काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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के कृमियों का उल्लेख है वह भी रोगों के कारणभूत राक्षस आदि परक की जानना चाहिये। वे रोगों के जीवाणु (Germs) अथवा राक्षसभूत आदि दोनों ही संभव हैं। ग्रन्थकारों ने तीन सिर, तीन पैर, तथा लाल आँखों वाली ज्वर आदि रोगों की जो मूर्तियाँ (चित्र) बनाई हैं वे भी उन-उन रोगों के निदानभूत राक्षस आदि या रोगों के जीवाणुओं की आकृति की कल्पना द्वारा ही बनाई गई प्रतीत होती हैं। आजकल सूक्ष्मवीक्षणयन्त्र (Microscope) द्वारा देखने पर उन-उन रोगों में भिन्न-भिन्न तथा विचित्र आकृति वाले जीवाणु मिलते हैं। इन्हीं भीषण आकृति वाले जीवाणुओं का ही अन्तर्दृष्टि वाले प्राचीन ऋषियों ने संभवतः राक्षस रूप में वर्णन किया हो। आजकल भी पहाड़ी जाति में ज्वर आदि को भूत आदियों से उत्पन्न हुआ मानकर अपमार्जन (झाड़ना-फूकना), दूसरे प्राणियों में संक्रामण, तथा बलि देना आदि मान्त्रिक उपचार प्रायः किये जाने हैं तथा सफल भी होते देखे जाते हैं। आजकल कहीं-कहीं व्यवहार में दिखाई देने वाले ऐसे उपाय एकदम निर्मूल नहीं हैं अपितु प्राचीन वैदिक अवस्था से ही प्रारंभ होकर टूटी फूटी अवस्था में किसी न किसी रूप में आजतक भी प्रचलित हुए समझना चाहिये। इस प्रकार की मान्त्रिक प्रक्रिया से युक्त भैषज्य प्रक्रिया न केवल प्राचीन भारत में ही थी अपितु प्राचीन मिश्र, पाश्चात्य देश तथा उत्तरी अमेरिका के देशों में भी थी जैसा कि उन-उन देशों के प्राचीन इतिहास के अनुसन्धान से स्पष्ट है।
कुछ लोगों का जो यह विचार है कि आथर्वण सम्प्रदाय में केवल मान्त्रिक भूत विद्या ही रोगों को दूर करने का उपाय था, यह सर्वांश में सत्य नहीं है। वैदिक समय में मिथ्याहार-विहार के समान पाप, भूतप्रेत आदि रोगों के हेतु रूप से तथा रुद्र आदि देवताओं का कोप एवं ओषधियों के प्रयोग के समान उस-उस देवता का आराधन करके उसे प्रसन्न करना, विशेष-विशेष मन्त्रों द्वारा भूत आदियों को दूर करने के लिये रोगियों का मार्जन, जलाभिषेचन, अभिमन्त्रण, धूपन आदि रोगों को दूर करने के उपाय यद्यपि मिलते हैं तथापि पूर्वोक्तानुसार बहुत से रोग, शल्यप्रक्रियायें, बहुत से शारीरिक अवयव, उस-उस रोग को दूर करने वाली अनेक ओषधियों का मन्त्रों में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलने से यह कहा जा सकता है कि मन्त्रविद्या के समान भैषज्यप्रक्रिया में भी आथर्वणी प्रवृत्ति विद्यमान थी। इस प्रकार प्राचीन लोग मन्त्रविद्या तथा औषधविद्या दोनों ही मार्गों का अनुसरण करते थे। परन्तु आथर्वण सूक्तों के मन्त्रों में से कुछ मन्त्रों का शब्दार्थ करते हुए उनके भूतविद्या से रहित आयुर्वेदीय विषयों के प्रतिपादक दिखाई देने पर भी गृह्यकार आदि के द्वारा जल के प्रतिपादक 'शन्नो देवी' इत्यादि मन्त्रों का शनिग्रहादि परक अर्थ करने के समान ही कौशिक सूत्रकार द्वारा अभिचार (हिंसाकर्म), मन्त्रकरण्डबन्धन (रक्षासूत्र का बांधना) तथा भूतापसारण परक आदि अर्थ किया जाना कालक्रमागत दृष्टि भेद को प्रकट करता है।
ऋक संहिता में अल्प मात्रा में आई हुई मान्त्रिक उपचार प्रक्रिया तथा भैषज्य विद्या की अथर्ववेद में अधिकता दिखाई देने से विकास प्रतीत होता है। उसके बाद शुद्धरूप से भैषज्य का निर्देश करने वाले मन्त्रों का भी कौशिकसूत्रकार ने मान्त्रिक प्रक्रिया परक अर्थ लगाया है। इससे प्रतीत होता है कि सूत्रकाल में मान्त्रिक प्रक्रिया का विशेष विकास हुआ था। इस प्रकार क्रमिक विकासपरम्परा समाप्त हो जाती है। अथवा भूतविद्या का आचार्य था ऐसी भी श्रुति है। इसीलिये अथर्ववेद में भूतविद्या तथा मन्त्र विद्या के विषय विशेषरूप से सम्मिलित हैं। इस कौमारभृत्य तन्त्र में बालरोगों में स्कन्द, अपस्मार ग्रह, पूतना आदि को निदान रूप से तथा धूपन, पूजन आदि को रोग-प्रतीकार रूप से देने के समान ही धातुविषमता को रोग के हेतु रूप तथा उन-उन ओषधियों का उस-उस रोग को दूर करने में उपयोग दिया होने से प्रतीत होता है कि पूर्वकाल में दोनों प्रक्रियाएँ विद्यमान थीं।
वैदिक साहित्य में बहुत से वैद्यक के विषयों के मिलने पर भी पूर्वोक्तानुसार ऋग्वेद में अश्वियों द्वारा नाना चमत्कार रूप भैषज्य विषयों का केवल ऐतिहासिक रूप से ही वर्णन मिलता है। किस रीति से अश्वियों ने विश्पला की जङ्घा जोड़ी,