काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १६९
'धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलसाधनम्' (च. सू. अ. १) अर्थात् धर्म अर्थ काम मोक्ष इन सबका मूल साधन आरोग्य ही है।
इस प्रकार क्योंकि स्वस्थ जीवन रूपी वृक्ष में उत्तम फल लगते हैं इसलिये दीर्घायुष्य एवं उत्तम जीवन के लिये शारीरिक कष्टों तथा ऐहिक दुःखों का दूर किया जाना आवश्यक है। शारीरिक दुःख विविध रोगों से सैकड़ों प्रकार से उत्पन्न होते रहते हैं, तथा ये सैकड़ों प्रकार के रोग किसी एक ही उपाय या उपदेश द्वारा न जाने जा सकते हैं और नहीं दूर किये जा सकते हैं इसलिये इन रोगों की निवृत्ति तथा इनको उत्पन्न ही न होने देने के लिये मनुष्य को जितने भी उपाय या साधन हैं वे सब यथाशक्ति अपनी बुद्धि तथा बल के अनुसार अवश्य जानने चाहिये।
इसके लिये हमें चार बातें जाननी चाहिये।
१. हेय—अर्थात् दुखों को उत्पन्न करने वाले रोग।
२. हेतु—उन रोगों के कारण (निदान)
३. हेय अर्थात् रोगों का हान (निवृत्ति-दूर करना) तथा
४. निवृत्ति के साधन (ओषधि आदि उपाय)
हेय (रोगों) के स्वरूप तथा उनके निदान (कारणों) को देखकर ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि पहले तो रोग उत्पन्न ही न हों और यदि उत्पन्न हो भी जावें तो ज्ञात साधन (ओषधि आदि) के द्वारा उन्हें दूर कर दिया जाय।
लोगों का कल्याण करने वाले हितकारी एवं विविध ज्ञान विज्ञानों में जो सबसे अधिक उपयोगी ज्ञान है उसी को आयुर्वेदविज्ञान कहते हैं। यह आयुर्वेद-विज्ञान केवल अपने या केवल एक दो व्यक्तियों के लिये ही उपयोगी नहीं, अपितु इससे कुटुम्ब, समाज, तथा सम्पूर्ण देश का उपकार एवं उन्नति होती है अतः प्रत्येक व्यक्ति को इसे जानना चाहिये तथा जानने वालों को इसका उपदेश एवं प्रचार करना चाहिये। इस प्रकार इसका ज्ञान तथा उपदेश विशेष रूप से उपयोगी है।
आयुर्वेद की प्राचीनता
जब सृष्टि के प्रारंभ में जगत् स्रष्टा ने पञ्चमहाभूत तथा उनसे उत्पन्न पदार्थों को बनाया तभी से प्राणियों के दीर्घायुष्य के साधनों का भी ज्ञान कराया। यदि प्राणी उत्पन्न होते ही मिथ्योपचार के कारण नष्ट हो जायें तो स्रष्टा का परिश्रम व्यर्थ ही होगा। ज्यों-ज्यों वे चिर सत्ता को प्राप्त करते जाते हैं त्यों २ वे स्रष्टा की अभिलषित बात को करने में समर्थ हो जाते हैं। और यदि वे प्राणी सत्ता को प्राप्त करके भी विकल (अपूर्ण) अङ्गों वाले हों तो उनसे भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है, अतः आदिकाल से ही सत्त्व एवं बल से युक्त सम्पूर्ण अङ्गों सहित दीर्घायुष्य की अपेक्षा होती थी। इस संसार में उस शिल्पकार स्रष्टा के चर, अचर, भोक्ता, भोज्य, आदि अनेक भेद हैं। भोक्ता तथा भोज्य के भी अनेक भेदहोते हैं। सब भोक्ताओं के लिये भी सब प्रकार के भोज्य पदार्थ अनुकूल नहीं होते, अपितु भोक्ताओं की जाति, देश, काल तथा अवस्था आदि के भेद के अनुसार ही उपकारी या अपकारी होते हैं। एक व्यक्ति के लिये अनुकूल या प्रतिकूल वस्तु भी सबके लिये समान नहीं होती। उसी व्यक्ति के लिये भी कोई वस्तु सदा एक समान अनुकूल या प्रतिकूल नहीं हो सकतीं अपितु वहां भी अवस्था आदि के अनुसार ही परिवर्तन होता रहता है। इसलिये किस व्यक्ति के लिये कब क्या अनुकूल होता है, उसके क्या साधन हैं, क्या प्रतिकूल है, किस प्रकार उसका उदय होता है, उसकी शान्ति का क्या उपाय है तथा रोग, रोग के कारण तथा रोगों को दूर करने के उपाय आदि का सृष्टि के प्रारंभ से ही ज्ञान था। सब एषणाओं (इच्छाओं) में से प्राणैषणा सबसे प्रथम उत्पन्न होती है। इस प्रकार प्राणियों की उत्पत्ति के साथ ही आयुर्वेद का प्रारंभ होता है।