करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंआप चाहकर भी खोटे कर्म नहीं कर पाते हैं। वो ताकत अंत:करण को आकर रोकती है। ऐसी ही नहीं कह रहे-
सतगुरु शब्द सहाई॥
तो आगे कह रहे हैं—
अठवन पठवन दृष्टि न लागे, उलटे तिहि धर खाई ।
मारन मोहन वशीकरन कर, मन ही मन पछिताई ।।
कह रहे हैं कि बुरी नजर भी नहीं लगेगी । उलटा बुरी दृष्टि लगाने वाले का बुरा हो जायेगा । मारन, मोहन आदि बाणों का भी असर नहीं होगा । इतना ही नहीं— जादू यंत्र युक्ति नहिं लागे, शब्द के बान डहाई ।
ओझा डायन उर डर डरपे, जहर जूड़ हो जाई ।।
शब्द (नाम) रूपी बाण के आगे किसी तरह का जादू -मंत्र टिक नहीं पायेगा। जादू-मंत्र करने वाली डायन, ओझा आदि का हृदय स्वयं ही भय से व्याकुल हो जायेगा। इस नाम की ताकत के आगे जहर भी बेअसर हो जायेगा ।
विषधर मन में कर पछतावा, बहुरि निकट नहिं आई ।
कहैं कबीर काटो यम फंदा, सुकृति लाख दुहाई ।।
इसी नाम से काल का जाल कटेगा । नाम कवच की तरह रक्षा करेगा । इहलौकिक और परालौकिक दोनों सुख नाम देगा।
जो सुख को चाहो सदा, तो शरण नाम क लेह ।।
जिस दिन नाम की ताक़त आ जाती है, इहलौकिक और परालौकिक, दोनों तरह की शक्तियाँ आपमें आ जाती हैं। तभी तो साहिब आख़िर कह रहे हैं-
सत्यनाम के पटतरे, देवे को कछु नाहिं ।
क्या लें गुरु संतोषिये, यह हवस रही मन माहीं ।।
जब नाम की ताक़त आ जाती है तो आन्तरिक शत्रुओं का बस नहीं चलता है, क्योंकि तब आपके पास इनसे लड़ने के लिए दूसरी शक्तियाँ आ जाती हैं। क्षमा, प्रेम, विचार आदि का बुरी शक्तियों से युद्ध चलता है । इनका राजा है— विवेक । आओ, विवेक की सेना तरफ चलते हैं । इसकी उत्पत्ति परम-पुरुष से हुई है।