भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

आगे आगे काम रह भरपूरी । ज्ञान विवेक जाहि सब दूरी ॥

तबहिं कम कहँ आयसु दियऊ। दल बादल सह रन सो गयऊ॥

मोह परेशान होकर अपने मित्र पाखण्ड को पास बुलाता है और कहता है कि विवेक की सेना ने हमारे देश पर कब्जा कर लिया है, अब हमारी कुछ नहीं चल रही है। ऐसे में पाखण्ड कहता है कि तुम काम को बुलाकर रण भूमि में भेजो। उसके रहते ज्ञान और विवेक नहीं रह सकते हैं। तब राजा मोह काम को बुलाकर सेना सहित रण में भेजता है । जब काम उठता है तो ज्ञान ही उससे टक्कर लेने आता है । काम जानता है तो केवल ज्ञान ही उससे टक्कर ले सकता है, पर मन के राज्य में ज्ञान को देखर काम चकित हो जाता है ।

काम कुपित वचन सुनायो । हमरे देश ज्ञान कहँ आयो ॥

उतै भयो काम उतै भयो ज्ञाना । मानस भूमि रच्यो संग्रामा ॥

काम कहता है कि हमारे देश में ज्ञान कहाँ से आ गया ! तब दोनों युद्ध को तैयार होते हैं ।

बहु रूप धरि काम तिवाना । तबही चलावै पाँचों बाना ॥

निष्फल कियो ताहि तब ज्ञाना । सुरति शब्द लै रहे निदाना ॥

काम मारन, मोहन आदि पाँचों बान चलाता है, पर ज्ञान सुरति करके सबको निष्फल कर देता है ।

ज्ञान विचार उठे गल गाज । काम निलज्ज न काहे भाजी ॥

धिग तिया धिग धिग अस राजा । निरघिन रुधिर मांस को साजा ॥

हाड़ त्वचा मुख रोम पसारा । नव द्वार बहैं अति खारा ॥

रेंट नाक मख कफ लारा । कीचड़ आँखिन काने छारा ॥

नख निख व्याधि सबै बिस्तारा । विष्ठा मूत्र तिया तन भारा॥

वाहि रांचैं सो पावैं दुक्खू | सपने नहिं तेहि होये सुक्खू ॥

दुख की राशि जो राजी कोई । साचो नरक आहि पुनि सोई ॥

यह कहि ज्ञान रहा ठहराई । काम सैन डारै विचलाई ॥

विचल्यो काम गयो खिसियाई । उग्र ज्ञान ते कछु न बसाई ॥

काम के आने पर ज्ञान विचार करता है कि स्त्री का शरीर तो गंदे माँस और खून से बना है। उसमें तो रोम-रोम से गंदगी ही निकल रही है। नौ द्वारों

से गंदगी-ही-गंदगी निकलती है । विष्ठा और मूत्र से उसकी इंद्रियाँ भरी हैं । मुख से लार और कफ, आँखों से कीच ...... । इनमें खोकर तो दुख ही पाना है। इसमें तो सपने में भी सुख नहीं मिल सकता है। यह तो नरक में गिरने वाली बात है। इस तरह ज्ञान की बात सुनकर काम की सेना विचलित हो जाती है और उसका कुछ भी बस नहीं चलता है। वो ज्ञान को हराने की बड़ी कोशिश करता है, पर अंत में उसे हारना ही पड़ता है ।

काम कहै यह नीकि सुंदरी । कहै ज्ञान यह विष की दहरी ॥

काम कहै याके ढिग जाई । ज्ञान कहै यह सांपिन अहई ॥

काम कहै कामिनी सम तूला । ज्ञान कहै यह विषकर मूला ॥

कामासक्त कुदृष्टि सन राता । ज्ञान सक्ति कर बोलै माता॥

यह सुनि बहुत अजब भौ कामा । सह्यो ज्ञान हमरो संग्रामा ॥

काम हर तरह से लुभाने का प्रयास करता है कि यह देखो सुन्दरी, पर ज्ञान उसे विष से भरी बताता है । काम कहता है कि उसके पास जाओ, पर ज्ञान कहता है कि यह तो सर्पिनी है, डस लेगी। काम उसे स्त्री की ओर कुदृष्टि से देखने को प्रेरित करता है, पर ज्ञान उसे माता कहकर पुकारता है । इस तरह काम युद्ध में ज्ञान से पराजित हो जाता है । नाम की ताक़त नहीं होगी भाइयो तो बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी पटकी दे देगा यह काम | तो काम के बाद क्रोध की बारी आती है ।

विचल्यो काम मोह पहँ गयऊ । सबहि वृत्तांत सुनावन लयऊ ॥

मन में मोह बहुत पछतायी। बोलाई क्रोध को बात सुनायी ॥

आई क्रोध जब ठाढे रहेऊ। तबही मोह क्रोध से कहे ऊ ॥

तामस तेज नाम मोहि क्रुद्धा । करु विवेक ज्ञान सो युद्धा ॥

कहँ अस प्रबल तोहि को सहै । तोरे तेज ज्ञान कहँ रहे ॥

पराजित काम तब मोह राजा के पास जाता है और अपनी पराजय की बात बताता है । तब मोह क्रोध को बुलाकर सारी बात बताता है और कहता है कि तुम्हारे आगे तो ज्ञान टिक ही नहीं सकता है, इसलिए तुम जाकर ज्ञान से युद्ध करो।

यह सुनि क्रोध चला समुहाई । करी गवन पहुँचा रन आई॥

तन में आई कियो परवेशा । छाड़ो ज्ञान हमारो देशा ॥

जो तुम निश्चय जीतो कामा । तो अब मोसों करो संग्रामा ॥

यह सुनकर क्रोध आता है और कहता है कि हे ज्ञान, हमारा देश छोड़ दो। अगर तुमने काम को जीत लिया है तो अब मुझसे युद्ध करके बताओ। हम राक्षसों की कहानियाँ सुनाते हैं अपने बच्चों को कि कितने क्रूर थे, भयानक थे। भाइयो, ये सबसे बड़े राक्षस हैं, जो आपके अन्दर में निवास कर रहे हैं। ...तो क्रोध की बात सुनकर ज्ञान अचंभित हो जाता है और जाकर विवेक राजा को यह बात बताता है। तब राजा मंत्री से पूछता है कि क्रोध को किस तरह से मारा जाए ?

