भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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भगत मुड़िया जटाधारी, ज्ञानी गुनी अपार ।

षट दर्शन भटकत फिरे, एक लोभ की लार ॥

इसके बाद आता है— मोह | यह तो सबका राजा है । साहिब कह रहे हैं—

मोह सकल व्याधिन को मूला । ता ते उपजत बहु विधि सूला॥

यह सभी बीमारियों की जड़ है । इसकी उत्पत्ति ही माया से है।

मोह नृपति माया ते भयऊ। प्रबल घटा तिहूँ पुर सी छयऊ॥

वरनो तासु नाम गुण बैना । महा मोह राजा को सैना ॥

इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार भी है।

निज अज्ञान देश राजधानी । आलस महल आशा पटरानी ॥

इच्छा बेटी खरी कठोरी । बाँधे अनेक जीव उठि भोरी ॥

कुमति सखी ताके संग रहई । निति उठि हृदय सबन की दहई ॥

लौंडी छूत टहल घर करई । जाके परसत सब जग डरई ॥

लौंडा लालच नाहिं अघावे । वरजत निलज सबके घर जावे ॥

रोग शोक संशय बहु भांति । पर द्रोही और द्वन्द संघाती ॥

ये राजा के पुत्र प्रचंडा । जाके डर त्रासे नौखंडा॥

पाप सबन को औगुन जानी । दुख दरिद्र मोह अभिमानी ॥

अधर्म ध्वजा जाके अगवानी । बाजा प्रकट कलह निशानी ॥

दम्भ क्षत्र चौतरा शूला। जहँ सिंहासन बैठे फूला ॥

कपट वजीर असत्य खवासा । पाखंड मंत्री संग प्रकाशा ॥

यह मोह अज्ञान के देश में रहता है। इसकी स्त्री है - तृष्णा, , बेटी है- इच्छा, बेटा है- लालच, मंत्री है - पाखंड, वजीर है - कपट, , मित्र हैं— रोग और शोक। इस तरह इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार है, बहुत बड़ी सेना है । मोह की इस सेना से बचना आसान काम नहीं है, इसलिए साहिब कह रहे हैं-

यह सेना सब मोह की, कहैं कबीर समझाय ।

इनते जो कोई बाचई, भवसागर तरि जाय ॥

अब अंत में आता है— अहंकार । यह सबसे ख़तरनाक है । इसकी स्त्री है— निंदा । अहंकार दूसरे की निंदा करता है। किसी को धन का, किसी को बल का, किसी को विद्या का अहंकार रहता है । जब जब अहंकार हृदय में आता है, तब तब जीव अपने समान किसी को नहीं मानता है ।