भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 942 में से

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १७५

तैत्तिरीय संहिता के काम्येष्टि प्रकरण में दृष्टिप्राप्ति तथा यक्ष्मा उन्माद आदि रोगों के परिहार की प्रार्थना, यक्ष्म, राजयक्ष्म तथा उससे उत्पन्न अन्य रोगों की उत्पत्ति का विषय (२. १. १. १/२. ४. १४. १५) में दिखाई देता है।

सामसंहिता में भी ऋग्वेद में दिये हुए मन्त्रों के प्रवेश तथा आयुर्वेद संबन्धी मन्त्रों के मिलने से सामवेद भी इस विषय में ऋग्वेद के समान ही प्रतीत होता है।

अथर्ववेद में तो विशेषरूप से आयुर्वेद के बहुत से विषय मिलते हैं। वहां इस विषय के सैकड़ों सूक्त तथा मन्त्र मिलते हैं। ऋग्वेद आदियों में तो प्रायः केवल ऐतिहासिक रूप से कहीं-कहीं प्रसङ्गवश आयुर्वेद का विषय आता है परन्तु अथर्ववेद में तो स्थान-स्थान पर रोग, शारीरिक अवयव, रोग प्रतीकार, अमुक-अमुक औषधियों का अमुक-अमुक रोग में उपयोग, इत्यादि बहुत से विषय भरे पड़े हैं जिससे कि आयुर्वेद का अथर्ववेद से संबन्ध स्पष्ट प्रतीत होता है। उदाहरण के लिये रोग के विषय में—तक्म (ज्वर) रोग का वर्णन तथा उसके भेदों (६. २१. १-३) सतत, शारद, ग्रैष्म, शीत, वार्षिक (वर्षाऋतु में होने वाला) तृतीयक आदि का निर्देश (१. २५. ४/५. २२. १-१४) ज्वर के भेद तथा उनमें मण्डूक (मेंढक) का उपयोग (७. ११६. १.२) उस समय जांगल प्रदेश होने के कारण मुंजवत्, बाहीक, गान्धार, अङ्ग, मगध आदि देशों में ज्वर का निर्देश (५. २२. १४) श्लेष्मा का अस्थि, सन्धिस्थान तथा हृदय को पीडा देना (६. १४. १-३) मन्या-गण्डमाला के ५५ भेद, ग्रीवा की गण्डमाला (Goitre) के ७७ भेद, स्कन्ध गण्डमाला के ९९ भेद (६. २५. १-३) अपचित (गण्डमाला-Scrofula) के एनी, श्येनी, कृष्णा, रोहिणी, सूतिका, आदि भेद (६. ८३. १-३) शीर्षक्ति, शीर्षामय, कर्णशूल, विलोहित, विसल्यक, अङ्गभेद, अङ्ग्ज्वर, विश्वाङ्य, विश्वतक्म, शारदतक्म, बसाल, हरिम, यक्ष्मोध, काहावाह, क्लोम (Pharynx) उदर, नाभि हृदयगतयक्ष्म, पार्श्व, पृष्ठि, वंक्षण (Groin) आन्त्र तथा मज्जागत पीडा विद्रधि वातोकर अलजी पाद जानु श्रोणि परिमंश (कटि या जघन प्रदेश) उनूक (रीढ की हड्डी) उष्णिहा (ग्रीवानाडी) तथा शीर्ष वेदना आदि नाना रोगों का वर्णन मिलता है (९. ८. १-२२)

शारीर शास्त्र के विषय में—शरीर की नाडी तथा धमनियों का निर्देश सौ शिराओं तथा सहस्र धमनियों का उल्लेख (१. १७. १. ४७. ३६. २) नाना रोगों के साथ शारीरिक अवयवों का वर्णन (२. ३३. १-७) नाना शरीरावयवों का उल्लेख (२. ३३. २/४. १२. ४/१०. २. १/१०. ९. १३-२५) केश, अस्थि, स्त्राव मांस, मज्जा, पर्व, उरु (जंघा) पैर, घुटने, शिर, हाथ, मुख, पृष्ठ, वर्जह्या (स्तन) पार्श्व, जिह्वा, ग्रीवा, कीकस (लोम) तथा त्वचा आदियों का उल्लेख (११. १०. ११-१५) में मिलता है।

रोग प्रतीकार के विषय में—मूत्राघात रोग में शर तथा शलाका (Cathetar) आदि द्वारा मूत्र का निकालना या भेदन करना (१. ३. १-९) सुखप्रसव (Normal Delivery) तथा उसकी विकृति (Abnormal Delivery) में योनिभेदन-Scissarian Section (१. ११. १-६) व्रण की जल द्वारा चिकित्सा (५. ५७-१-३) पकी हुई पिडका (Abscess) का शलाका द्वारा वेधन (७. ७४. १-२), पिडका को पकाने के लिये लवण का उपचार (७. ७६. १-२) इत्यादि शल्यप्रक्रियाऐं, बाहर से शरीर में प्रविष्ट होकर रोगों को उत्पन्न करने वाले विविध कृमियों तथा उनके निकलने का वर्णन (२. ३१. १-५) चक्षु नासिका तथा दातों में प्रविष्ट होकर रोगों को उत्पन्न करने वाले येवास, कष्कष, एजत्क. शिपी विलुक आदि कृमियों को नष्ट करना (५. २३. १-१३) नाना रंग के कृमियों का वर्णन, मनुष्य तथा गौ आदि पशुओं में विद्यमान कृमियों का सूर्य की किरणों द्वारा नष्ट किया जाना (२. ३२. १-६) हानिकारक रोग कृमियों को सूर्य की किरणों द्वारा नष्ट किया जाना (४. ३७. १-१२) सूर्य की लाल किरणों (Red rays) द्वारा हृद्रोग, कामला, पाण्डु आदि रोगों का नाश (१. २२. १-४) प्रातःकाल की धूप में स्वेदन, प्रभास्नान (Sun bath) तथा जल स्नान आदि द्वारा शारीरिक रोगों को नष्ट करना (३. ७. १-७) हृद्रोग में नदी के हिमयुक्त जल का उपयोग (६. २४. १-३) जल का सर्वरोग

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