भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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इस तरह यह काम बड़ा ख़तरनाक है । इसका अपना एक परिवार भी है। इस काम की स्त्री है—रति, पुत्र है – लालच और बंधु है—लोलुपता । ये सभी बुरा काम करने वाले हैं। बहुत ही बुरे हैं ये सब | तो आगे कह रहे हैं-

श्रृंगी ऋषि जो वन महँ जाये । कन्द मूल खनी बन फल खाये ॥

ऐसन ज्ञान ध्यान मन धरई । सोउ काम वसि फिरि फिरि परई ॥

शृंगी ऋषि ने तो अपने शरीर को सुखाकर लकड़ी समान कर लिया था। वो सबसे दूर जंगल में एक खोह में रहा करता था। उसे भी एक वेश्या ने वश में कर लिया और फिर वो तीन बच्चों का बाप भी बन बैठा । जब होश आया तो सब छोड़ पुन: जंगल में चला गया। जब काम मनुष्य पर सवार हो जाता है तो उसे कुछ भी होश नहीं रहने

है | कामातुर होकर मनुष्य बड़े बड़े अनर्थकार्य भी कर डालता है।

काम वशि भये रावण राऊ । हरण सीता किया नाश उपाऊ॥

बड़ बड़ त्रानी जग महँ भयऊ। काम त्रास सबन कहँ दयऊ ॥

रावण बड़ा ज्ञानी था, चारों वेदों का ज्ञान रखता था वो। पर काम को नहीं जीत सका और सीता जी का हरण कर लिया।

नारद आदि पंच शर तानी । और अनेक जेहि नर ज्ञानी ॥

काम बाण जब दशरथ लागे । राम छुटे

तब प्राण त्यागे ॥

काम बली अति बलवंडा । जासु बान रहे विकल ब्रह्मण्डा ॥

नारद जैसे ज्ञानी को भी नहीं छोड़ा। यह पूरे ब्रह्माण्ड को व्याकुल रखता है। सोचो, कितने बड़े-बड़े महारथियों को नचाया है काम ने! अब क्रोध की तरफ चलते हैं । यह तो काम का जुड़वा भाई समझो। साहिब कह रहे हैं-

काम ते अधिक क्रोध प्रचंडा । जाके डर त्रासे नौ खंडा॥

गुरु कुबुद्धि क्रोध के संगा । अढर भेष धरि चढ़त जो अंगा ॥

जब उर क्रोध प्रगटे आयी । कांपै देह थर थर हो जायी ॥

टेढ़ी भोहैं अंकित नैना । अशुभ असार मुख बोले बैना ॥

जरे हृदय मुख निकसे झारा । रोम रोम पावक पर जारा ॥

मार मार करै अपघाता। गिनैं न मात पिता औ भ्राता॥

दुई जाय कै विनशै आपा । दारुण हिया क्रोध कै रूपा ॥

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