भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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छिन छिन गर्व हिया में आवे । आगे कुटिल सबही दिखलावे ॥

ऐंठत चलै निहारत पागा । गर्व खबीस तबहिं उठि लागा ॥

ऐंठ अकड़ अभिमानी माहीं । अभिमानी नीचा हों नाहीं ॥

मूँछे ताव निहारत छांही। काँधे धरे अवर की बाँहीं ॥

टेढ़ी पाग गर्व मन धरई । मन महँ ऊमतवालो फिरई ॥

अनीति वचन औरन सों बकै, हमरी बरोबरी को करि सकै ॥

अहंकारी में अकड़ होती है। वो दूसरे को कुछ नहीं गिनता है । दूसरों को अपशब्द भी बोल देता है । वो सोचता है कि मेरे बराबर कोई नहीं है । साहिब समझा रहे हैं-

अति के गर्व न होय भाई । गर्वहि ते पुनि सर्व नशायी ॥

अभिमानी नहिं छूटे कबहूँ । बहु विलक्षण ज्ञानी होय तबहूँ ॥

भगली दंभ नितही मन माहीं । निकट साँच कछु आवे नाहीं ॥

हम हम हम करत सो डोलै । काहू से सीधा नहिं बोलै ॥

रूपवन्त रूप गरवावै । कोई मौसम दृष्टि न आवै॥

धन कुल विद्या गर्बाना । अनी ऊँच ज्ञानी विखराना ॥

अहै भूप राजा अभिमानी । आपेही को सरवस जानी॥

है योगी योग गर्व धारै । बड़े बड़े सिद्धि काल गहि मारै ॥

साहिब कह रहे हैं कि यह अहंकार नहीं होना चाहिए। इस अहंकार से सब नाश हो जाता है। अभिमानी कभी पार नहीं हो सकता है । अहंकारी सदा ‘मैं’‘मैं' ही लगाए रखता है और किसी से सीधी बात नहीं करता है । धन, कुल, विद्या आदि का अभिमान सबको घेरे रखता है । राजा को अपने बढ़प्पन का अभिमान होता है। योगी को अपने योग का अभिमान रहता है। इस तरह ये पाँचों ही बहुत बुरे हैं। ये पाँचों मन के हाथ हैं, जिनसे यह सबको मरोड़े जा रहा है। मनुष्य इनसे सावधान नहीं है । साहिब सतर्क कर रहे है

चश्म दिल से देख तू, क्या क्या तमाशे हो रहे .... ॥

नाम से क्या होगा जिस दिन गुरु नाम दे देता है, उस दिन वो नाम पूरी सुरक्षा करता है । तब काम का प्रभाव नहीं पड़ता है। जैसे किसान लोग बीज को सुरक्षित कर देते

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