करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीस जोरि मन बाढ़ी आशा । अब जो कैसेहु के जुरे पचासा ॥
जोर पसाच गाँठ सो दीन्हा । तब सहस्र को उद्यम कीन्हा ॥
जोरि सहस्र तृष्णा नहिं साखू । अब लागै जोरन लाखू ॥
लाख जोरि विनवै कर जोरी। अब परमेश्वर मोहि देहि करोरी ॥
जोरि करोर क्षण कल नहिं परै । लोभ अग्नि छिन छिन तनु जरै ॥
ज्यों ज्यों लोभ मिलै नौखंडा । त्यों त्यों लोभ भयो परचंडा॥
दस मिलें तो बीस चाहिए, बीस मिलें तो पचास, पचास मिलें तो एक सौ, एक सौ के बाद एक हज़ार, फिर लाख, करोड़। नहीं, कभी ख़त्म नहीं होता यह लोभ । साहिब धर्मदास से कह रहे हैं-
कलियुग वैराग अस होवे भाई । सुनु धर्मदास मैं कहौं बुझाई ॥
कलियुग पाप कर्म बहु बढ़िहैं । करि करि पाप दुख में परिहैं ॥
ताते दरिद्र होय बहु लोगा । सहिहैं बहुते दुख अरू सोगा ॥
पाइ दुख बहु भेष सों धरिहैं । लागे लोभ पाप बहु करिहैं ॥
मांगि मांगि कछु द्रव्य कमायी । ऋण ब्याज दर दिहैं उठायी ॥
नाम साधु जग माहिं कहायी । खैहैं ब्याज करि कर्म कसायी ॥
मठ मंदिर कारण धन लैहैं । सेवक साख बहुत बढ़े हैं ॥
पाइ द्रव्य विषय सो भोग हैं । बहु विधि इंद्रिन सुख लगिहैं ॥
विषय भोग को द्रव्य सो चाही । तब पडिहैं वह तृष्णा माहीं ॥
तृष्णा अति परबल जग भंगी । सदा रहै वह लोभ की संगी॥
साहिब कह रहे हैं कि कलयुग में मनुष्य लोभ के कारण बड़ा पाप करता है, इसलिए दरिद्र होता है और बड़ा दुख सहता है। कलयुग में पाखण्डी साधु धर्म के नाम पर भीख माँगते हैं और बहुत धन जोड़ लेते हैं। उनके दिल में विषय-भोगों की तृष्णा रहती है । यह तृष्णा लोभ की पत्नी है, जो सदा उसके संग रहती है। यह लोभ तो काम और क्रोध से भी बढ़कर है, इसलिए साहिब कह रहे हैं— कामी लोभी बंदा न तरे, नर बहुते तरे, कहैं क्रोधी कबीर तरे सिद्धंत ॥ अनन्त । इस लोभ के चंगुल में एक-दो नहीं हैं ।