तब राजा मंत्रिन सो कहै । प्रबल क्रोध केहि कारण दहै ॥

तब सबहि मिलि मंत्र विचारा । यह तो जाय क्षमा ते मारा॥

बोलि विवेक क्षमा सो कहै । तुम तो जाई क्रोध रन बहै ॥

भक्ति ज्ञान तेहि देइ सहाई । प्रबल क्रोध को मारो जाई ॥

यहि सुनि क्षमा रोपे रन आयी । लीन्हो शील जो धनुष चढ़ायी ॥

तब सब मिलकर विचार करते हैं कि यह तो क्षमा से मारा जाएगा । फिर विवेक क्षमा से कहता है कि तुम जाकर क्रोध को मारो, तुम्हारे साथ भक्ति और ज्ञान भी होंगे। यह सुन क्षमा युद्ध के मैदान में शील रूपी धनुष लेकर आती है।

देखि क्षमा क्रोध चले धायी। मनसा भूमि रोप्यो रन आयी ॥

मारन क्रोध उठे जब धायी । इतने क्षमा दीन्ह मुसकायी ॥

क्रोध आन तब गारी गयी । सुनि क्षमा अनबोली भयी ॥

मीठे वचन क्षमा अति बोलै । कोपै क्रोध पवन ज्यों डोले ॥

क्षमा से अगिन शीतल है जाई । जैसे जल में अग्नि बुझाई ॥

यहि विधि क्रोध क्षमा से भिरई । मानहु अंगार पानी महँ परई ॥

जैसे ही क्रोध मारने को भागता है, क्षमा मुस्करा देती है । क्रोध तब गाली बकता है, पर क्षमा चुप रहती है । फिर क्षमा मीठे वचन बोलती है, जिससे क्रोध की अग्नि वैसे ही शांत हो जाती है, जैसे जल में पड़कर अग्नि । इस तरह क्रोध और क्षमा की लड़ाई ऐसे लगती है मानो अँगार पानी में पड़ गया हो।

भलो भलो सब कोई कहै, रहि गइ क्षमा दुहाई । कहैं कबीर शीतल भये, गयी सो अनि बुझाई || क्षमा से ही क्रोध की आग बुझाई जा सकती है। जब भी क्रोध आता है तो आदमी का दिल करता है कि बस मारूँ, यूँ । गाली बकता है वो। इसलिए साहिब कह रहे हैं-

गाली आवत एक है, उलटत होत अनेक ।

कहैं कबीर न पलटिये, रहे एक की एक ॥

काम, क्रोध दोनों की पराजय देख मोह राजा अब लोभ को बुलाता है और समझाकर रण में भेजता है।

हार्यो क्रोध काम जब जाना । महामोह राजा डर माना ॥

चकित मोह मंत्री हँकरावा । सम्मुख मोह विवेक डरावा ॥

लोभ मंत्री आय भये ठाढ़ा। देखत राव छोभ अति बाढ़ा ॥

तब लोभ मोहहि माथ नवाई | कहु राजा मोहि काहे बुलाई ॥

हौं निज सर्व पाप का मूला । मोरे ते तुम रहत हौ फूला ॥

जीतौं ज्ञान विवेक हि जायी । देश आपनो लेउ छुड़ाई ॥

तो कहँ फिर मैं देहौं राजू । महामोह मोरे बल गाजू ॥

काम और क्रोध के रण में हार जाने से मोह राजा भयभीत हो जाता है। वो अपने मंत्री लोभ को बुलाता है। मंत्री आकर राजा को धैर्य बँधाता है, कहता है कि जब तक मैं हूँ, तब तक ज्ञान नहीं टिक सकता है । मैं सारे पापों की जड़ हूँ, मैं विवेक और ज्ञान को जीतकर अपना देश उनसे छुड़ा लूँगा। फिर आप निष्कंटक राज्य करना ।

यह सुन हर्ष मोह मन भयऊ । तत्क्षण लोभ को आयसु दयऊ॥

लोभ की बातें सुनकर राजा खुश हो जाता है और उसे आशीर्वाद देकर रण में भेजता है । लोभ आकर ज्ञान से कहता है-

जाई रण दियो लोभ हंकारा । ज्ञान तुम का करहु तकरारा ॥

हम बन्दोबस्त कियो परवेशा । छोड़ हु ज्ञान हमारो देशा ॥

तजहु ज्ञान तुम हमरो ठाऊँ । मैं प्रचण्ड लोभ मोर नाऊँ ॥

अब मैं रनमहँ अग्नि परजारौं । करि बल एक एक कै मारौ ॥

चिन्ता शक्ति पाप को मूला । कोउ न जानै मम डर भूला ॥

आशा तृष्णा तहाँ अति बहै । सुनत ज्ञान तहाँ नहिं रहै ॥

नहिं जानो तुम क्रोध औ कामा । हौं अति प्रबल लोभ मोहि नामा॥

छाड़हु ज्ञान हमारो ठाऊँ । नहिं तो तोहि धरि धरि खाऊँ ॥

लोभ जानकर ज्ञान से कहता है कि हमारा देश छोड़ दो, तुम नहीं जानते हो कि मेरा नाम लोभ है, मैं बड़ा प्रचण्ड हूँ, मेरे होते ज्ञान नहीं रह सकता है। यदि तुमने हमारा देश नहीं छोड़ा तो मैं तुम्हें खा जाऊँगा । तब ज्ञान पुनः विवेक के पास आता है और कहता है—

राजा मंत्र करो ठहराई । लोभ न मोपै जीतो जायी ॥

जो तुम लोभ जीतो आजू । तो तुम करो निकंटक राजू ॥

ज्ञान कहता है कि लोभ मुझसे नहीं जीता जाता । यदि तुम आज उसे जीत लो तो फर निर्विघ्न राज्य करना । तब मंत्री कहता है कि लोभ तो संतोष से जीता जा सकता है। अब राजा संतोष को बुलाता है और उसे समझाकर ज्ञान, भक्ति आदि के साथ रण में भेजता है।

