करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंसे गंदगी-ही-गंदगी निकलती है । विष्ठा और मूत्र से उसकी इंद्रियाँ भरी हैं । मुख से लार और कफ, आँखों से कीच ...... । इनमें खोकर तो दुख ही पाना है। इसमें तो सपने में भी सुख नहीं मिल सकता है। यह तो नरक में गिरने वाली बात है। इस तरह ज्ञान की बात सुनकर काम की सेना विचलित हो जाती है और उसका कुछ भी बस नहीं चलता है। वो ज्ञान को हराने की बड़ी कोशिश करता है, पर अंत में उसे हारना ही पड़ता है ।
काम कहै यह नीकि सुंदरी । कहै ज्ञान यह विष की दहरी ॥
काम कहै याके ढिग जाई । ज्ञान कहै यह सांपिन अहई ॥
काम कहै कामिनी सम तूला । ज्ञान कहै यह विषकर मूला ॥
कामासक्त कुदृष्टि सन राता । ज्ञान सक्ति कर बोलै माता॥
यह सुनि बहुत अजब भौ कामा । सह्यो ज्ञान हमरो संग्रामा ॥
काम हर तरह से लुभाने का प्रयास करता है कि यह देखो सुन्दरी, पर ज्ञान उसे विष से भरी बताता है । काम कहता है कि उसके पास जाओ, पर ज्ञान कहता है कि यह तो सर्पिनी है, डस लेगी। काम उसे स्त्री की ओर कुदृष्टि से देखने को प्रेरित करता है, पर ज्ञान उसे माता कहकर पुकारता है । इस तरह काम युद्ध में ज्ञान से पराजित हो जाता है । नाम की ताक़त नहीं होगी भाइयो तो बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी पटकी दे देगा यह काम | तो काम के बाद क्रोध की बारी आती है ।
विचल्यो काम मोह पहँ गयऊ । सबहि वृत्तांत सुनावन लयऊ ॥
मन में मोह बहुत पछतायी। बोलाई क्रोध को बात सुनायी ॥
आई क्रोध जब ठाढे रहेऊ। तबही मोह क्रोध से कहे ऊ ॥
तामस तेज नाम मोहि क्रुद्धा । करु विवेक ज्ञान सो युद्धा ॥
कहँ अस प्रबल तोहि को सहै । तोरे तेज ज्ञान कहँ रहे ॥
पराजित काम तब मोह राजा के पास जाता है और अपनी पराजय की बात बताता है । तब मोह क्रोध को बुलाकर सारी बात बताता है और कहता है कि तुम्हारे आगे तो ज्ञान टिक ही नहीं सकता है, इसलिए तुम जाकर ज्ञान से युद्ध करो।
यह सुनि क्रोध चला समुहाई । करी गवन पहुँचा रन आई॥