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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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के कृमियों का उल्लेख है वह भी रोगों के कारणभूत राक्षस आदि परक की जानना चाहिये। वे रोगों के जीवाणु (Germs) अथवा राक्षसभूत आदि दोनों ही संभव हैं। ग्रन्थकारों ने तीन सिर, तीन पैर, तथा लाल आँखों वाली ज्वर आदि रोगों की जो मूर्तियाँ (चित्र) बनाई हैं वे भी उन-उन रोगों के निदानभूत राक्षस आदि या रोगों के जीवाणुओं की आकृति की कल्पना द्वारा ही बनाई गई प्रतीत होती हैं। आजकल सूक्ष्मवीक्षणयन्त्र (Microscope) द्वारा देखने पर उन-उन रोगों में भिन्न-भिन्न तथा विचित्र आकृति वाले जीवाणु मिलते हैं। इन्हीं भीषण आकृति वाले जीवाणुओं का ही अन्तर्दृष्टि वाले प्राचीन ऋषियों ने संभवतः राक्षस रूप में वर्णन किया हो। आजकल भी पहाड़ी जाति में ज्वर आदि को भूत आदियों से उत्पन्न हुआ मानकर अपमार्जन (झाड़ना-फूकना), दूसरे प्राणियों में संक्रामण, तथा बलि देना आदि मान्त्रिक उपचार प्रायः किये जाने हैं तथा सफल भी होते देखे जाते हैं। आजकल कहीं-कहीं व्यवहार में दिखाई देने वाले ऐसे उपाय एकदम निर्मूल नहीं हैं अपितु प्राचीन वैदिक अवस्था से ही प्रारंभ होकर टूटी फूटी अवस्था में किसी न किसी रूप में आजतक भी प्रचलित हुए समझना चाहिये। इस प्रकार की मान्त्रिक प्रक्रिया से युक्त भैषज्य प्रक्रिया न केवल प्राचीन भारत में ही थी अपितु प्राचीन मिश्र, पाश्चात्य देश तथा उत्तरी अमेरिका के देशों में भी थी जैसा कि उन-उन देशों के प्राचीन इतिहास के अनुसन्धान से स्पष्ट है।

कुछ लोगों का जो यह विचार है कि आथर्वण सम्प्रदाय में केवल मान्त्रिक भूत विद्या ही रोगों को दूर करने का उपाय था, यह सर्वांश में सत्य नहीं है। वैदिक समय में मिथ्याहार-विहार के समान पाप, भूतप्रेत आदि रोगों के हेतु रूप से तथा रुद्र आदि देवताओं का कोप एवं ओषधियों के प्रयोग के समान उस-उस देवता का आराधन करके उसे प्रसन्न करना, विशेष-विशेष मन्त्रों द्वारा भूत आदियों को दूर करने के लिये रोगियों का मार्जन, जलाभिषेचन, अभिमन्त्रण, धूपन आदि रोगों को दूर करने के उपाय यद्यपि मिलते हैं तथापि पूर्वोक्तानुसार बहुत से रोग, शल्यप्रक्रियायें, बहुत से शारीरिक अवयव, उस-उस रोग को दूर करने वाली अनेक ओषधियों का मन्त्रों में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलने से यह कहा जा सकता है कि मन्त्रविद्या के समान भैषज्यप्रक्रिया में भी आथर्वणी प्रवृत्ति विद्यमान थी। इस प्रकार प्राचीन लोग मन्त्रविद्या तथा औषधविद्या दोनों ही मार्गों का अनुसरण करते थे। परन्तु आथर्वण सूक्तों के मन्त्रों में से कुछ मन्त्रों का शब्दार्थ करते हुए उनके भूतविद्या से रहित आयुर्वेदीय विषयों के प्रतिपादक दिखाई देने पर भी गृह्यकार आदि के द्वारा जल के प्रतिपादक 'शन्नो देवी' इत्यादि मन्त्रों का शनिग्रहादि परक अर्थ करने के समान ही कौशिक सूत्रकार द्वारा अभिचार (हिंसाकर्म), मन्त्रकरण्डबन्धन (रक्षासूत्र का बांधना) तथा भूतापसारण परक आदि अर्थ किया जाना कालक्रमागत दृष्टि भेद को प्रकट करता है।

