भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १७७

३) व्याख्याभेद से वल्मीक मिट्टी (सायण के मत से) अथवा सिलाच्य ओषधि (ग्रिफिथ के मत से) का विषहरत्व (६. १००. १-३) मधुक नामक ओषधि का नाना प्रकार के सर्प कृमि तथा विष को दूर करना (७. ५६. १-८) विष के द्वारा ही विष का प्रतीकार (७. ८८. १) विषदोहन विद्या के द्वारा विष का प्रतीकार (८. ५. १-१६/८. ६. १-४) पर राष्ट्र पर आक्रमण तथा इन्द्रशान्ति के निमित्त दर्भमणि का बांधना (१९. २८. १-१०/१९. २९. १-९/१९. ३०-१-५) पुष्टि की कामना करने वाले व्यक्ति को औदुम्बर मणि का बांधना (१९. ३१. १-४) मृत्यु के भय की निवृत्ति के लिये दर्भमणि का बांधना (१९. ३२. १-२/१९. ३३. १-५) इत्यादि सैकड़ों ओषधियों के निर्देश, भेद, प्रयोग तथा उपयोग आदि स्थान २ पर उपलब्ध होते हैं।

ब्राह्मण ग्रन्थों में भी निम्न वर्णन मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में-कहीं कहीं शरीर की उत्पत्ति तथा प्राण का उल्लेख, अश्वियों का देवताओं के वैद्य के रूप में निर्देश तथा ज्ञानेन्द्रियों का वर्णन (५. २२) ओषधियों का रोगों को दूर करना (३. ४०) अञ्जन के प्रयोग से नेत्ररोगों की निवृत्ति (१. ३) शाप के द्वारा भी उन्माद कुष्ठ आदि रोगों की उत्पत्ति, शुनःशेष की कथा में वरुण के कोप से जलोदर रोग का होना। छान्दोग्य में—हृदय नाड़ियों का वर्णन (८. १. ६) आहार के पचने की प्रक्रिया (६. ५) निद्रा तथा स्वप्न का उल्लेख (४. ३. ३) पामा रोग का वर्णन (४. १. ८) रोग को दूर करके एक सौ सोलह वर्ष की आयु की प्राप्ति के उपायों का उल्लेख (३. १६)।

बृहदारण्यक में—अश्व के अङ्गों (१. १. १) मनुष्य के अङ्गों (२. ४. ११) हृदय तथा उसकी नाडियों का वर्णन (२. १. १९/४. २. ३/४. ३. २०) मनुष्य तथा वृक्ष की तुलना (३. ९. २८) नेत्र की रचना (२. २. ३) मृत्यु का उल्लेख (३. २. ११) शाप के द्वारा रोगों की उत्पत्ति (३. ७. १/३. ९. २६)।

सामविधानब्राह्मण में—सर्पों से रक्षा (२. ३. ३)। भूतों का आक्रमण (२. २. २) रोगों का आक्रमण (२. २. ३)।

तैत्तिरीयारण्यक में—कृमियों का वर्णन (४. ३६. १)।

श्रौतग्रन्थों में—

आश्वलायन में—यज्ञाय पशुओं तथा ऋत्विगों में परिहरणीय रोगों का निर्देश। आपस्तम्ब में कृमियों का वर्णन (१५. १९. ५)।

गृह्य-ग्रन्थों में—

आश्वलायन में—सूर्योदय तथा सूर्योस्त के समय सोने में रोग का कारण (३. ७. १. २) यजमान में परिहरणीय रोग का उल्लेख (१. २३. २०) पशुओं के रोगों को दूर करना (४. ८. ४०)।

शाङ्खायन में—शारीरिक कष्ट के समय वेदमन्त्रों के गायन का निषेध (४. ७. ३६) आग्रहायण यज्ञ में भोज्यवस्तुओं में भूतों की निवृत्ति (३. ८) सब रोगों की निवृत्ति (५. ६. १-२)।

गोभिलीय सूत्र में—रोग निवर्तक मन्त्रों का उल्लेख (४. ६. २) सर्पदंश का उपाय (४. ९. १६)।

आपस्तम्ब में—रुग्ण स्त्री को पद्मपत्र आदियों के द्वारा अभिमन्त्रित करना (३. ९. १०) आधा सीसा) (Hemicronia) का कारणभूत कृमियों तथा बालकों में अपस्मार रोग के कारणभूत कुक्कुरभूत का निर्देश (७. १८. १) बालक में क्षेत्रिय रोग (सहज, पतृत-Congenital) का परिहार (६. १५. ४)।

पारस्कर गृह्य सूत्र में—मर्दन (मालिश) के द्वारा शिरःशूल का प्रतीकार (३-६)।