काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १७१
आयुर्वेद शब्द बहुत शाखाओं वाले चिकित्साविज्ञान को प्रकट करता हुआ केवल मनुष्यों की चिकित्सा से ही संबन्ध नहीं रखता अपितु इसमें हाथी, घोड़े, गौ आदि पशुपक्षी तथा वृक्ष लता आदि उद्भिज्ज की चिकित्सा का भी विधान है क्योंकि वराहसंहिता, भट्टोत्पल के उस प्रकरण की व्याख्या तथा उपवन विनोद आदि ग्रन्थों में पालकाप्य, १ मतङ्ग, शालिहोत्र आदि पशुचिकित्सकों, तथा उनके उपदेशों और परम्परागत ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार वृक्षायुर्वेद में भी काश्यप, सारस्वत, पराशर आदि आचार्य एवं तत्सम्बन्धी उनके उपदेश भी देखने में आते हैं। अग्निपुराण (अ. २७९-२९२) में धन्वन्तरि द्वारा भी सुश्रुत को मनुष्य हाथी, घोड़े, गौ तथा वृक्ष आदि से संबन्धित आयुर्वेद के उपदेश का उल्लेख मिलता है। परन्तु धन्वन्तरि काश्यप, आत्रेय आदि सब आचार्यों ने मानवीय आयुर्वेद को ही लेकर विशेषरूप से वर्णन किया है इसलिये हम भी उन्हीं के अनुसार उसी को लेकर प्रवृत्त होंगे।
विद्वान् लोग आद्यज्ञान (प्रारंभिक ज्ञान) होने के कारण इसका वेद शब्द से उल्लेख करते हैं। वेद आर्यों का सबसे प्रारंभिक (ईश्वरीय) ज्ञान समझा जाता है। इसमें प्राचीन समय का सब ज्ञान विज्ञान संग्रहीत है। आर्यों के तपस्या प्रणिधान आदि के आलोक से उज्ज्वल हृदयों में प्रतिभा रूप से अव्याहत आद्यज्ञान रूपी संपत्ति उत्पन्न हुई थी उसी को वेद शब्द से कहा है। उसी ज्ञान विज्ञान में से ही एक यह आयुर्वेद भी है।
वेद तथा आयुर्वेद का परस्पर संबन्ध
ऋक्, यजु, साम तथा अथर्ववेद के क्रमशः धनुर्वेद गान्धर्ववेद, स्थापत्यवेद, (भवन निर्माण कला) तथा आयुर्वेद उपवेद हैं उपशब्द समीप अर्थ का द्योतक है। आयुर्वेद का किस वेद के साथ संबन्ध है, जब हम इस विषय में विचार करते हैं तो देखते हैं कि सुश्रुताचार्य ‘इह खल्वायुर्वेदंमष्टाङ्गम उपाङ्गमथर्ववेदस्य’ (सू. अ. १) इस वाक्य के द्वारा स्पष्ट रूप से आयुर्वेद का अथर्ववेद के साथ अवयव तथा अवयवों का संबन्ध दिखाते हैं। आत्रेय भगवान् भी ‘चतुर्णामृक्सामयजुरथर्ववेदानामथर्ववेदे भक्तिरादेश्या’ (च. सू. अ. ३०) इस वाक्य द्वारा ऋग्वेद आदि चारों वेदों के साथ थोड़ा बहुत संबन्ध होते हुए भी भक्ति शब्द के द्वारा अर्थवेद के साथ ही आयुर्वेद का घनिष्ठ संबन्ध प्रकट करते हैं। इस काश्यपसंहिता में भी ‘आयुर्वेदः कथं चोत्पन्नः’ इस प्रश्न के ‘अथर्ववेदोपनिषत्सु प्रागुत्पन्नः’ इस उत्तर द्वारा प्रारंभ में इसे अथर्वमूलक दिखलाकर ‘कं च वेदं श्रयति’ इस दूसरे प्रश्न के उत्तर में ‘अथर्ववेदमित्याह, तत्र हि रक्षाबलि होमशान्ति ...... प्रतिकर्मविधानमुद्दिष्टं विशेषेण, तद्वदायूर्वेदे, तस्मादथर्ववेदं श्रयति, सर्वान्वेदानित्येके’ यह कहकर ‘आयुर्वेदमेवाश्रयन्ते वेदा ..... तस्माद्ब्रूमः ऋग्वेदयजुर्वेदसामवेदाथर्ववेदेभ्यः पञ्चमोऽयमायुर्वेदः’ (वेद आयुर्वेद के ही आश्रित हैं। इसलिये ऋक्, यजु, साम तथा अथर्ववेद के अतिरिक्त आयुर्वेद को पांचवां वेद कहा है) इत्यादि के द्वारा आचार्य विषयसन्निकर्ष के कारण पहले अथर्ववेद से संबन्ध दिखलाकर तथा उसी के साथ-साथ सब वेदों में ही आयुर्वेद का थोड़ा बहुत विषय मिलने से एकीय मत से सब वेदों के साथ आयुर्वेद का संबन्ध दिखलाते हैं। और अन्त में ब्रह्मा, अश्विनीकुमार तथा इन्द्र आदि की सम्प्रदाय परम्परा द्वारा क्रमशः विकसित आयुर्वेद के एक स्वतन्त्र प्रस्थान (विज्ञान) के रूप में परिवर्तित होकर वेदों के समान ही सब के जीवनधारक तथा लोक कल्याण परक होने से पृथक् एक शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठा तथा आयुर्वेद की अपने विषय में प्रधानरूप से उपादेयता दिखलाकर उसे महाभारत की तरह ही पांचवां वेद स्वीकार किया है।
सुश्रुत के ‘आयुर्वेदंमष्टाङ्गमूपाङ्गमथर्ववेदस्य’ इस वाक्य में उपाङ्ग शब्द को देखकर कुछ विद्वान २ सुश्रुत तथा उसी के द्वारा आयुर्वेद को बहुत अर्वाचीन सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। वे कहते हैं कि जहां साक्षात् संबन्ध होता है उसे
१. शालिहोत्रः सुश्रुताय ह्यायुर्वेदमुक्तवान् । पालकाप्योऽङ्गराजाय गजायुर्वेदमब्रवीत् ।। (अग्निपुराण २९२ अध्याय)
२. हिस्ट्री ऑफ हिन्दू कैमिस्ट्री-भाग १-पी. सी. राय.