काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १७३
चारों वेदों के पुरातन काल से ही समकक्ष होने के प्रमाण न्यायमञ्जरी तथा वेदसर्वस्व में बहुत से मिलते हैं। अथर्ववेद के सहित चारों वेदों के उपवेदों का उल्लेख करते हुए चरणव्यूहकार ने "ऋग्वेदस्यायुर्वेद उपवेद इत्याह भगवान् न्यासः स्कन्दो वा" वाक्य द्वारा भगवान् व्यास तथा स्कन्द के मत में आयुर्वेद को ऋग्वेद का¹ उपवेद बताया है। उसकी सम्मति में तीनों वेदों में आयुर्वेद के विषय मिलने पर भी ऋग्वेद में विशेषरूप से स्वर्वैद्य अश्विनीकुमारों के सूक्तों में तथा अन्यत्र भी दूसरे अतीत पुरावृत्तों के साथ आयुर्वेद विषय के विशेषरूप से मिलने से त्रयीविभाग को दृष्टि में रखते हुए ऋग्वेद के साथ आयुर्वेद का विशेष संबन्ध होने से संभवतः उपर्युक्त उक्ति कही हो। परन्तु उसके बाद जब कर्मकाण्ड के विशेष विकसित हो जाने पर शान्तिक पौष्टिक आदि ऐहिक कल्याणकारक कर्म तथा दैहिक आगन्तुक संशमन कर्म प्रधान अथर्ववेद की पृथक् गणना करके वैदिक विज्ञान चार भागों में विभक्त हो गया तब अथर्ववेद में² भैषज्यकर्म, आयुष्यकर्म तथा भूतादि परिहारकर्म विशेषरूप से पृथक् कर दिये गये। कौशिकसूत्रकार ने भी स्थान-स्थान पर उसी प्रकार का विनियोग प्रदर्शित किया है। इस प्रकार आथर्वण प्रक्रिया में विशेषरूप से आये हुए शान्तिक पौष्टिक आदि क्रियाओं से युक्त भैषज्य विज्ञान के क्रमिक विकास के साथ-साथ आयुर्वेदिक विषयों के भी विकसित होने से तथा पूर्वोक्तानुसार अन्य वेदों की अपेक्षा अथर्ववेद में विशेषरूप से इस विषय के मिलने से तात्कालिक स्थिति के अनुसार अथर्ववेद के साथ इसका घनिष्ठ संबन्ध देख कर धन्वन्तरि आत्रेय तथा कश्यप आदि प्राचीन आचार्यों ने आयुर्वेद के विषय में 'अथर्ववेद का उपाङ्ग' अथर्ववेद में विशेष भक्ति (श्रद्धा) का रखना तथा अथर्वमूलक इत्यादि जो कहा है वह युक्तिसंगत ही है।
वेदों में आयुर्वेद संबन्धी विषय
वेदों के विषय में दो मत हैं। प्रथम प्राचीन मीमांसकों का सिद्धान्त है कि वैदिक पद्धति में श्रवणपरम्परा द्वारा वर्तमान, प्राचीन आचार्यों द्वारा भी कर्ता का ज्ञान न होने से "यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं या वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै" इस श्वेताश्वतरोपनिषद् के वचन द्वारा पूर्व सिद्ध ऐश्वर ज्ञानात्मक इस वेद के जगत् स्रष्टा के मन में प्रतिभा (इलहाम-Revelation) के रूप में उदित होने के उल्लेख से, तथा ऋषियों के भी केवल मन्त्रद्रष्टा होने से पद तथा पद के अर्थ के नित्य संबन्ध होने से यह वेद अनादि तथा नित्य है। परन्तु इसके विपरीत तार्किकों (नैयायिकों) का सिद्धान्त है कि उस परमेश्वर से ऋक्, साम तथा यजु के उत्पन्न होने का उल्लेख मिलने से वेद रूपी शब्द के प्रत्येक उच्चारण की नई उत्पत्ति के कारण शब्दों के समुदायरूप वेदों का भी यद्यपि नित्यत्व संभव नहीं, अपितु ये सृष्टि के प्रारंभ में ईश्वर द्वारा बनाकर उपदेश करने से पौरुषेय हैं। तथापि सब दोषों से रहित परम आप्त परमात्मा की कृतिरूप होने से इसे प्रामाणिक तो मानना ही चाहिये। वेद अनादि हैं, अपौरुषेय (ईश्वरीय ज्ञान) हैं, पौरुषेय (पुरुषमनुष्यकृत) हैं, अथवा आर्ष हैं और इस वेद की उत्पत्ति अथवा प्रकाशन का कौन सा वास्तविक तथा ठीक ठीक समय है—एतद्विषयक विचार को इस समय हम यहीं पर समाप्त करते हैं। यह निर्विवाद तथ्य है कि प्राचीन ऋषियों द्वारा भी सबसे अधिक प्रामाणिक माना जाने के कारण यह अत्यन्त प्राचीन काल से ही सम्मानित माना गया है। आजकल के प्राच्य तथा पाश्चात्य विद्वान् भी इसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। पुरातत्वानुसन्धान की दृष्टि से वैदिक साहित्य की आलोचना करने वाले विद्वानों को यदि हम देखें तो किसी-किसी के मत में यह बारह हजार वर्ष पूर्व का है तथा किसी-किसी के मत में यह चार हजार वर्ष पूर्व का है—इत्यादि। इस प्रकार अपने-अपने विचारों के अनुसार बहुत से पक्ष हमारे दृष्टि गोचर होते हैं परन्तु संसार में
१. तञ्जौर के पुस्तकालय में विद्यमान उमा-महेश्वर संवाद रूप एक अन्य काश्यपसंहिता में भी 'ऋग्वेदस्योपवेदाङ्ग काश्यपं रचितं पुरा। लक्षग्रन्थं महातेजः अग्रेयं मम दीयताम् (?) इस श्लोक के द्वारा आयुर्वेद को ऋग्वेद का उपवेद बतलाया गया है।
२. भेषजं वा आथर्वणानि (ताण्ड्यमहाब्राह्मणे १२. ९. १०)