काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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अनुत्पाद्यैव प्रजा ‘आयुर्वेदमेवाऽग्रेऽसृजत्’ (प्राणियें उत्पत्ति से पूर्व ही सृष्टि के प्रारंभ में आयुर्वेद को उत्पन्न किया) सुश्रुत के इस वाक्य के समान ‘आयुर्वेदमेवाग्रेऽसृजतो विश्वानि भूतानि’ (आयुर्वेद को सृष्टि के प्रारंभ में उत्पन्न किया, उसके बाद सम्पूर्ण प्राणियों को उत्पन्न किया) काश्यपसंहिता के इस वाक्य के द्वारा यद्यपि सृष्टि से भी आयुर्वेद की प्राचीनता प्रकट की है परन्तु निमित्त तथा निमित्ती (कार्य तथा कारण) के पूर्वापर संबन्ध को दृष्टि में रखते हुए ‘अग्निहोत्रं जुहोति’ ‘यवागूं पचति’ आदि वाक्यों में पाठक्रम के अनुसार बलवान् अर्थक्रम की तरह ‘अभिज्ञान शाकुन्तल’ के ‘तव प्रसादस्य¹ पुरस्तु संपदः’ इस वाक्य के अनुसार प्रसाद (कृपा) से पूर्व ही संपदाओं के होने के समान ही वास्तव में सृष्टि के साथ आयुर्वेद का आलंकारिक रूप से घनिष्ठ एवं निकट सम्बन्ध बतलाया है। अथवा बालक की उत्पत्ति से पूर्व ही स्तन्य (दूध) की उत्पत्ति के समान ही सृष्टि से पूर्व भी आयुर्वेद की उत्पत्ति वस्तुतः संभव हो सकती है। विकासवाद की दृष्टि से भी भौतिक सृष्टि से पूर्व ओषधि वनस्पति आदि की उत्पत्ति को स्वीकार किया जाना भी प्राणियों की उत्पत्ति से पूर्व भैषज्य विज्ञान (आयुर्वेद) का होना सिद्ध करता है। भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने ‘सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात् स्वभावसंसिद्धलक्षणत्वात्’ (च.सू.अ. ३०) अर्थात् यह आयुर्वेद अनादि तथा लक्षण के स्वभावसिद्ध होने से नित्य है इस लक्षण के द्वारा आयुर्वेद के ज्ञान तथा उपदेश के आदि (जिसका आदि कारण विद्यमान हो) होने पर भी संसार के समान आयुर्वेद की ज्ञान परम्परा को भी अनादि दर्शाया है।
आयुर्वेद
आयुर्वेद शब्द का अर्थ करते हुए इस काश्यपसंहिता में ‘आयुर्जीवितमुच्यते’ विद्ज्ञाने धातुः, विद्लृलाभे च, आयुरनेन ज्ञानेन विद्यते ज्ञायते विन्दते लभते न रिष्यतीत्यायुर्वेदः, (आयु का अर्थ है जीवन, उसके साथ विद्ज्ञाने धातु या विद्लृ लाभे धातु से आयुर्वेद शब्द बनता है, अर्थात् इसके द्वारा आयु का ज्ञान होता है या आयु की प्राप्ति होती है इसलिये इसे आयुर्वेद कहते हैं) इस परिभाषा के द्वारा दीर्घ जीवन के बतलाने वाले तथा उपायों के द्वारा उसे प्राप्त कराने वाले अविनाशी शास्त्र को आयुर्वेद कहते हैं। इस निर्वचन के द्वारा आयुर्वेद का स्वरूप तथा प्रयोजन प्रकट होता है। इस प्रकार आयुर्वेद शास्त्र के द्वारा आयु का स्वरूप, जिनके द्वारा वह जाना जाता हैं वे उपाय, तथा विद्यमान आयु के लक्षणों को जाना जाता है। इन सबको जानकर तथा उनके अनुसार ठीक आचरण करने से आयु स्थिर होती है तथा इस ज्ञान के बिना आचरण करने से आयु विनाश की ओर अग्रसर हो सकती है। इस प्रकार साधनों सहित आयु को स्थिर करने वाला शास्त्र आयुर्वेद कहलाता है।
आत्रेय² तथा सुश्रुत³ के अनुसार भी आयुर्वेद के प्रयोजन व्याधि परिमोक्ष तथा स्वास्थ्यरक्षा (Curative and Preventive Treatmant) प्रतीत होते हैं।
१. उदेति पूर्वं कुसुमं ततः फलं, घनोदयः प्राक् तदनन्तरं पयः। निमित्तनैमित्तिकयोरयं क्रमस्तव प्रसादस्य पुरस्तु संपदः॥
(शाकुन्तले ७ अङ्के)
२. चरकसंहिता में—‘हिताहितं सुखं दुःखम्’ इत्यादि द्वारा अपने भोग के आयतन, पंचभूतों के विकाररूप शरीर, भोग के साधन चक्षु आदि इन्द्रियों, मन, अन्तःकरण तथा ज्ञान कराने वाली आत्मा का अदृष्टपूर्वक हुआ संयोग आयु नामक पदार्थ. आयु का स्वरूप, आयु के लिये हितकर तथा अहितकर (पथ्य और अपथ्य) तथा उसके परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुए सुख दुख तथा अवस्थानुरूप आयु के लक्षण इत्यादि साधनों एवं फलों से युक्त आयु को जो प्राप्त कराता है अथवा उसका ज्ञान कराता है उसे आयुर्वेद कहा है (च.सू. १ अ. ४०)
३. सुश्रुत में—‘आयुरस्मिन् विद्यतेऽनेन वाऽऽयुर्विन्दतीत्यायुर्वेदः’ के द्वारा ‘शरीर, इन्द्रिय, सत्व तथा आत्मा का संयोगरूप आयु जिसमें स्थित हो, जिसके द्वारा आयु का ज्ञान हो तथा जिससे आयु की प्राप्ति हो इत्यादि आयुर्वेद के निर्वचन किये गये हैं।