करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंऐसे परम पुरुष के अंशू । प्रकटें प्रेम विवेक सुख वंशू ॥
अब यह रहता कहाँ है ?
ज्ञान देश प्रकाश राजधानी । आनन्द रूपी विवेक परवानी ॥
विवेक ज्ञान के देश में रहता है और जहाँ भी रहेगा, वहाँ ज्ञान का प्रकाश होगा। इसलिए यह आनन्द देने वाला है ।
सुनहु विवेक राज की सैना । जाके राज सकल सुख चैना ॥
उमरा धीरज धर्म औ ज्ञाना। प्रेम भक्ति बाजै निशाना ॥
निजानन्द महल पग धरई । श्रद्धा रानी सेवा करई ॥
निर्भय संत सुशील सुभाऊ । ये विवेक के पुत्र कहाऊ ॥
ऐसे नृप विवेक के अंशू । प्रगटे आद प्रेम सुख वंशू ॥
नृप विवेक की बेटी चारी । सत्य क्षमा दया शुभकारी ॥
सत्य संतोष साथ है ताही । नरक परत गहि राखत वाही॥
लौंडी सुबुद्धि सबन की लाजा । लो लौंडा पुरवे सब काजा ॥
सुचित शील और अनुरागी । क्षमा स्वभाव बैठे वैरागी ॥
रहनी क्षत्र चौतरा सुभाऊ । सहज सिंहासन बैठे राऊ ॥
व्रत वजीर और सत्य खवासू । मंत्री निरभै संग प्रकासू ॥
करहिं वेद ताके सुख सेवा । विवेक प्रसाद सदा सुखदेवा ॥
धीरज, धर्म और ज्ञान इसके बड़े-बड़े सरदार हैं, जो विवेक राजा की सहायता को हर क्षण तत्पर रहते हैं । इसकी रानी है - श्रद्धा । क्षमा, दया आदि बेटियाँ हैं और सुबुद्धि इस राजा की दासी है। वजीर है— दृढ़ व्रत, सेवक है— सत्य, मंत्री है— निर्भय ।
धीरज धर्म ज्ञान उमराऊ । ये राजा की करहिं सहाऊ ॥
उग्रज्ञान प्रकटे जब आयी । ताक्षण मोह सबै मिटि जायी ॥
ज्ञानवन्त जब प्रकट है आवै । काल जंजाल सबै मिटि जावै ॥
चौकी मोह सबै उठि भागे । भागे कपट ज्ञान के आगे ॥
दुष्ट काल पल लागत गयऊ। ज्ञान चक्षु हिरदय तब भयऊ ॥
कहौं को तुम को संसारा । काहे बंध्यो सो करो विचारा ॥
झूठे मोह बंधो संसारा। कहे बंध्यो सो करो विचारा॥
दंपति सुख संपति परिवारा। ये सब माया को विस्तारा ॥