इत भौ लोभ उत भौ संतोषा । मनसा भूमि उठयो रन रोषा ॥

लालच बाण लोभ संचारा । क्षमा बाण संतोष तेहि मारा ॥

लोभ चलावै धनुष कहँ खींची। संतोष लीन्ह सुमिरन की ऐंची ॥

चिंता शक्ति लोभ पठायी। ज्ञान शक्ति सो निष्फल जायी॥

अति दुख फाँसी लोभ कर लयऊ। उग्र ज्ञान संतोष मिटैऊ॥

परम संताप लोभ कर लयऊ । सो दया खड्ग ते निष्फल गयऊ ॥

अचेत शक्ति लोभ चलाई। जागृत शक्ति संतोष पठाई ॥

लोभ कहै पैसा तुम लहिये । संतोष कहै कुछ नहिं चाहिए ॥

लोभ कहै नीका है रूपा । संतोष कहै छाड़ि गये

भूपा ॥

लोभ कहै लेव कंचन मोरा । संतोष कहै जीवन है

थोरा ॥

लोभ कहै घोड़ा जोड़ा नीका। संतोष कहै कारज नहिं जीका ॥

लोभ कहै हीरा ल्यो लालू । संतोष कहै संग नहिं चालू ॥

साँच धनुष कर गहि धयऊ। चपल लोभ चापि दल गयऊ॥

उदासी शक्ति उरमें उपजायी । कंप्यो लोभ ज्यों विष खायी ॥

धीरज खड्ग गह्यो संतोषा । विचल्यो लोभ मिट्यो सब धोखा ॥

अब संतोष और लोभ का घमासान युद्ध होता है। लोभ हृदय में चिंता शक्ति छोड़ता है कि पैसे के बिना कुछ नहीं होगा, पर संतोष ज्ञान की शक्ति द्वारा उसका वार निष्फल कर देता है। लोभ पैसे का, सोने का, हीरे का लालच देता है, पर संतोष कहता है कि कुछ चाहिए ही नहीं, क्योंकि बड़े - बड़े राजा भी इसे यहीं छोड़ गये, कुछ भी साथ नहीं जाने वाला है और फिर जीवन की अवधि भी थोड़ी ही है। इस तरह हृदय में उदासी जगाकर लोभ को पराजित कर देता है संतोष । मोह खींझ उठता है...... अब तो राज गया । काम क्रोध विचले, विचले लोभ अकाज । महामोह मनमहँ झखे, गयो हमारो

राज ॥

काम, क्रोध और लोभ के हार जाने पर मोह मन ही मन खींझता है, भयभीत होता है कि अब तो राज्य गया।

मोह बुलाय गर्व सन कहेऊ । विचलो सबै एक तुम रहेऊ ॥

अब मेरो तुम करो सहाऊ । मोरे संग गर्व उठि धाऊ ॥

ज्ञान विवेक को मारि भगावें । जप तप साधन मारि सब लावें ॥

बोले गर्व मोह ते तबहीं। का विसात विवेक की अहहीं ॥

मेरो हंकार फिरे जेहि देशा। रहै न ज्ञान विचार को लेशा॥

बाकी सैन रहे सब जोही । लीन्ह बुलाय मोह तब ओही ॥

लीन्ह सजाय सैन बहु रंगी। मोह गर्व चढ़े एक संगी॥

मोह दल जब पहुँचे रणमाहीं । खबर भयो विवेक पहँ ताहीं ॥

सज्यो सेन तब बहु समुदाई । होय निशंक चले रण भाई ॥

उतते मोह रण रंग मचावा । इत विवेक राजा चढ़ि आवा॥

मोह तब अहंकार को बुलाकर कहता है कि अब तो एक तुम ही मेरे सहारे रह गये हो, जो ज्ञान और विवेक को मारकर मेरे देश से भगा सकते हो। आओ, हम दोनों मिलकर विवेक को अपने देश से निकाल दें। तब अहंकार कहता है कि तुम चिंता मत करो, मैं जहाँ रहता हूँ, वहाँ ज्ञान और विचार थोड़ा भी नहीं रह पाता है । तब मोह सारी सेना को सजाता है और स्वयं गर्व के साथ विराजमान होकर युद्ध के लिए प्रस्थान करता है। उधर विवेक को जब ख़बर मिलती है कि मोह राजा अहंकार को साथ लेकर पूरी सेना सहित आ रहा है तो वो भी अपनी सेना को तैयार कर रण में पहुँच जाता है ।

देख्यो गर्व मोह सकाना। करी क्रोध बाण संधाना ॥

बहु बड़ाई सो बोलन लाग्यो । ज्ञान विवेक कहाँ अब भाग्यो॥

आवे सन्मुख मोसे सब काहू । सुनत वचन नोह उत्साहू॥

बेसुध बाण गर्व तब धारा। उतते चैतन बाण सम्भारा॥

बल करि गर्व उठे समुदाई । तबहिं खवास गयो ठहराई॥

उग्रज्ञान राजा पहँ गयऊ। गर्व गँवार दृढ़ अति भयऊ॥

राजा मोकहँ आयुस देहू | कौन बाण ते

मारौ एहू ॥

गर्व का ज्ञान के साथ युद्ध होता है। उधर गर्व बेसुध करने वाले बा चलाता है तो इधर ज्ञान चेतना के बाण चलाता है, पर जब गर्व का नाश नहीं हो पाता तो वो विवेक राजा के पास जाता है और पूछता है कि गर्व को किस बाण से मारूँ ?

दीन तब बाण राजा कर लयऊ। हित कै उग्र ज्ञान कहि दयऊ ॥

मार्यो ज्ञान दीन तेहि बाना । हार्यो गर्व लाग्यो विरहाना ॥

तब राजा उसे दीनता का बाण देता है, जिसके लगते ही गर्व बिरह से व्याकुल हो उठता है। मोह अब पछताता है कि मेरी तो ख़ैर नहीं है।

गर्व मुये विकल होई, चले आप रणमाहिं ।

मनहिं मन पछतावई, मोर कुशल अब नाहिं ॥

अब मोह राजा खुद सामने आता है।

सुन्यो मोह चल्यो गलगाज । जीतन विवेक चला दल साजी ॥

पहुँची रण अस बोलै मोहा। कहाँ विवेक आऊ मम सोहा ॥

महा मोह राय मम नामा। सहो ज्ञान मोरो संग्रामा ॥

सबै उराव गयो हराय । अब नहिं होई तोर कुशलाई ॥

मैं बाण चलाओं जबहीं । क्षणमहँ होहु नाश तुम तबहीं ॥

मोह ललकारता है, विवेक और ज्ञान को कहता है कि मेरे सब सरदारों को तुमने हरा दिया है, अब तुम्हारी कुशल नहीं है, मैं अब तुम्हारा नाश कर दूँगा।

कहै विवेक बड़का हाको। करो लड़ाई नाशहि ताको॥

विवेक कहता है कि बातें करना बंद करो और लड़ाई करो, नाश तुम्हारा ही होना है।

सुनत मोह क्रोध तब कीन्हा । धनुष उठाय कर गहि लीन्हा ॥

ममता बाण तबहीं ताना । विचित्र बाण विवेक संधाना ॥

आलस शक्ति मोह उपजाई । चैतन शक्ति विवेक चलाई ॥

तब क्रोध करके मोह ममता रूपी बाण चलाता है । इधर विवेक विचित्र बाण चलाता है । मोह आलस्य शक्ति मारता है तो विवेक चेतन शक्ति मारता है। घोर युद्ध होता है ।

