भारतकोश
काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)

काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)

Kasika Vritti of Vamana and Jayaditya on Panini Sutras

आचार्य वामन एवं जयादित्य (सम्पादक: पण्डित बालशास्त्री) द्वारा

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८१८ ॥ काशिका ॥ ८ ॥ ४ ॥ ष्टुना ष्टुः ॥ ४१ ॥ स्तोदिति वर्तते। सकारतवर्गयोः षकारटवर्गाभ्यां संनिपाते षकारटव- र्गावादेशौ भवतः। अत्रापि तथैव संख्यातानुदेशाभावः। षकारेण सकारस्य। वृक्षष्षण्डे। प्लक्षष्षण्डे। तस्यैव टवर्गेण। वृक्षष्टीकते। प्लक्षष्टीकते। वृक्षष्टकारः। प्लक्षष्टकारः। तवर्गस्य षकारेण। पेष्टा। पेष्टुम्। पेष्टव्यम्। कृषीष्ट। कृषीष्ठाः। तस्यैव टवर्गेण। अग्निचित्टीकते। सोमसुट्टीकते। अग्निचिट्टकारः। सोमसुट्ट- कारः। अग्निचिड्डीनः। सोमसुड्डीनः। अग्निचिट् ढौकते। सोमसुट् ढौकते। अग्निचित्षण्ढकारः। सोमसुत्षण्ढकारः। अतृट्। अदृतृत्ति। अदृड्। अदृह्नि॥ न पदान्ताट्टोरनाम् ॥ ४२ ॥ पदान