काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
नाशकत्व (६. ९२. ३) जंगल तथा पर्वत की वायु का आरोग्यदायकत्व (१. १२. १-४) वायु का भेषज्व (४. १३. २-३), आरोग्य का वर्णन (२. १०. १-८) क्लैव्य-नपुंसकता नाशन के उपाय (६. १३८. १-५) इत्यादि विषय मिलते हैं।
**ओषधि के विषय में—**नक्त रामा कृष्णा असिक्री तथा ब्रह्मसंज्ञक औषधियों का किलास (कुष्ठ) तथा पलित (बालों का झड़ना) आदि रोगनाशकत्व (१. २३. १-४) सुपर्णा आसुरी सरूपा श्यामा आदि औषधियों का त्वग्रोगनाशकत्व (१. २४. १-४) वल्मीक (सांप की बाँबी) में मिलने वाली औषधियों का अतिसार, अतिमूत्र, नाडीव्रण आदि को नाश करना (२. ३. १-६) पृश्निपर्णी का गर्भनाश तथा रक्तविकार को दूर करने तथा शरीर की वृद्धि करने में (२. २५. १-४) कुरंग श्रृंग तथा उसके चर्म का क्षय कुष्ठ, तथा अपस्मार के नाश करने में (३. ७. १-३) शतवीर्या, दूर्वा का दीर्घायुष्य तथा नाना रोगों के दूर करने में (३. १५. १-८), वृषा शुष्मा आदि औषधियों का वृष्य रूप में (४. ४. १-८), रोहिणी नामक औषधि का भग्नसंधान तथा क्षत के प्रतीकार में (४. १२. १-७) वर्णन, सहदेवी तथा अपामार्ग का तृषा क्षुधा आदि की इन्द्रियों के रोगों हिंसाकर्म तथा शत्रुओं के नाश करने की महिमा का वर्णन (४. १७. १-८/४. १८. १-८/४. १९. १-८) अपामार्ग का पाप को दूर करना तथा मुख और दांतों का शोधन करना (७. ६७. १-३) सिलाच्य औषधि की महिमा का वर्णन (५. ५. १-९) कुष्ठ औषधि का तक्म (ज्वर) यक्ष्मा तथा कुष्ठ नाशन (५. ४. १-१०) कुष्ठ औषधि का वर्णन (६. ९५. १-३) कुष्ठ औषधि की धूप का तक्म (ज्वर) नाशकत्व तथा उसका विश्वभेषजत्व (सब रोगों की औषधि होना), यातुधान (कृमि) तथा ज्वर आदि नाशकत्व (१९. ३९. १-१०) की महिमा आशरीक, विशरीक, पृष्ठिका, विश्व तथा शारद ज्वरों में जङ्गिड औषधियों का उपयोग (५. २२. १-२४) जङ्गिड औषधियों का वर्णन, मणियों का बांधना तथा उसके द्वारा शत्रुओं का नाश, आयुष्य की प्राप्ति, विष्कन्ध (वातरोग) का नाश तथा आशरीक विशरीक, कफरोग, पृष्टरोग तथा विश्व शारद आदि ज्वरों का नाश (२. ४. १-६/१९. ३४. १-१०) जङ्गिड ओषधि का विष्कन्ध (वातरोग) नाशन, विश्वभेषजत्व, यक्ष्मानाशन, वातरोगनाशन, श्वित्र, दद्रु, पामा आदि त्वग्रोग तथा दुर्नाम (अर्श) रोग नाशन (१९. ३५. १-५) विषाण ओषधि का रक्तस्राव तथा वातरोग में हितकर होना (६. ८४. १-३) वरण ओषधि का यक्ष्मा नाशकत्व (६. ८५. १-३) पिप्पली का क्षिप्त, अतिवृद्ध तथा वातीकृत रोगों की ओषधि होना (६. १०९. १-३) कफरोग, विद्रधि, लोहितक, विसल्यक आदि रोगों में चीपद्रु नामक औषधि का उपयोग (६. १२७. १-३) देवीतितली ओषधि द्वारा केशवृद्धि के उपायों का वर्णन (६. १३६. १-३/ ६. १३७. १-३) गुग्गुल की धूप की गन्ध द्वारा यक्ष्मा रोग का नाश (१९. ३६. १-३) जलवायु द्वारा फैलने वाले रोगों के नाशक के रूप में अजशृङ्गी, जल द्वारा फैलने वाले रोगों के नाशक के रूप में गुग्गुलु पीलानल द्यौक्षगन्धि प्रमन्दि आदि, तथा प्रसारिरोगों (Infections deseases) के नाशक के रूप में अश्ववत्थ, न्यग्रोध शिखण्डी आदि ओषधियों का वर्णन (४. ३७. १-१२) ओषधियों की महिमा (६. २१. १-३) असिक्री, कृष्णा, पृष्णि, ञ्रस्तृणती, स्तम्बिनी, एकशृङ्गा, प्रतन्वती, अंशुमती, कण्डिनी, विशाखा, वैश्वदेवी, उग्रा, अवकोल्वा, तथा तीक्ष्णशृङ्गी आदि के रूप में नाना ओषधियों तथा उनके प्रकारों का वर्णन, नाना वनस्पतियों के रस से निर्मित गुटिकात्मक वैयाघ्रमणि का वर्णन, अश्वत्थ, दर्भ, सोम, ब्रीहि, यव आदियों का तथा पुष्पवाली, प्रसूमती, फलिनी तथा फलरहित ओषधियों और विषदूषण कृत्यानाशन तथा श्लेष्मरोगनाशन गुण वाली ओषधियों का वर्णन (८. ७. १-२८) दर्भ भङ्ग (शण) यव सह स्तेम आदि का वर्णन (११. ८. १५) ब्राह्मण नामक औषधि का विषहरत्व, अयस्कम्प नामक ओषधि का विष में बुझे हुए शस्त्रों द्वारा किये हुए व्रण आदि में हितकर होना तथा पूर्ण अधिशृङ्ग कुड़्मल आदि का शस्त्र प्राणी तथा ओषधियों का विषनाशन (४. ६. १-८) वरणा प्रक्रूया आदि ओषधियों का विषहरत्व (४. ७. १-७) नाना जाति के सर्पों का उल्लेख करके तावुव तथा तस्सुव आदि ओषधियों के विषनाशक गुण का वर्णन (५. १३. १-११) मधुप रूष्णीशी पाला आदि ओषधियों का सर्पविषनाशकत्व (६. १२. १-