करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 70, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंतों की शरण में जाकर ही इससे बचा जा सकता है, अन्यथा पूरा संसार इस क्रोध की आग में जल रहा है।
कहैं कबीर क्रोध परहरै । सोई प्राणी भवसागर तरै ॥
क्षण क्षण क्रोध हृदय में आवै । जप तप ज्ञान रहन नहिं पावै ॥
पंडित गुणी योगी वैरागी । ये सब जरैं क्रोध की आगी ॥
पंच अग्नि ग्रीष्म ऋतु धरई । ऐसी विधि त्रिकाल तप करई ॥
पाँचो इंद्री करै निरासा | साधे निदा भूख पियासा ॥
जतन जतन बहुत तप करहीं । क्रोध छुड़ाय छन एकमहँ हरहीं॥
सिद्ध काज विनास क्रोधा । सब फल जाइ न पावै सोधा ॥
इस क्रोध को जो त्याग देता है, वो भवसागर से पार हो जाता है । जब यह क्रोध हृदय में आ जाता है तो जप, तप, ज्ञान कुछ भी रहने नहीं देता है। चाहे कोई पाँचों इंद्रियों को साध ले, भूख, नींद आदि को भी वश में कर ले, पर जब क्रोध आता है तो एक पल में सब कुछ हर लेता है । यह क्रोध बने बनाए काम बिगाड़ देता है और सारे फल का नाश कर देता है ।
बहुत जतन तप कीनेऊ, सब फल क्रोध नसाय।
कहैं कबीर धन संचै चोर मूसि लै जाय ॥
, तपस्वी बड़े यत्न से तप करते हैं, पर क्रोध आता है तो सारे तप को नष्ट कर देता है। जैसे कोई धन का संचय करता है, पर आख़िर चोर चुरा ले जाता है, ऐसे ही क्रोध सारे तप का नाश कर देता है । क्रोध के बाद अब लोभ की तरफ चलते हैं । साहिब कह रहे हैं—
बुरा लोभ ते और न कोई । सकल अधर्म लोभ ते होई ॥
यह लोभ सभी पापों की जड़ है। लोभ की स्त्री है - तृष्णा, बेटा है— पाप। यानी यह लोभ पाप का बाप है । इस लोभ की कहानी भी बड़ी ही निराली है ।
पहिले पैसा मों मन लावै । पैसा मिले टका को धावे ॥
टका देखि मन में सुख भयऊ। दो टका का उद्यम कियऊ ॥
दुई जोरे जोरे फिर चारी । लोभ पाति दीन्हों परचारी ॥
चारि जोरि मन उपज्यो रंगू । अब दश कै जोर होय जनि भंगू ॥
दश जुरै मन रहे न ठोरा। जोरि बीस मन आगे दौरा ॥