ऋक संहिता में अल्प मात्रा में आई हुई मान्त्रिक उपचार प्रक्रिया तथा भैषज्य विद्या की अथर्ववेद में अधिकता दिखाई देने से विकास प्रतीत होता है। उसके बाद शुद्धरूप से भैषज्य का निर्देश करने वाले मन्त्रों का भी कौशिकसूत्रकार ने मान्त्रिक प्रक्रिया परक अर्थ लगाया है। इससे प्रतीत होता है कि सूत्रकाल में मान्त्रिक प्रक्रिया का विशेष विकास हुआ था। इस प्रकार क्रमिक विकासपरम्परा समाप्त हो जाती है। अथवा भूतविद्या का आचार्य था ऐसी भी श्रुति है। इसीलिये अथर्ववेद में भूतविद्या तथा मन्त्र विद्या के विषय विशेषरूप से सम्मिलित हैं। इस कौमारभृत्य तन्त्र में बालरोगों में स्कन्द, अपस्मार ग्रह, पूतना आदि को निदान रूप से तथा धूपन, पूजन आदि को रोग-प्रतीकार रूप से देने के समान ही धातुविषमता को रोग के हेतु रूप तथा उन-उन ओषधियों का उस-उस रोग को दूर करने में उपयोग दिया होने से प्रतीत होता है कि पूर्वकाल में दोनों प्रक्रियाएँ विद्यमान थीं।

वैदिक साहित्य में बहुत से वैद्यक के विषयों के मिलने पर भी पूर्वोक्तानुसार ऋग्वेद में अश्वियों द्वारा नाना चमत्कार रूप भैषज्य विषयों का केवल ऐतिहासिक रूप से ही वर्णन मिलता है। किस रीति से अश्वियों ने विश्पला की जङ्घा जोड़ी,

१८०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

ऋज्राश्व की आंखें ठीक की, श्रोण के जानुओं को क्रियाशील बनाया-इत्यादि के विशेष विधान का इससे ज्ञान नहीं होता। कहीं-कहीं किन्हीं ओषधियों का वर्णन है परन्तु वहां उनकी उपयोग विधि नहीं दी है। अथर्ववेद में यद्यपि नाना रोग, औषध, रोगों के कारण, कृमि आदि, अमुक ओषधि के सेवन से अमुक रोग का प्रतीकार इत्यादि विषय भी मन्त्रों में मिलते हैं परन्तु उनसे भी उनकी उपयोग की विधि मालूम नहीं होती। इस प्रकार उन मन्त्रों से केवल तात्कालिक आयुर्वेद विज्ञान की स्थिति सूचित होती है।

'यत्रौषधीः समग्मत राजानः समिताविव । विप्रः स उच्यते भिषग्रक्षोहामीव चातनः' ।।
(ऋक् १०. ९७. ६)

शतं ह्यस्य भिषजः सहस्रमुर्वी गभीरा सुमतिस्तेऽस्तु ।। (ऋक्. १. २४. ९)
शतं ह्यस्य भिषजः सहस्रमुत वीरुधः ।। (अथर्व २. ९. ३)

इत्यादि मन्त्रों से प्रतीत होता है कि सैकड़ों ओषधियों के संग्रहकर्ता विप्र भिषक् (वैद्य) होते थे। वैद्य भी न केवल एक दो थे अपितु सैकड़ों की संख्या में थे। ओषधिरूप से ज्ञात लता वनस्पतियां आदि भी स्वल्प नहीं थीं अपितु हजारों की संख्या में थीं। इनसे ज्ञात होता है कि इस विज्ञान के ज्ञाता सैकड़ों महर्षियों द्वारा प्रतिपादित, सम्पूर्णरूप से व्यवहृत, तथा श्रृंखलारूप में विद्यमान सम्पूर्ण ओषधियों से युक्त यह आयुर्वेद एक पृथक् ग्रन्थ के रूप में विद्यमान था। क्योंकि ज्ञातव्य विषयों की सूचना तथा उनके उपयोग से होने वाले लाभों का निर्देश वेदों में स्थान-स्थान पर विकीर्णरूप में (Scattereb) हमें मिलता है। वेद शब्द से समष्टि रूप में विद्यमान आदिम ज्ञान का बोध होता है तथा उसकी समीपता वाले व्यक्ति विशेष का ज्ञान उपवेद शब्द से सूचित होता है। गान्धर्व, धानुष्य, स्थापत्य आदि के ज्ञान की तरह व्यष्टि रूप से विद्यमान आयु की रक्षा का ज्ञान आयुर्वेद शब्द से ध्वनित होता है। यह प्राचीन आयुर्वेद ब्रह्मा, अश्वि तथा इन्द्र की संहिता रूप से पृथक् रूप में ही विद्यमान होगा। इसी कारण कुछ आचार्यों ने इसे जो उपवेद रूप से लिखा है तथा कश्यपाचार्य ने इसका पांचवें वेद के रूप में निर्देश किया है वह ठीक ही है। परन्तु कालव्यतिक्रम से वह प्राचीन तथा मूलभूत आयुर्वेद आजकल पृथक् रूप से नहीं मिलता है। केवल वैदिक संहिताओं में कहीं-कहीं विकीर्णरूप से अथवा सम्प्रदाय परम्परा द्वारा किसी-किसी ऋषि की लेखबद्ध रचना द्वारा ही मिलता है।

