भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 186
१७२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

अङ्ग कहते हैं तथा अङ्ग का जिससे संबन्ध होता है उसे उपाङ्ग कहते हैं अर्थात् आयुर्वेद वेदाङ्ग का भी अङ्ग है और क्योंकि शिक्षा आदि वेदाङ्ग वेद के बाद हुए हैं अतः आयुर्वेद जो कि वेदाङ्ग का अङ्ग (उपाङ्ग) है वह वैदिक काल तथा वेदाङ्गकाल के भी बाद हुआ है, इस प्रकार वे सुश्रुत को अर्वाचीन सिद्ध करते हैं। परन्तु उपाङ्ग शब्द से आपाततः वैसा प्रतीत होने पर भी वेद के अङ्ग शिक्षा कल्प आदियों में वैद्यक विषय विशेषरूप से दिखाई नहीं देता है, अपितु श्रौत तथा ब्राह्मणग्रन्थ तथा उससे भी पूर्व के संहिता ग्रन्थों में आयुर्वेद विषय यथापूर्व अधिक मिलता है। इसमें भी अथर्ववेद में इसका बाहुल्य होने से वेद के साथ ही इसका घनिष्ठ संबन्ध प्रतीत होता है। अङ्ग का अर्थ अप्रधान या गौण की तरह अवयव भी होता है। मीमांसकों ने अङ्गों के दो भाग किये हैं। जो शरीर के अन्दर प्रविष्टा होकर (समीप होकर) उप कारक होते हैं उन्हें अन्तरङ्ग तथा जो शरीर के बाहर (दूर) से उपकारक ही उसे बहिरङ्ग कहते हैं। वैदिक शरीर से बहिर्भूत होने के कारण शिक्षा आदि बहिरङ्ग हैं परन्तु इसके विपरीत भैषज्य आयुष्य संशमनीय आदि बहुत से आयुर्वेद के विषय के वेदसंहिताओं में ओतप्रोत होकर उसके शरीर के अन्दर प्रविष्ट होने से आयुर्वेद तो अन्तरङ्ग रूप से ही विद्यमान है। नाना ज्ञान विज्ञान के भण्डार वेद का प्रधान विषय याज्ञिक (यज्ञसंबन्धी) है। परन्तु आयुर्वेद उसमें प्रसङ्गवश अवान्तर रूप से आया हुआ होने से वैदिक विज्ञान के शरीर में प्रविष्ट हुआ अवयव अङ्गरूप से है। बाहु आदि बड़े अवयवों को अङ्गरूप से तथा हाथ आदि छोटे अवयवों को उपाङ्गरूप से दिखलाकर सुश्रुत के टीकाकार डल्हण ने भी आयुर्वेद को अन्तरङ्ग ही बतलाया है। यदि वेद के बहिरङ्गभूत शिक्षा आदि को अङ्ग मानकर उसी के अनुसार सुश्रुत में आयुर्वेद को उपाङ्ग माना गया हो तो शिक्षा आदि अङ्गों के बाद में होने वाले आयुर्वेद को सुश्रुत में ही भूतसृष्टि से भी पूर्व होनेवाला कैसे कहा गया है ? अपितु शिक्षा आदि अङ्गों में अव्यवहृत वेद शब्द के द्वारा आयुर्वेद का निर्देश किया जाना इसे उनसे पूर्व काल का ही सिद्ध करता है। ज्ञान विज्ञान के समुद्र वेद के एक तरङ्ग रूप से विद्यमान आयुर्वेद को वेद के शरीर में अनुप्रविष्ट हुआ देखकर कुछ लोग इसे उपवेद शब्द से अवयव अवयविभाव को देखकर कुछ लोग वेदाङ्गशब्द से तथा स्वल्प अवयव को दृष्टि में रखकर कुछ लोग वेदोपाङ्ग शब्द द्वारा व्यवहार करते हैं इसलिये इनमें परस्पर कोई असंगति नहीं है। इसीलिये काश्यपाचार्य ने तो उपशब्द को बिलकुल ही छोड़कर इसे पञ्चमवेद ही कहा है।। अन्तरवयव सदा अवयवी के साथ ही रहते हैं। अवयव का समय अवयवी के बाद नहीं होता। इस प्रकार उपवेद शब्द के समान अर्थ वाला यह उपाङ्ग शब्द भी आयुर्वेद को प्राचीन ही सिद्ध करता है अतः इसमें अर्वाचीनता की शंका नहीं करनी चाहिये।

यद्यपि ब्राह्मणग्रन्थ उपनिषद् महाभारत पुराण तथा स्मृति आदि में चारों वेदों का समानरूप से वर्णन मिलता है। इसके साथ ही अथर्ववेद¹ में ऋक्, यजु, सामवेदों का उल्लेख है परन्तु इन² तीनों वेदों में अथर्ववेद का उल्लेख न होने से विद्वानों की सम्मति में यह त्रयीविभाग (ऋक् यजु साम वेद) प्राचीन है। मन्त्रात्मक वेद के पद्यात्मक ऋक्, गद्यात्मक यजु तथा गीत्यात्मक साम इस प्रकार तीन विभाग हैं। इस त्रयीविभाग (तीन वेदों) में ही अथर्ववेद के मन्त्रों का भी यथास्थान समावेश हुआ है। ऋषियों के हृदयों में प्रारंभ में आदिमज्ञानरूप तीनों³ वेदों का जब ज्ञान हुआ था तभी आयुर्वेद विज्ञान भी था, ऐसा ऋक् यजु तथा सामवेद में स्थान २ पर आये हुए आयुर्वेद के विषयों से ज्ञात होता है। विशिष्टज्ञान के कारण अथर्ववेद की पृथक् गणना करके इसके सहित चार वेद हो जाते हैं। ब्राह्मण, उपनिषद्, स्मृति तथा मीमांसा आदि में भी चारों वेदों तथा उनके ज्ञाताओं का निर्देश मिलता है। इस प्रकार ऋक्, यजु, साम, अथर्व इन


१. यस्मादृचोऽवातक्षन्यजुर्यस्मादपाकषन्। सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखम् (अथर्व १०/७/२०)
२. तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसिजज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत। (ऋक् १०/७/८, यजु ३१/७/ अथर्व १७/६/१३)
३. सा वा एषा वाक् त्रेधा विहिता ऋचो यजूंषि सामानि। (शतपथ १०/५/१७)