करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंआगे आगे काम रह भरपूरी । ज्ञान विवेक जाहि सब दूरी ॥
तबहिं कम कहँ आयसु दियऊ। दल बादल सह रन सो गयऊ॥
मोह परेशान होकर अपने मित्र पाखण्ड को पास बुलाता है और कहता है कि विवेक की सेना ने हमारे देश पर कब्जा कर लिया है, अब हमारी कुछ नहीं चल रही है। ऐसे में पाखण्ड कहता है कि तुम काम को बुलाकर रण भूमि में भेजो। उसके रहते ज्ञान और विवेक नहीं रह सकते हैं। तब राजा मोह काम को बुलाकर सेना सहित रण में भेजता है । जब काम उठता है तो ज्ञान ही उससे टक्कर लेने आता है । काम जानता है तो केवल ज्ञान ही उससे टक्कर ले सकता है, पर मन के राज्य में ज्ञान को देखर काम चकित हो जाता है ।
काम कुपित वचन सुनायो । हमरे देश ज्ञान कहँ आयो ॥
उतै भयो काम उतै भयो ज्ञाना । मानस भूमि रच्यो संग्रामा ॥
काम कहता है कि हमारे देश में ज्ञान कहाँ से आ गया ! तब दोनों युद्ध को तैयार होते हैं ।
बहु रूप धरि काम तिवाना । तबही चलावै पाँचों बाना ॥
निष्फल कियो ताहि तब ज्ञाना । सुरति शब्द लै रहे निदाना ॥
काम मारन, मोहन आदि पाँचों बान चलाता है, पर ज्ञान सुरति करके सबको निष्फल कर देता है ।
ज्ञान विचार उठे गल गाज । काम निलज्ज न काहे भाजी ॥
धिग तिया धिग धिग अस राजा । निरघिन रुधिर मांस को साजा ॥
हाड़ त्वचा मुख रोम पसारा । नव द्वार बहैं अति खारा ॥
रेंट नाक मख कफ लारा । कीचड़ आँखिन काने छारा ॥
नख निख व्याधि सबै बिस्तारा । विष्ठा मूत्र तिया तन भारा॥
वाहि रांचैं सो पावैं दुक्खू | सपने नहिं तेहि होये सुक्खू ॥
दुख की राशि जो राजी कोई । साचो नरक आहि पुनि सोई ॥
यह कहि ज्ञान रहा ठहराई । काम सैन डारै विचलाई ॥
विचल्यो काम गयो खिसियाई । उग्र ज्ञान ते कछु न बसाई ॥
काम के आने पर ज्ञान विचार करता है कि स्त्री का शरीर तो गंदे माँस और खून से बना है। उसमें तो रोम-रोम से गंदगी ही निकल रही है। नौ द्वारों