनिया है कि लड़ने आ जाती है। तो इसका मतलब है कि योग के द्वारा मन - माया से बाहर नहीं