काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
जितने भी प्राचीन साहित्य उपलब्ध हैं उन सबसे प्राचीन वैदिक साहित्य (वेद) हैं, इसमें किसी का विरोध नहीं है। इस प्रकार इस वैदिक विज्ञान का तथा उसके अन्तर्गत आयुर्वेद विज्ञान का भी समय प्राचीन ही स्थिर होता है। इस वैदिक विज्ञान रूपी भण्डार में अन्य विज्ञानों की तरह आयुर्वेद विज्ञान भी बहुत प्रकार से ओतप्रोत दिखाई देता है। उदाहरणार्थ—
ऋग्वेद संहिता में—वृद्धावस्था से जीर्ण हुए च्यवन तथा वन्दन ऋषि का अश्विनीकुमारों द्वारा रसायन प्रयोग से पुनः यौवन की प्राप्ति-Rujuvenilation (१-११६-१०/१-११७-१३/ १-११९-७) दासों द्वारा अग्नि और जल में फेंकने पर भी बचे हुए दीर्घतमस् ऋषि का पुनः दास द्वारा सिर तथा छाती के काट दिये जाने पर अश्विनीकुमारों द्वारा जीवन दान देकर दस युग पर्यन्त वृद्धावस्था से रहित होकर जीवित रहना (१. १५८. ४-६) युद्धक्षेत्र में खेल राजा की पत्नी विश्पला की शत्रुओं द्वारा टांग काट दी जाने पर अश्विनीकुमार द्वारा लोहे की जंघा जोड़ना (१. ११६. १५) कटे हुए अङ्गों वाले अत्रि आदि के अवयवों को जोड़ना (१. ११७. १९) शत्रुओं द्वारा तीन टुकड़े किये हुए श्यावाश्व के अङ्गों को जोड़कर पुनरुज्जीवित करना (१. ११७, २४) अश्विनीकुमारों द्वारा दधीच (दधीची या दध्यङ्) ऋषि के सिर को अलग करके उसे रखकर उसकी जगह घोड़े का सिर जोड़कर उसके द्वारा मधुविद्या (प्राणविद्या) ग्रहण करके फिर घोड़े का सिर काटकर उसके स्थान पर पुनः पहला (मनुष्य का) सिर जोड़ देना (१. ११६. १२/१. ११७. २२) अन्धे ऋज्राश्व को दृष्टिदान (१. ११६. १६/१. ११७. १७) अन्धे कण्व को दृष्टिदान तथा बहरे नार्षद को श्रोत्रदान (१. ११७. ८) पङ्गु (लूले) परावृज तथा जिसके घुटने खराब हुए हैं ऐसे शोणर्षि को गतिदान (१. ११२. ८) नपुंसक पतिवाली बध्रियती के भी पुत्रोत्पादन (१. ११६. १३) विश्वक की नष्ट हुए पुत्र (विष्णाश्व) की प्राप्ति (१. ११६. २३) कुष्ठ रोग के कारण पति को न प्राप्त करके पितृगृह में जीर्ण होती हुई कक्षीवती की पुत्री घोषा का कुष्ठ निवारण करके पति की प्राप्ति कराना (१. ११७. ७) कुष्ठरोग से कृष्ण वर्ण वाले श्याव के रोग को दूर करके सुन्दर पती की प्राप्ति (१. ११७. ८) इत्यादि अश्विनीकुमारों के अनेक अद्भुत चमत्कार-वायु, द्यु, पृथिवी आदि के समान देवभिषग् अंश्विनीकुमारों द्वारा अनुकूल भेषज की प्रार्थना (१. ८९. ४) अश्विनीकुमारों द्वारा ओषधि वनस्पति आदि की विशेष रूप से अभिव्यक्ति (१. ११६. ८) तुम दोनों भैषज्य के द्वारा भिषक् होवो-इस प्रकार अश्विन्यों की प्रार्थना (१. १५८. ६) आंखों द्वारा देखना, अन्य सब इन्द्रियों द्वारा समर्थ होना, वृद्धावस्था को दूर करना तथा सौ वर्ष की आयु की प्राप्ति की अश्विन्यों से प्रार्थना (१. ११६. २५) आर्चतक तथा संयु ऋषि की निवृत्तप्रसवा गौ को भी अश्विन्यों द्वारा प्रसव कराना तथा दूध का दिलवाना (१. ११६. २२/१. ११७. २०) इन्द्र द्वारा भी अन्धे परावृज को दृष्टिदान तथा पङ्गु (लूले) श्रोण को गतिदान (२. १५. ७) इन्द्र द्वारा अपाला के चर्मरोग तथा उसके पिता गंजरोग (Baldness) दूर करना (८. ९१. ७) इन्द्र का औषधि धारण करना (२. २३. ७) नाना विष तथा कृमियों का वर्णन और उनका प्रतिकार (१. १९१. १-१६) नाना प्रकार के यक्ष्मा रोगों को दूर करना (१०. १६३-१-६) सूर्यचिकित्सा द्वारा हृद्रोग आदियों को दूर करना (१. ५०. ११-१३) जल का भेषजत्व (१०. १३७. ६/१. २३. १९) औषधियों का वर्णन (१०. ९७. १-२३) यक्ष्मा, अज्ञातयक्ष्मा (अज्ञात रोग-Obsevre diseases) राजयक्ष्मा, ग्राहि, पृष्ठ्यामय, सिपसिमि तथा हृद्रोग आदि का उल्लेख (१०. ९७. १०५. १३७. १६१. १६७) इत्यादि बहुत से विषय स्थान २ पर मिलते हैं।
शुक्ल यजुः संहिता—में भी १२ वें अध्याय के दो सूक्तों (१२. ७५. ८९/१२. ९०. १०१) में औषधियों का रोगनाशकत्व, औषधियों के खोदने वाले तथा जिनके लिये औषधियां खोदी गई हैं उन दोनों के लिये उपकारी होना, श्लेष्मरोग, अर्श, श्वयथु, गण्डु, श्लीपद, यक्ष्म, मुखपाक, क्षत आदि रोगों का नाश करना, स्थान २ पर (१९. ८१. ९३/२०. ५. ९/२५. १-९/३१. १०-१३/३०. ८-१०) घोड़े तथा मनुष्य के शरीर के अङ्गों का उल्लेख, यक्ष्मा, रोग, कफरोग, शोथ, पाकारु, अर्श, विषूचिका, हृद्रोग, अर्म, चर्मरोग, कुष्ठ, अङ्गभेद आदि रोगों का उल्लेख मिलता है।