निद्रा शक्ति मोह संचारी । जाग्रत शक्ति विवेक तहँ मारी ॥

मोह फाँस माया बिस्तारी । विवेक विचार छिनक महँ टारी ॥

उपजायो तब मोह अँधेरा । हँसै विवेक यह बल तेरा ॥

प्रकाश बाण विवेक चलयऊ। ततक्षन अंधकार मिटि गयऊ ॥

सत्यबाण विवेक संचारा । असत खवास मोह कहँ मारा ॥

ज्ञान बाण विवेक जब छाड़ा। मूर्छित मोह महारथ पाड़ा॥

करि विवेक मोह तज दीढ़ी । विचल्यो मोह हृदय गौ पीढ़ी ॥

विच्लयो मोह दशहू दिशि गयऊ। सुपंथ सकल द्वन्द मिटि गयऊ ॥

अब मोह निद्रा शक्ति का संचार करता है, पर विवेक जाग्रत शक्ति चलाकर उसे निष्फल कर देता है । मोह माया जाल का विस्तार करता है जबकि विवेक विचार करके उससे बाहर निकल आता है । अब मोह अंधकार फैला देता है। यह देख विवेक हँसता है, कहता है कि यही तुम्हारी शक्ति है । फिर विवेक प्रकाश बाण चलाकर उसी अँधकार का नाश कर देता है । इसके बाद विवेक सत्य का बाण चलाकर मोह के सेवक असत्य को मार गिराता है । अब विवेक ज्ञान का बाण छोड़ता है, जिससे मोह भी मूर्छित हो जाता है।

कहै कबीर विवेक दल, अटल ज्ञान दल गाज ।

अब तो निर्मल हो गये, गये मोह दल भाज ॥

तो इस तरह नाम के बाद ये शत्रु कमज़ोर पड़ जाते हैं । रहते तो हैं, पर अपना काम नहीं कर पाते हैं, मूर्छित रहते हैं । साहिब तो कह रहे हैं-

सतगुरु मारा तानि के, शब्द सुरंगे बान ।

मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ न गहुँ कमान ॥

अब देखते हैं कि जिस नाम की इतनी महिमा है, वो नाम आया कहाँ से । सुनें ।

कहाँ से आया नाम साहिब (परम पुरुष) से बिछुड़ने के बाद आत्माएँ निरंजन की कैद में आ गयीं । अब निरंजन ने एक भी जीव को अमर लोक वापिस नहीं जाने दिया। बड़े बड़े ऋषि, मुनि, योगी, तपस्वी, सन्यासी आदि सब मन के इशारे पर नाचने लगे। निरंजन ने पाप और पुण्य में जीवों को बाँध दिया। नरक और स्वर्ग में अपने पाप और पुण्य का फल भोगकर जीव मृत्युलोक में चौरासी की यातना भोगने लगे। चौरासी की महाकष्टकारक यातना के बाद उन्हें मानव तन दिया गया, जो ज्ञानमय था, पर उसमें भी उन्हें अपार कष्ट दिया गया । मानव तन को मुक्ति की प्राप्ति के लिए मिला। पर जीव निरंजन तक ही पहुँच पाए, क्योंकि अमर लोक का ज्ञान देने वाला कोई न था । इस तरह एक भी जीव अमर लोक नहीं पहुँच पाया। निरंजन सब जीवों को तप्त शिला पर भून-भून कर खाने लगा, उन्हें कष्ट देने लगा। सब जीव त्राहि त्राहि कर उठे । उन्होंने पुकार की— कहा कि यदि कोई परमात्मा है तो हमें बचाओ, काल पुरुष का कष्ट हमसे सहा नहीं जा रहा है। जीवों की वो पुकार सातवें आकाश को चीरती हुई चौथे लोक में परम पुरुष के पास पहुँची । परम पुरुष जान गये कि जीव असहनीय कष्ट में हैं। तब उन्होंने कबीर साहिब को बुलाया, कहा कि जाओ, शून्य में निरंजन जीवों को बड़ा कष्ट दे रहा है, काल के दण्ड से जीवों को आजाद करके यहाँ ले आओ।

कर परनाम ज्ञानी चले, करन हंस के काज ।

जोपै काल न मानि हैं, तुम्हीं पुरुष को लाज ।।

ऐसे में साहिब हर युग में निरंजन के लोक में आते हैं और जीवों को काल के कष्ट से छुड़ाकर अमर - लोक ले जाते हैं। पहली बार जब साहिब धरती पर आए तो 100 साल रहकर वापिस गये। पर एक भी जीव को नहीं ले जा सके। परम-पुरुष ने पूछा कि कोई भी जीव नहीं लाए। कहा—नहीं । परम- पुरुष ने पूछा- क्यों? कहा कि जिसे सुबह समझाता हूँ, शाम को भुला देता है । जिसे शाम को समझाता हूँ, वो सुबह भुला देता है । तब परम- पुरुष ने कहा कि

यह लो गुप्त वस्तु (नाम) । जिस घट में यह वस्तु दे दोगे, उसपर काल का जोर नहीं चलेगा। तब परम-पुरुष को प्रणाम करके उनकी आज्ञा से साहिब शून्य में निरंजन के लोक की ओर आए। जब साहिब आने लगे तो निरंजन झांझरी दीप साहिब के सम्मुख आया, बोला- यहाँ क्यों आए हो ? वापिस जाओ । यहाँ पर निरंजन और साहिब के मध्य बड़ी गोष्ठी हुई। साहिब ने कहा— तासो को सुनो धर्मराई । जीव काज संसार सिधाई || तप्त शिला पर जीव जरावहु । जारि वारि निज स्वाद करावहु ||

तुम अस कष्ट जीव कह दीन्हा । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीन्हा ।।

जीव चिताय लोक लै जाऊँ । काल कष्ट से जीव बचाऊँ ।।

कहा कि हे निरंजन, तुमने बहुत छल, बल से जीवों को बाँधा हुआ है। तप्त शिला पर उन्हें अनेक कष्ट देकर आनन्द लूट रहे हो । परम पुरुष ने मुझे यहाँ भेजा है, मैं जीवों को यहाँ से छुड़ाकर अमर लोक ले जाऊँगा।

तबै निरंजन बोले बानी । सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ।।

तिनसौ साठ पैठ उरझेरा। कैसे हंसन लेव उबेरा ।।

निरंजन ने कहा कि मैंने सबको उलझाया हुआ है। 360 ऐसे स्थान हैं, जहाँ निरंजन ने थोड़ी-थोड़ी शक्तियाँ रखी हुई हैं। उन्हीं को देख जीव उलझा हुआ है। निरंजन ने कहा कि कैसे छुड़ाओगे हंसों को ?

तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुड़ावहुँ आनी ।।

पुरुष नाम को कहूँ समझाई। जम राजा तब छोड़ि पराई ।।

घाट घाट बैठे उरझेरा। हमरे शब्द ते होय निबेरा ।।

सुन रे काल दुष्ट अन्याई । शब्द संग हंसा घर जाई ||

साहिब ने कहा कि मेरे पास नाम है, जिसके सहारे हंस अमर लोक पहुँच जायेगा। अब तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे । तब निरंजन ने कहा-

का ज्ञानी देहो अधिकारा। हमरो नाहिं छूटे जम जारा ।।

पाँच पचीस तीन गुन आही । यह लै सकल शरीर बनाई ।।

तामें पाप पुण्य का वासा । मन बैठा ले हमरी फाँसा ।।

जहाँ तहाँ जग भरमावै । ज्ञान संधि कुछ रहन न पावै ।।

एक शब्द की केतिक आशा । मेरे हैं चौरासी फाँसा ।।

कहा कि तुम जीवों को मुझसे छुड़ाकर नहीं ले जा सकते हो। मैंने पाँच तत्वों से शरीर की रचना की है। उस पर फिर पाप पुण्य में जीवों को बाँध दिया है। फिर मन रूप में खुद भी अन्दर समाया हुआ हूँ। किसी को सोचने भी नहीं दे रहा हूँ कि क्या मामला है। तुम्हारा एक शब्द क्या करेगा, मैंने 84 लाख फाँसें बनाई हुई हैं, एक में से निकाल दूसरी में फेंक देता हूँ । बोले ज्ञानी शब्द विचारी । छूटे चौरासी की धारी ।

छूटै पाँच पचीस गुण तीनों । ऐसा शब्द पुरुष मैं दीन्हो ।।

साहिब ने कहा कि मेरे पास बड़ा जबरदस्त नाम है, जिस घट में दे दूँगा, उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, वो आजाद हो जायेगा । निरंजन ने कहा-

हे ज्ञानी का करो बढ़ाई। हमते नाहिं छूट जीव जाई ।।

इतने युग भये तुम देखा । ज्ञानी हंस न एको पेखा।।

का तुम करो का शब्द तुमारा । तीन लोक परलय कर डारा ।।

साधु संत हम देखी रीति । परलय परे सकल जगग जीति । ।

करम रेख बाँधै सब साधा। सुन नर मुनि सकलो जग बाँधा ।।

कहा कि इतने युग हो गये, क्या एक भी हंस सतलोक पहुँचा। मैंने इतनी ताक़त से जीवों को बाँधा हुआ है कि छूट नहीं सकते हैं। तुम और तुम्हारा एक शब्द क्या कर लेगा । मैं तीन लोक का नाश कर देता हूँ । निरंजन ने कई बार सृष्टि का प्रलय भी किया है । जलेबी बना देता है दुनिया की । ये सब काम साहिब के नहीं हैं। तो निरंजने ने कहा कि इतने पर भी कर्मों में जीव को बाँधा हुआ हूँ। आम आदमी की क्या बात है, देवता, मुनि आदि सबको बाँधा हुआ है। एक भी हंस को जाने नहीं दूँगा ।

ज्ञानी कहै काल अन्यायी । शब्द बिना तू खाय चबायी ।।

हंस हमारा शब्द अधिकारा । पुरुष परताप को करे सम्हारा ।।

नाम जपै अरु सुरति लगाई । मिले कर्म लागे नहीं काई ।।

शब्द मानि होय शब्द सरूपा । निश्चय हंसा होय अनूपा । ।

साहिब ने कहा कि हे निरंजन, तब इनके पास सच्चा नाम नहीं था, तूने खा लिया। अब मैं परम पुरुष का बड़ा जबरदस्त नाम दूँगा और तुम्हारा जोर अब जीव पर नहीं चलने दूँगा । पाप और पुण्य का ज्ञान भी जीव को अन्दर से होता जायेगा। नाम उनकी रक्षा करेगा और सब बंधनों से छुड़ाकर अमर - लोक ले जायेगा।

निरगुन काल तब बोले बानी । उरझे जीव सकल जमखानी।।

कैसे के तुम शब्द पसारो । कौने विधि तुम जीव उबारो ।।

ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँ चैं पुरुष की सरनी।।

जग में जीव क्रोध विकारा । कैसे पहुँचै पुरुष के द्वारा ।।

निरंजन ने कहा कि मैंने काम, क्रोधादि विकारों में जीव को फँसा दिया है। फिर वे परम पुरुष के लोक में कैसे पहुँचेंगे। इस पर भी यम के 14 दूत मैंने प्रत्येक शरीर में बिठाए हुए हैं। तुम उन्हें कैसे निकालोगे ? कहा कि जीव बड़ा गंदा हो गया है, तुम्हारी बात कोई नहीं मानेगा ।

ज्ञानी कहे करहु वरियारा। हमतो कीन्ह सकल निरवारा ।।

जोई ज्ञानी होय हमारा। काम क्रोध ते होय नियारा ।।

तृस्ना लोभहि देई बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ।।

नाम ध्यान बल हंसा घर जाई । क्या रे काल तुम करो बड़ाई ।।

साहिब ने कहा कि जिस शरीर में नाम दे दूँगा, वहाँ तेरा जोर नहीं चलेगा। वहाँ काम, क्रोध आदि कुछ नहीं कर सकेंगे और वो जीव निर्मल हो जायेगा। तुम उस जीव को छू भी नहीं पाओगे और वो हंस रूप होकर अपने देश चला जायेगा |

कहे निरंजन सुनो हो ज्ञानी । कथि हो ज्ञान तुम्हारी बानी ।।

युगत महात्म सबै बताऊँ । तुम्हारा नाम ले पंथ चलाऊँ ।।

अब निरंजन अपनी जगह पर आया, कहा कि मैं भी तुम्हारा नाम लेकर अपना पंथ चलाऊँगा यानी नकली नाम का प्रचार करूँगा । आज आप देखें तो सभी सद्गुरु बने हुए हैं, सभी संत बने हुए हैं, सभी नाम दे रहे हैं। यह सब निरंजन का ही खेल है। बात वे निरंजन की ही कर रहे हैं और मोहर संतों की लगा रखी है। तो निरंजन ने यह भी कहा

ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । वेद किताब भरम हम माना । ।

इनको माने सब संसारा । कलि में गंगा मुक्ति द्वारा।।

देही दान से उतरे पारा। ऐसे सुमृत कहे विचारा ।।

यह विधि जग जीव भुलाहीं । जरा मरन सब बंध बंधाहीं ।

सूतक पातक वेद विचारा। पूछ वेद से करहि संहारा ।।

एकादशी मुक्ति को भाई । योग जग्य करवे अधिकाई ॥

कहा कि मैंने वेद आदि के द्वारा कर्मकाण्डों में जीव को उलझाया हुआ है। सब इन्हीं को मानते हैं। वेद में निरंजन ने अपनी ही बात की है । उसी ने बनाए हैं वेद । इसलिए साहिब का रहस्य उसमें नहीं दिया। तो उसने कहा कि कोई तुम्हारी बात नहीं मानेगा, इसलिए मत जाओ दुनिया में । साहिब ने कहा—

