भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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जैसे छिन बदरी की छाया । ऐसे गहे देत सुख माया ॥

ये सब सुख सपने को राजू । जागि परे कुछ सरे न काजू ॥

झूठे आहि देह को नाता । ये सब माया केर समातो ॥

तन जारे भस्म होय जाई । मेहरी मातु नातु नहिं काई ॥

ऐसो ज्ञान मन प्रगटे आयी । तो कहु मोह कहाँ ठहराई॥

धैर्य, धर्म और ज्ञान विवेक राजा की सहायता करने वाले हैं। जब ज्ञान हृदय में आता है तो काल का जंजाल मिट जाता है। मोह ने सारे संसार को बाँधा हुआ है। पर ज्ञान कहता है कि सुख, संपति, पत्नी आदि सब माया है। जैसे बदली थोड़ी देर के लिए छाया देती है, ऐसे ही माया का सुख थोड़ी देर का है। सारे सुख सपने की तरह हैं, बाद में कोई काम नहीं आयेगा । देह के रिश्ते भी झूठे हैं, शरीर के नष्ट हो जाने पर कोई माता, पिता, पत्नी आदि का नाता नहीं रह जाता। जब ऐसा ज्ञान हृदय में आ जाता है तो फिर मोह ठहर ही कहाँ सकता है! प्रगटे प्रेम विवेक दल, कहैं कबीर समझाई | उग्रज्ञान अति बली, जेहि सुनि मोह

डराई ॥

इस तरह सद्गुरु कृपा से नाम के साथ जब ये हृदय में आते हैं तो अंत:करण को प्रकाशित कर देते हैं । फिर विवेक की सेना का काम, क्रोध आदि से युद्ध होता है और अंत में ये शत्रु पराजित हो जाते हैं। भाइयो, यह कोई गप्प नहीं है, हरेक के भीतर एक युद्ध चल रहा है...... भीतरी विचारों का युद्ध । बड़ा ही अनोखा युद्ध है यह। जिसके पास नाम नहीं है, वो इन शत्रुओं पर विजय नहीं पा सकता है। नाम की ताक़त से ही ये काबू में आते हैं। आओ, इनके युद्ध को भी देखते है । साहिब ने इनकी लड़ाई का वर्णन भी किया है। विवेक की सेना को अपने राज्य में देख मोह चकित हो जाता है और उन्हें अपने देश से बाहर करने की कोशिश करता है ।

तबहिं मोह मंत्र उपजावा । पाखण्ड मित्र निकट बुलावा ॥

आये प्रबल विवेक नरेशा । लीन्हें आइ हमारो देशा ॥

अब मति मंत्र करो ठहराई । देश आपनो लेहु छुड़ायी ॥

कहै पाखण्ड सुनो मम राजा । यह बड़ कौन अहै सो काजा ॥

राजा मंत्र हमारो लीजै । प्रथम काम को आयसु दीजै ॥