भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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आप चाहकर भी खोटे कर्म नहीं कर पाते हैं। वो ताकत अंत:करण को आकर रोकती है। ऐसी ही नहीं कह रहे-

सतगुरु शब्द सहाई॥

तो आगे कह रहे हैं—

अठवन पठवन दृष्टि न लागे, उलटे तिहि धर खाई ।

मारन मोहन वशीकरन कर, मन ही मन पछिताई ।।

कह रहे हैं कि बुरी नजर भी नहीं लगेगी । उलटा बुरी दृष्टि लगाने वाले का बुरा हो जायेगा । मारन, मोहन आदि बाणों का भी असर नहीं होगा । इतना ही नहीं— जादू यंत्र युक्ति नहिं लागे, शब्द के बान डहाई ।

ओझा डायन उर डर डरपे, जहर जूड़ हो जाई ।।

शब्द (नाम) रूपी बाण के आगे किसी तरह का जादू -मंत्र टिक नहीं पायेगा। जादू-मंत्र करने वाली डायन, ओझा आदि का हृदय स्वयं ही भय से व्याकुल हो जायेगा। इस नाम की ताकत के आगे जहर भी बेअसर हो जायेगा ।

विषधर मन में कर पछतावा, बहुरि निकट नहिं आई ।

कहैं कबीर काटो यम फंदा, सुकृति लाख दुहाई ।।

इसी नाम से काल का जाल कटेगा । नाम कवच की तरह रक्षा करेगा । इहलौकिक और परालौकिक दोनों सुख नाम देगा।

जो सुख को चाहो सदा, तो शरण नाम क लेह ।।

जिस दिन नाम की ताक़त आ जाती है, इहलौकिक और परालौकिक, दोनों तरह की शक्तियाँ आपमें आ जाती हैं। तभी तो साहिब आख़िर कह रहे हैं-

सत्यनाम के पटतरे, देवे को कछु नाहिं ।

क्या लें गुरु संतोषिये, यह हवस रही मन माहीं ।।

जब नाम की ताक़त आ जाती है तो आन्तरिक शत्रुओं का बस नहीं चलता है, क्योंकि तब आपके पास इनसे लड़ने के लिए दूसरी शक्तियाँ आ जाती हैं। क्षमा, प्रेम, विचार आदि का बुरी शक्तियों से युद्ध चलता है । इनका राजा है— विवेक । आओ, विवेक की सेना तरफ चलते हैं । इसकी उत्पत्ति परम-पुरुष से हुई है।

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