सुनहु काल ज्ञान की संधि । छोरो जीव सकल की फँदी ।।

जब निज बीरा हंसा पावै । योग बरत तप सबै नसावै ।।

वेद किताब की छोड़े आसा । हंसा करे शब्द विस्वासा ।।

ताके निकट काल नहिं आवै । निज बीरा जो सुरत लगावै ।।

जोग बरत पतहू है छारा । अद्भुत नाम सदा रखवारा ।।

कहा कि जिसे नाम मिल जाएगा, उसका सारा वहम अन्दर से धुल जाएगा। वो फिर कर्मकाण्डों को छोड़कर नाम में ही विश्वास करेगा । नाम सदा उसकी रक्षा करेगा । काल उसके निकट नहीं आ पायेगा । नोट- सत्यपुरुष का पाँचवां पुत्र निरंजन है जिसको निराकार, निरंजन, नारायण, अथवा मन आदि नामों से जाना जाता है जिसे संसारिक लोग राम, ब्रह्मा, आदि निरंजन, कादर, क्रीम, प्रमेश्वर, प्रमात्मा, हरी, हरि, अद्वैत, भगवान, तथा अलख निरंजन आदि नामों से याद करते हैं । इसी निरंजन के ग्रंथ पोथियों में हज़ारों नाम लिखे गए हैं।

जब निरंजन की बात न चली, वो कटने लगा तो उसने क्रोधित होकर कहा कि तुमने पहले भी मुझे मानसरोवर से निकाला था और अब मेरी दुनिया में तुम आए हो, इसलिए मैं बदला भी लूँगा । यह कह निरंजन ने विकराल हाथी का रूप धारण किया और साहिब पर झपटा।

ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा। पकड़ सूँड़ दाँत गहि मोरा ।।

मारेऊ शब्द पाँय पर पेली । तोर सूँड़ समुद्र गहि मेली ।।

पुरुष रूप तबहीं पुनि धारा । जौन सरूप सकल औतारा ।।

साहिब कह रहे हैं कि तब मैंने वहाँ परम पुरुष का रूप धारण किया, अपने मूल रूप में आया और उसकी सूँड़ पकड़कर समुद्र में फेंक दिया। तब निरंजन अधीन हुआ, कहा कि क्षमा करो, मैंने आपको पहचाना नहीं था, आप तो स्वयं साहिब हैं, मेरा बड़ा भाग्य है कि जो आपने मुझे दर्शन दिये। अब आप दुनिया में जाएँ, पर मेरी भी एक विनती सुनें। कहा कि यदि आप सभी जीवों को अपने लोक ले जायेंगे तो मेरे शाप का क्या होगा । (क्योंकि निरंजन को रोज एक लाख जीव निगलने का शाप मिला था ) । निरंजने ने कहा कि जो जीव पाप कर्म करेंगे, क्या वो भी पार हो जायेंगे । तब साहिब ने कहा कि जो जीव मेरे शब्द पर चलेंगे, मेरा कहा मानेंगे, उन्हें तुम हाथ भी नहीं लगाओगे। पर दूसरी ओर जो मेरे शब्द के विपरीत चलेंगे, उन्हें तुम ले जाना ।

सुनो निरंजन वचन हमारा। नहीं सत्त वो जीव तुम्हारा ।।

इस तरह साहिब का निरंजन से करार है । यही कारण है कि मैं आपसे कह रहा हूँ कि भजन हो सके तो करना नहीं तो कोई बात नहीं है, पर नाम लेकर ग़लत नहीं चलना। जो वस्तु दी, उसे संभालना। किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करना । सत्य नाम निज औषधी, खरी नियत से खाय

औषध खाय अरु पथ रहै, ताकी वेदन जाय ।।

6. जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है

जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्माण्ड

में कहीं नहीं है

है

जो वस्तु मेरे पास है, वो ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है । यह बात अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ । इसमें कहीं भी अहंकार की बात नहीं है । यह अलग बात है कि लोग अपनी समझ से इसका कैसा भी अर्थ लगाएँ। पर यह बात बड़े गहरे विश्वास के साथ बोल रहा हूँ। यह अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ । अहंकार से बड़ा परहेज करता हूँ। मेरा मानना है कि जैसे शरीर को कैंसर खा जाता है, इसी तरह अहंकार ज्ञान को खा जाता है । कितना भी ज्ञानी हो, अहंकार उसे ख़त्म कर देगा। इसलिए मैं अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ । यह बात सत्य बोल रहा हूँ। मैं इस बात की पुष्टि कर सकता हूँ। सत्य मानना, मैं अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ। मैं यह बात विचार करके बोल रहा हूँ, मैं यह बात विवेक से बोल रहा हूँ, मैं यह बात ज्ञान से बोल रहा हूँ। मैं इन शब्दों को प्रमाणित कर सकता हूँ। हम अपने आस-पास में नाना मत-मतान्तर देख रहे हैं। अगर ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि 70 प्रतिशत माँस, शराब का इस्तेमाल करते हैं । हालांकि वो भक्ति की बात भी कर रहे हैं, हालांकि वो संत- मत की बात भी बोल रहे हैं, पर उनका खान-पान ठीक नहीं है, उनकी आचार संहिता भी ठीक नहीं है, कर्म से भी वो उत्तम नहीं हैं। बहुत डाउन हैं वे । आप खान-पान में भी बेहतरीन हैं और कर्म से भी बड़ा अन्तर है । वो छल, कपट, धोखा आदि कर रहे हैं, लेकिन आपकी जिंदगी एक स्थिर जिंदगी है । आप चाहकर भी ग़लत नहीं कर पाते हैं। जैसे ही करने जाते हैं, एक शक्ति आपको सतर्क करती है, आपको सावधान करती है । यह प्रासंगिक बदलाव हरेक नामी की जिंदगी में दिखाई देता है। और फिर सुरक्षा के मामले में भी आप लाजवाब हैं। ज्ञान के

मामले में भी आप परम- ज्ञानी हैं। क्या करने योग्य है, क्या नहीं करने योग्य है, यह भी आपको समझाने की ज़रूरत नहीं है । जैसे ही आप कोई ग़लती करने जाते हैं, अन्दर से एक प्रेरणा मिलती है, आपको वो ताक़त चेतन करती है, बताती है कि यह न किया जाए । यह ज्ञान आपके पास है । आप महसूस करते हैं। भक्ति-क्षेत्र में आप अनूठे हैं। जब आप अन्य मत-मतान्तरों की तरफ देखते हैं तो एक बात का पता चलता है कि कभी वे भैरो को मानते हैं, कभी काली जी को मानते हैं, कभी कुछ करते हैं। इसका बोध मिलता है, इसकी जानकारी मिलती है । वे भ्रम में हैं; वे अनिश्चित हैं । आपको इसका ज्ञान है कि दुष्टात्माएँ कैसे व्यवधान डालती हैं । आपको इसका बोध हो जाता होगा । आप भक्ति में मजबूत हैं । आप दुनिया से निराले हैं। दुनिया का हरेक आदमी मन के नशे में है, मन की पकड़ में है । हरेक को मन, जैसे चाहे, नचाता है, पर आप मुक्त हैं । आपके ऊपर मन का ज़ोर नहीं चल पाता है। साहिब कह तो रहे हैं-

नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह जग बाँध नचावे ॥

नि:संदेह इस मन का कोई ज़ोर आपपर नहीं चल रहा है । मन बेबस है | पूरी दुनिया को यह नचा रहा है। एक नशा - सा मन का सबके ऊपर है। माया का एक नशा-सा सबके ऊपर छाया है । पर आप मन की पकड़ से आज़ाद हैं। मन का नशा छाता है तो काम, क्रोध आदि जाग्रत होते हैं । ये चीजें आपमें भी हैं, पर आपके पूरे कण्ट्रोल में हैं। आपका ये चीजें कुछ नहीं बिगाड़ पा रही हैं। आपमें आध्यात्मिक शक्ति भरपूर है । आपके पंथ में लाजवाब शक्तियाँ हैं । आप मन, कर्म, वचन से किसी को पीड़ा नहीं देने वाले, अन्दर से शांत और सुखी हैं। एक ताक़त आपको प्रेरित कर रही है । आप पूरे सुरक्षित हैं। भूत-प्रेत आपके पास नहीं आ पा रहे हैं। आपके पास आना तो दूर, यदि आप किसी ऐसे ग़ैरनामी के पास बैठकर नाम करेंगे जिसके पास में भूत होगा तो वहाँ से भी भाग जायेगा । आपपर कोई जादू, टोना, सिद्धि ताक़त प्रभाव नहीं डाल पा रही है। मेरा मानना है कि साहिब एक बात की अनुभूति दिलाता है। जीवन में एक बार, दो बार या कई बार, पर दिलाता है। यह काम साहिब खुद करता है । एक बार धर्मदास जी उदास हो गये । साहिब अपनी जगह धर्मदास को देकर

जा रहे थे। धर्मदास ने कहा कि काल - पुरुष में जान है; सबको भ्रमित कर दिया; मुझसे कैसे होगा ? लोगों को भक्ति में कैसे जोडूंगा? साहिब ने कहा कि चिंता मत कर ।

पुरुष शक्ति जब आन समाई । तब नहीं रोके काल कसाई ॥

कहा कि जब परम-पुरुष की ताक़त आकर समायेगी तो काल कुछ नहीं कर पायेगा। जिस दिन नाम मिलता है उस दिन परम - पुरुष की ताक़त आकर समाती है। तब काल का ज़ोर नहीं चलता है । आप इन बातों पर मनन करें। इनमें से कितनी बातें आपके साथ में हो रही हैं। यह आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता है । आपके साथ में एक ताक़त है, यह मेरी वाणी से अधिक आप स्वयं जान सकते हैं। मुझे आपको कुछ समझाने की ज़रूरत ही नहीं है । मेरी वाइब्रेशन ही आपको समझा देगी। सत्संग में बैठकर उलटी गिनती गिनूँगा तो भी समझ आ जायेगी और आप कभी बोर भी नहीं होंगे। वाणी से समझाना तो एक बहाना है । रावण का दिल बदला ही नहीं। राम जी थे । दुर्योधन का दिल बदला ही नहीं। कृष्ण जी थे । पर साहिब कह रहे हैं- सतगुरु मोर रंगरेज, चुनरि मोरी

रंग डारी ॥

यह काम बड़ा मुश्किल है । इस पंथ में आने में रुकावटे हैं कुछ । निरंजन रुकावटें डालता है । मेरे लिए लोग जो-जो भी कह रहे हैं, अच्छा ही कह रहे हैं, ठीक ही कह रहे हैं। केवल अपनी शैली बदल रहे हैं। मैं सब चीज़ सकारात्मक लेता हूँ। मैं नकारात्मक में जाता ही नहीं हूँ । कुछ लोग कह रहे हैं कि इसके पास हिप्नोटिज्म है। इससे उच्चाटन किया जाता है। सही तो कह रहे हैं। जो वस्तु मेरे पास है, वो किसी के पास नहीं है। पर वो हिप्नोटिज्म कह रहे हैं । संतों के शरीर से अध्यात्म किरणें निकलती हैं; वो जगाती हैं । तो उन्हें यह हिप्नोटिज्म लग रहा है । फिर दूसरा कह रहे हैं कि धर्म बदल देता है । यह भी सही है। दुनिया निरंजन के धर्म का पालन कर रही है, मैं परम-पुरुष के धर्म की ओर ले चल रहा हूँ। मैं कुछ भी नकारात्मक नहीं ले रहा हूँ। मैं उनकी बातों को ठीक-ठीक मान रहा हूँ। तो आपका बदलाव मामूली नहीं है। आप दुनिया से निराले हैं । आपके खोटे कर्मों को निकाला गया है। अगर गुरु चेले की ग़लती बोलने में

झिझक रहा है तो समझना कि वो गुरु मर चुका है। मैं उदण्ड नहीं हूँ, पर आप यह नहीं सोचना कि आप ग़लती करें और मैं कुछ न कहूँ। यह नहीं सोचना । गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट । अन्तर हाथ सम्हार दे, बाहर मारै

चोट ॥

आपमें जो बदलाव है, वो मामूली नहीं है । आप दुनिया से निराले हैं। जो काम आपसे नहीं संभलने वाला होता है, उसमें एक ताक़त आकर आपको मदद दे जाती है। वो एहसास करवाती है कि साथ में हूँ । मैंने जो कहा कि ‘जो वस्तु मेरे पास है, वो कहीं नहीं है, ' प्रमाणित करता हूँ। पूर्ण गुरु आपको बदल देता है, दिव्य-दृष्टि खोल देता है । 10वाँ द्वार खुलता है तो चाँद, तारे आदि नज़र आते हैं, पर जब 11वाँ द्वार खुलता है तो मन नज़र आता है। वो दिव्य-दृष्टि खुलेगी तो काम, क्रोध दिखेगा । अन्यथा कितनी भी तपस्या करना, यह मन काबू में नहीं आयेगा, यह समझ नहीं आयेगा । कपिल मुनि, पाराशर ऋषि आदि ने कम तप नहीं किया था । पर नहीं हो सका मन काबू में । इसलिए—

नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह मन बाँध नचावे ॥

जब पूर्ण गुरु एक ताक़त रोपित कर देता है तो अन्दर का पूरा खेल दिखने लगता है, अपने अन्दर के शत्रुओं को साधक समझने लगता है, मन समझ में आ जाता है । मैंने बार-बार कहा है कि 'जो वस्तु मेरे पास है वो कहीं नहीं है'। यह सुन एक ने मुझसे कहा कि जो आप कहते हैं कि जो पॉवर मेरे पास है, किसी के पास नहीं, इसे प्रमाणित करो। मैंने उससे कहा कि मैं पॉवर नहीं बोल रहा हूँ, वस्तु बोल रहा हूँ । शब्दों की तरफ ध्यान दो । जैसे कोई दुकानदार कहता है कि जो मिर्ची मेरे पास है, कहीं नहीं मिल सकती। वो कहता है कि यह फलानी - फलानी जगह से आई है । ... तो मैं जिस 'वस्तु ं की बात कर रहा हूँ, वो भी इस संसार की नहीं है, तीन लोक में कहीं नहीं है। वो चौथे लोक की वस्तु है। जब वो वस्तु मिलती है तो तीन चीज़ें आ जाती हैं। मैंने अपनी इस चीज़ का अनुभव एक-दो पर नहीं, बल्कि लाखों

लोगों पर किया है । इसलिए इसमें कोई संशय नहीं है, पक्की बात है । तीन चीजें शर्तिया होती हैं। जिसे भी मैं नाम देता हूँ, तीन चीज़ें पक्का हो जाती हैं— 1. आत्मा और मन अलग हो जाते हैं। 2. संसार का आकर्षण समाप्त हो जाता है । 3. एक पूर्ण सुरक्षा मिल जाती है। असर सामने है। मेरा हर नामी नाम पाकर बदल जाता है। हर इंसान मन तरंग में नाच रहा है । मन प्रबल है । पर मेरे नामी के साथ अब ऐसा नहीं हो पा रहा है। नाम पाने के बाद मेरा हर नामी चेतन हो जाता है । अन्य पंथों के लोगों के साथ मेरे नामी की तुलना की जाए तो उनका अपने ऊपर कोई होल्ड नहीं मिलता है, कोई आध्यात्मिकता नहीं मिलती है। मेरे नामी अपने को सबसे अलग पाते हैं, उन्हें अपने अन्य साथी बेवकूफ़ लगते हैं, उनकी हरकतें पागलों वाली लगती हैं, क्योंकि उनके मूड का कोई पता नहीं होता कि कब अच्छे बन जाएँ और कब गंदे | कब मूड खराब हो जाए, कोई पता नहीं । यानी मन पर कोई होल्ड नहीं होता, इसलिए पागल लगते हैं । मेरे नामी का मन पर होल्ड होता है, क्योंकि नाम के साथ मैं मन से उसकी आत्मा का बिलगीकरण कर देता हूँ, दोनों को अलग कर देता हूँ, जिससे मन समझ में आने लगता है। यह काम दुनिया में सबसे कठिन है, जो कोई नहीं कर सकता है। जब मन समझ आने लग जाता है तो दुनिया फीकी लगने लग जाती है, उसका आकर्षण समाप्त होने लग जाता है । फिर तीसरा हर नामी को लगता है कि उसके साथ में एक सबल संरक्षक है, हरेक को वो संरक्षक अनुभव होता है । सच है, यह जो वस्तु मेरे पास है, किसी के पास नहीं है। इस वस्तु से मन की दुनिया समाप्त होती जाती है और आत्मा का रूप समझ आने लग जाता है I ध्यान क्यों किया जा रहा है ? यह जानने के लिए कि मैं क्या हूँ ? गुरु आत्मा और मन को अलग कर देता है । किसी कीमत पर यह काम अपनी ताकत से नहीं हो सकता है । मन ने ऐसे उलझा दिया है कि आत्मा कुछ समझ नहीं पा रही है। मन कहता है कि रोटी खानी है तो आत्मा कहती है कि यही मेरी इच्छा है। इस तरह मन ने आत्मा को अपने पीछे लगा रखा है। आत्मा सभी इच्छाओं में, कल्पनाओं में घूम रही है। जितने भी कर्म मनुष्य कर रहा है,

सभी उलझन वाले हैं । जब भी कोई चाहे कि इससे निकलें तो यह नहीं निकलने दे रहा है। इसकी पकड़ बड़ी दूर तक है। धन-दौलत दे देगा, सिद्धियाँ-शक्तियाँ दे देगा, पर अपने से आगे नहीं जाने देगा। एक अदद गुरु आपको बाहर निकाल देगा। मन की पहली ताकत है- अज्ञान । मन आत्मा में ऐसे घुल-मिल गया है कि बड़ा झमेला हो गया है। आत्मा यह झमेला लिए-लिए घूम रही है, इसे समझ नहीं पा रही है। चाहे कोई करोड़ों उपाय भी कर ले, इस झमेले को समझ नहीं सकता है, मन की सीमा से बाहर नहीं जा सकता है। गुरु यथार्थ में आत्म रूप दिखाता है। हंस की चोंच में गुण है। वो दूध पीता है । अगर उसमें पानी मिला हो तो वो उसे छोड़ देता है, केवल दूध-दूध पी जाता है। यदि पाव दूध में पाव पानी मिलाकर दे दिया जाए तो वो पूरा दूध पी लेगा और पूरा पानी छोड़ देगा। यह काम और कोई नहीं कर सकता है। केवल हंस। ऐसे ही पूर्ण सद्गुरु की सुरति में यह ताकत है कि आत्मा और मन को अलग कर सकता है । यह काम गुरु पल में कर देता है । फिर आत्मा दुबारा मन में नहीं समा सकती । चाहकर भी नहीं । जैसे- दूध को मथ घृत न्यारा किया,

पलट कर फिर ताहिं में नाहिं समाई ॥

दूध से घी बना लिया तो फिर दूध नहीं हो सकता। यदि दही को मथ मक्खन निकाल लिया तो फिर चाह कर भी उसमें नहीं समा सकता। जब पूर्ण गुरु आत्मा को मन से अलग कर देता है तो फिर आत्मा मन में नहीं समा सकती है। कितनी भी ताक़त लगा ले कोई, यह काम नहीं कर सकता है । पर-

कोटि जन्म का पथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय ॥

तब एक संतुष्टि मिलती है । जैसे काँटा लगा हो तो निकालने पर आराम मिलता है। ऐसे ही मन का काँटा गुरु निकाल देता है । फिर आप चाहकर भी जगत के पदार्थों में रम नहीं पायेंगे । जगत के पदार्थ आपको रोमांचित नहीं कर पायेंगे। ऐसे पर ही कहा- सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण । नाम अकेला रह

गया, पाया पद निर्माण ॥