काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीः ॥
उपोद्घात
का
हिन्दी अनुवाद
आयुष्याम्नायमाम्नाय नानोन्मेषैर्विवर्ध्य च । जगतः श्रेयसे सक्ताः स्मरणीया दयाभयाः ।। १ ।।
यत्प्रतिभरसासिक्त आयुर्वेद महातरुः । फलत्यद्यापि जगति महात्मानो जयन्ति ते ।। २ ।।
आयु के वेद अर्थात् आयुर्वेद को जानकर तथा उसे नाना उपायों द्वारा बढ़ाकर जो जगत् के कल्याण में लगे हुए हैं, उन स्मरणीय, दयालु तथा जिनकी प्रतिभारूपी रस से सींचा हुआ यह आयुर्वेद रूपी महावृक्ष आज तक जगत् में फल फूल रहा है, उन महापुरुषों की जय हो ।।१-२।।
उपोद्घातप्रस्ताव
किसी भी वस्तु को देखकर विद्वान् प्रेक्षकों को यह स्वतः जिज्ञासा होती है कि यह क्या है तथा इसका क्या प्रयोजन है ? जबतक इसका ज्ञान नहीं होता तब तक विद्वानों¹ की दृष्टि उस विषय में विशेषरूप से प्रवृत्त नहीं होती । सामान्य ज्ञान हो जाने पर विशेष जिज्ञासा होती है । तथा बाह्य सामान्य ज्ञान हो जाने पर लोग अभीप्सित विषय को ग्रहण करने तथा विपरीत विषय को छोड़ने का प्रयत्न करते हैं । इस प्रारम्भिक आकांक्षा को शान्त करने के लिये शास्त्र के आदि में अनुबन्ध² निर्देश की तरह आजकल विद्वान् लोग प्रस्तुत ग्रन्थ के कुछ विशेष २ अन्तरङ्ग तथा बहिरङ्ग विषयों को भूमिका तथा प्रस्तावना आदि के रूप में देकर ग्रन्थ को उपस्थित करते हैं । इस उपर्युक्त आचार को दृष्टि में रखते हुए तथा अन्य विषयों को देखते हुए हमारे मन में जो विचार उत्पन्न हुए हैं उन्हें विद्वानों के सामने हम संक्षेप में प्रकट करते हैं ।
इस उपोद्घात में पांच विषय हैं—
(१) उपक्रम सहित आयुर्वेद संबन्धी विवरण ।
(२) ग्रन्थों के परिचयपूर्वक आचार्यों का विवरण ।
१. सिद्धार्थं सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते । शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः संबन्धः सप्रयोजनः ।। (श्लोकवार्तिकस्योपक्रमे)
(अर्थात् श्रोता ज्ञातव्य विषय तथा उसके संबन्ध को सुनने के लिये प्रवृत्त होता है । अतः शास्त्र के आदि में प्रयोजन सहित संबन्ध बतला देना चाहिये) ।
२. प्रत्येक शास्त्र के चार अनुबन्ध (संबन्ध रखने वाले विषय) होते हैं । १. अधिकारी २. विषय ३. संबन्ध ४. प्रयोजन (अनुवादक)
१२ का.सं.