भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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यह क्रोध भी बड़ा ख़तरनाक है । जब यह हृदय में आता है तो शरीर काँपता है। तब भौहें टेढ़ी हो जाती हैं, आँखें लाल, अनाप-शनाप बकता है। मुँह से तब झार निकलती है, रोम-रोम में क्रोध की अग्नि जलने लगती है । तब इंसान को अपना-पराया, हित-अनहित कुछ भी नहीं सूझता है । उसके मस्तिष्क पर एक पर्दा-सा छा जाता है और वो बड़े-बड़े मूर्खों वाले कार्य भी कर डालता है । इस क्रोध ने भी बड़े बड़ों की ख़बर ली है । इस क्रोध की स्त्री है— हिंसा, पुत्र है – अविचार और बंधु है- - भूल । जब-जब क्रोध आता है, विनाश होता है । इस तरह क्रोध ने समय-समय पर इस संसार का बड़ा विनाश किया है। साहिब कह रहे हैं-

प्रथमें क्रोध ब्रह्मा को भयऊ । षट पुत्रन कहँ शाप जो दयऊ ॥

सनकादिक वैकुंठे गयऊ । रोकत पौरी क्रोध मन भयऊ ॥

जब जब शिव क्रोध करै संसारा । परलय होत न लागे बारा ॥

दुरवासा क्रोध न सहेऊ । उलटी हानी तप में भयेऊ ॥

छप्पन कोटि यादव संघारा । आपुहिं आप क्रोध परजारा ॥

कौरव पाण्डव क्रोधहि जारे । आपहि आप गये सब मारे ॥

ब्रह्मा जी सृष्टि के कर्त्ता हैं। भाइयो, यह मामूली बात नहीं है, विचार करना होगा। छह पुत्रों को शाप देकर भस्म कर डाला । सनकादिक ऋषि वैकुण्ठ में जा रहे थे तो जय-विजय नामक द्वारपालों ने अन्दर नहीं जाने दिया। ओह, इतना बड़ा ऋषि, मुझे रोका। क्रोध आ गया सनकादिक को और बस, दे डाला शाप, कहा- -जाओ, तीन जन्म के लिए राक्षस हो जाओ । शिवजी क्रोध करते हैं तो तीन-लोक में प्रलय कर देते हैं । यह तो सब जानते हैं । दुरवासा ऋषि क्रोध को न जीत सके और 56 कोटि यादवों को शाप देकर भस्म कर डाला । देखा न, कितने बड़े बड़ों को वश में कर रखा है इसने ! सारा संसार इसकी चपेट में है।

क्रोध अनि घट घट बरी, जरत सकल संसार ।

दीन लीन निज भक्ति सो, ताकर निकट उबार ॥

दसो दिशा ते उठी परबल क्रोध की आग।

संगति शीतल साधु की, शरण उबरिये भाग॥