काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
(३) संस्कार तुलना सहित विषय।
(४) भारतीय चिकित्सा का समर्थन।
(५) उपसंहार।
(१) उपक्रम सहित आयुर्वेद संबन्धी विवरण
यह एक निर्विवाद तथ्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिये सुख ही अन्तिम ध्येय है। विद्वान् लोग सुख की समीक्षा दो प्रकार से करते हैं। प्रथम दुःख का निवारण कर देना (Negative) तथा दूसरा दुख का विरोधी भाव (Positive) अर्थात् दुःख का उत्पन्न ही न होना। दोनों प्रकार से इस सुख को प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति चाहता है। दुख के उत्पन्न होने पर उसकी निवृत्ति अथवा सुख का उदय होना संभव नहीं। बाधना (कष्ट) लक्षण वाला दुःख संसार में सबसे अधिक अप्रिय वस्तु होती है। वह दुःख भूतकाल की वस्तु हो जाने पर भी स्मरण किया जाने पर कष्ट की अनुभूति कराता है, उसको वर्तमान अवस्था में प्रत्येक संभव उपायों से दूर करने का प्रयत्न किया जाता है, तथा उसके भविष्य की कल्पना करके उसे पहले से ही दूर करने का प्रयत्न किया जाता है। कोई भी ऐसा सहृदय व्यक्ति नहीं होगा जो अपने लिये दुःख चाहता हो। संसार के जितने भी व्यापार (क्रियायें) हैं, उन सबका प्रयत्न दुख को दूर करके सुख की साधना करना है। परन्तु सुख की प्राप्ति में लगा हुआ भी यह संसार असम्यक् ज्ञान के कारण हितकारी मार्ग को छोड़कर अहितकर मार्ग में प्रवृत्त हुआ दुःख से आक्रान्त किया जा रहा है। इस सुख के मार्ग को ही ढूंढने में सब शास्त्र तथा लोग आज तक लगे रहे हैं तथा इस समय भी लगे हुए हैं। दुःख तीन प्रकार का होता है। मन, शरीर तथा आत्मा को निमित्त करके होने वाला आध्यात्मिक, पञ्चमहाभूतों से बने हुए प्राणी समूह को निमित्त करके होने वाला आधिभौतिक तथा ग्रह यक्ष राक्षस विनायक (गणेश) आदि देवसमूह को निमित्त करके होने वाला आधिदैविक दुःख कहलाता है। इन नाना प्रस्थानों में से जिस किसी दुःख विशेष को लक्ष्य करके उस २ दुख के निवारण के उपायस्वरूप आध्यात्मिक सांख्य आदि दर्शन, उपासनाशास्त्र तथा नीति आदि ऐहिक शास्त्र उपयोगी होती हैं।
परन्तु इन सब आध्यात्मिक तथा ऐहिक शास्त्र आदियों का तभी लाभ है जब कि प्राणियों को उत्तम जीवन प्राप्त हुआ हो। विद्वान् व्यक्ति नवीन उत्साह से युक्त होकर तथा उत्तम उपायों को जानकर उनके द्वारा परिष्कृत मार्ग से अपनी उन्नति करता हुआ क्रमशः अभीष्ट स्थान पर पहुंचने में समर्थ हो जाता है। इसके विपरीत अधम जीवन से दुःखी व्यक्ति कितना ही प्रयत्न क्यों न करे किसी कार्य को सिद्ध करने में समर्थ नहीं होता। इसलिए लोगों को सुजीवन के उपायों का प्रतिपादन करने वाले तथा अन्य भी शास्त्रों का सहारा लेना पड़ता है। सर्व प्रथम शारीरिक कष्टों के अभाव से इस जीवन द्वारा प्राप्तव्य ऐहिक तथा पारलौकिक उन्नति प्राप्त होती है। हमारा यह शरीर नाना प्रकार के स्थूल तथा अत्यन्त सूक्ष्म अवयवों तथा उन २ अवयवों की गहन क्रियाओं द्वारा यथावत् न जान सकने योग्य परमात्मा की कलास्वरूप एक विशाल मशीन के समान दिखाई देता है। उस मशीन के स्थूल या सूक्ष्म किसी भी अंश में होने वाली दृश्य या अदृश्य कोई भी विकृति न केवल समस्त शरीर को अपितु उससे अनुप्राणित शरीर-शरीरि समवायात्मक आत्मा को भी विकृत कर देती है। शारीरिक वकृति से उत्पन्न हुआ पुरुष विकृति अन्तरात्मा के कारण शिथिलता को प्राप्त हुआ अन्य दुःखों से भी छुटकारा नहीं पा सकता है। शरीर के निरोग होने पर ही अन्य दुःखों से छुटकारा पाने के उपाय किये जा सकते हैं तथा वे फलीभूत भी होते हैं। शरीर ही यदि रोगी हो तथा उसके कारण अन्तरात्मा भी स्वस्थ न हो तो कठोर तपस्या, तीर्थभ्रमण, परोपकार आदि धार्मिक विषय, शिल्प, वाणिज्य, वार्ता (कृषि), देशान्तर भ्रमण आदि आर्थिक प्रयत्न, अभीष्ट आहार विहार, विषय भोग आदि रतिप्रयोग तथा मानसिक विचार क्रोध लोभ आदि आन्तरिक शत्रुओं का दमन, इन्द्रिय निग्रह, ईश्वर भजन आदि मोक्ष के उपाय भी सम्यक् प्रकार से होना संभव नहीं है। जैसा कि कहा भी है—