काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १७८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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हिरण्यकेशीय गृह्यसूत्र में—अग्नि का रोगनाशकत्व (१. २. २८) बालक के क्षेत्रीय रोग को दूर करना (२. ३. १०)।
खादिर गृह्य सूत्र में—कृमियों का वर्णन (४. ४. ३) गोरोग की निवृत्ति के लिये होम के धूम से युक्त प्रदेश में विचरण करना (४. ३. १३) सर्पदंश का उपाय (४. ४-१) इत्यादि आयुर्वेद संबन्धी विषय स्थान २ पर न्यूनाधिक रूप में उपलब्ध होते हैं।
वैदिक साहित्य में आयुर्वेद संबन्धी विषयों को लेकर ब्लूमफील्ड (M. Bloomfield), हिलब्राण्ड (A. Hillebrandt) केलेण्ड (Caland) डॉ. पी. कार्डियर (P. Cordier), जॉली (J. Jolly), बोलिङ्ग (G. M. Bolling) झीमर (Zimmer) इत्यादि पाश्चात्य विद्वानों तथा कुछ भारतीय विद्वानों ने भी बहुत कुछ लिखा है। इन सबके विषय में विमर्श करना उपयोगी होने पर भी अब हम विस्तार के भय से इसे यहीं समाप्त करते हैं।
कौशिक सूत्रकार के उन २ मन्त्रों के विनियोग के दिखाने में उस-उस मन्त्र की महिमा को दिखाते हुए ४ थे अध्याय में 'अथ भैषज्यानि' इत्यादि से प्रारंभ करके उस-उस रोग के प्रतीकार के लिये उन-उन मन्त्रों द्वारा मन्त्रित करके जल, ओषधि आदि का पिलाना तथा हवन मार्जन आदि बहुत से उपाय दिये हैं। मन्त्रसंहिता को लेकर बने हुए कौशिकसूत्र में ये मान्त्रिक विधान भी भरे हो सकते हैं परन्तु वातिक तक्म रोग में मांस तथा भेद का पिलाना, श्लैष्मिक में मधु का पान, वातपित्तज में तैलपान, धनुर्वात, अङ्गकम्प, शरीरभङ्ग आदि वातरोगों में घृत का नस्य, रक्त के बहने तथा स्त्रियों की अतिरजःप्रवृत्ति में सूखे कीचड़ की मिट्टी को घोलकर पिलाना, हृद्रोग तथा कामला में रोगी को हरिद्रा तथा ओदन खिलाना, श्वेत कुष्ठ में खूब लाल कुष्ठ को गोबर के साथ घिसकर भृङ्गराज, हरिद्रा, इन्द्रवारुणी तथा नीलिका के फूलों को पीसकर लेप करना, वातविकार में पिप्पली का सेवन, शस्त्र की चोट लगकर रक्तप्रवाह होने पर उस स्थान पर पकाये हुए लाख के पानी द्वारा सिञ्चन करना, राजयक्ष्मा, कुष्ठ, शिरोरोग तथा सारे शरीर की वेदना में मक्खन में कूठ को मिलाकर रोगी के शरीर पर लेप करना, शस्त्र की चोट लगने पर पकाये हुए दूध में लाक्षा डालकर पिलाना, गण्डमाला में शङ्ख को घिसकर लेप करना, जलौका द्वारा रक्त का निकालना, सेन्धा नमक का चूर्ण छिड़कना (Dusting) व्रण में गोमूत्र का उपयोग, मूत्र तथा मल के रुक जाने पर हरीतकी आदि भेदनीय (Lexatws) द्रव्य का बांधना, आखु किरि पूतीक मथित जरन प्रमन्द तथा स्त्रावस्क आदि ओषधियों को जल में घोलकर पिलाना, घोड़े आदि पर चढ़ना, बाण का छोड़ना, गोदोहनी में जल में २१ जौ डालकर शिश्न (Penis) को ऊपर करके उसमें वह जल डालना, लोहशलाका (Catheter or Sound) का डालना, जौ, गेहूँ, वल्ली, पद्मूल, तथा पाविका के क्वाथ रूप आलविसोल फाण्ट का पीना इत्यादि का वर्णन है। मन्त्रों द्वारा प्रतिष्ठापित (मन्त्रित), शान्त्युदक में भी शमी, शाम, काश, वंशा, शाम्य, बाका, तलाशा, पलाश, वासा, शिंपा, शिम्बल, सिपुन, दर्भ, अपामार्ग, कृति, लोष्ठ, वल्मीक वपा, दूर्वाप्रान्त, ब्रीहि, यव आदि शान्त ओषधियों को डाल कर तैयार किये हुए उस जल को भैषज्य के रूप में बहुत से रोगों का नाशक बताया है। इस प्रकार मान्त्रिक प्रक्रिया की तरह ओषधि विद्या में भी कौशिक सूत्रकार का अथर्ववेद से संबन्ध प्रतीत होता है।
प्राचीन काल में शारीरिक धातुओं की विषमता के समान राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, ग्रह, स्कन्द, रुद्र आदि देवताओं का कोप आदि भी रोग के कारण माने जाते थे जैसा कि 'रक्षोहाऽमीबचातन:' इत्यादि मन्त्रांश द्वारा रोग को दूर करने के लिये उस-उस रोग के निदानभूत राक्षस प्रभृति को दूर करना उपाय रूप से निर्दिष्ट है। पाश्चात्य चिकित्सा ग्रन्थों में भी उन्माद, अपस्मार आदि रोगों में भूत आदियों का निदान रूप में वर्णन मिलता है। इसी दृष्टि से वैदिक समय में भी कौशिक सूत्र आदियों में उस-उस रोग के निदान भूत राक्षस आदियों को दूर करने के लिये आथर्वण मन्त्रों का प्रयोग किया गया है। किसी-किसी का ऐसा भी विचार है कि अथर्व आदि मन्त्रोंमें उस-उस रोग के कारण भूत जो नाना प्रकार