उपलब्ध प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रन्थों तथा वैदिक संहिता ग्रन्थों में आये हुए आयुर्वेद के विषयों का विचार करने पर रोगों के नाम, ओषधियों के नाम, उनके उपयोग तथा निरूपण शैली आदि में बहुत ही भेद दिखाई देता है। वैदिक विषयों की अपेक्षा आर्षसंहिता ग्रन्थों के विषयों में क्रमागत विकसितावस्था भी विशेषरूप से दिखाई देती है। भाषाशास्त्र की दृष्टि से भी इस प्रकार का अन्तर थोड़े समय के व्यवधान से संभव नहीं है। लेख तथा भाषा की शैली में जितना अन्तर प्राचीन सूत्र आदि ग्रन्थों, दो हजार वर्ष पूर्व के कवियों की रचनाओं, बौद्ध-साहित्य तथा काश्यप, आत्रेय, धन्वन्तरि आदि महर्षियों के लेखों का आधुनिक लेखों से है उससे भी अधिक अन्तर वैदिक संहिताओं तथा आर्षसंहिताओं में आये हुए आयुर्वेद के विषय में है। यह अन्तर (भेद) बहुत लम्बे समय के व्यवधान के विना संभव नहीं है। प्रत्येक साहित्य में विज्ञान का विकास क्रमिक ही हुआ करता है। आयुर्वेद विज्ञान के विषय में भी वैदिक साहित्य की अपेक्षा आर्षसंहिता के साहित्य का विकास बहुत लम्बा कालक्रमागत पूर्व परम्परा की अपेक्षा रखता है। वैदिक साहित्य के बाद ब्राह्मण, उपनिषद्, कल्प, सूत्र रूपी धाराओं में विरलरूप से बहता हुआ आयुर्वेद विज्ञान का प्रवाह अपनी-अपनी आचार्य परम्परा के बिना प्राचीन आर्ष संहिता ग्रन्थों में उस ज्ञानोदधि को किस प्रकार प्रकट कर सकता है। इसलिये स्थान-स्थान पर पूर्वाचार्यों द्वारा निर्दिष्ट, नाममात्र शेष तथा जिनके नाम भी लुप्त हो चुके हैं ऐसे प्राचीन आचार्यों की उपदेशरूपी विज्ञान परम्परा ही आयुर्वेद विज्ञानप्रवाह में वैदिक साहित्य एवं आर्षसंहिता की मिलाने वाले सेतु (Connecting link) के रूप में कार्य कर रही

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८१

है। यह अदृश्य सेतुभूत परम्परा भी अन्ततोगत्वा कम से कम हजार दो हजार वर्ष से कम नहीं हो सकती। ‘विविधानि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके’ के द्वारा भगवान् आत्रेय भी अपने समय में प्रचलित अन्य आचार्यों के शास्त्रों का उल्लेख करता है। इसप्रकार आत्रेय आदि से पूर्व भी अन्य आचार्यों का होना स्पष्ट है। यहां यह भी विचारणीय विषय है कि वैदिक आयुर्वेद विज्ञान में शल्यप्रक्रिया तथा अन्य शारीरिक आदि विभागों के संबन्ध में भी अत्यन्त सूक्ष्म विचार आये हुए हैं। ओषधिविभाग (Medical side) को देखने पर उसमें हमें धातु, रत्न, रस आदि का उल्लेख नहीं मिलता है। केवल वनस्पति आदि साधारण ओषधियां (Herbal drugs) ही प्रयुक्त की जाती हुई दिखाई देती हैं। तथा वे जङ्गिड, कुष्ठ, रोहिणी अपामार्ग आदि वनस्पतियां भी उस-उस रोग में केवल पृथक्-पृथक् ही व्यवहृत हुई मिलती हैं। कौशिक-सूत्रकार ने भी लगभग उसी प्रकार से मधु, तैल, घृत, पिप्पली, काष्ठ आदि वस्तुओं का अमुक-अमुक २ रोग में पृथक्-पृथक् व्यवहार किया है। आलविसोलफाण्ट-भृङ्गराज आदि पुष्पों के रस का लेप, नवनीत (मक्खन) मिले हुए कुष्ठ का प्रलेप (Paste) तथा पकाये हुए दूध और लाक्षा का पीना-इत्यादि दो तीन वस्तुओं के मिले हुए योग कहीं-कहीं ही दिये हैं। अमुक-अमुक रोग तथा अमुक-अमुक दोषहर वस्तुओं के ठीक-ठीक ज्ञान हो जाने पर उनके परिहार के उपाय यथासमय स्वयं विचारे जा सकते हैं। इसी को दृष्टि में रखते हुए मूल परिभाषा रूप में ज्ञातव्य शास्त्रों के विषयों को लेकर वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक तथा जीवनीय, बृंहणीय, तर्पणीय, संशमनीय एवं वृष्य आदि वर्गानुसार ओषधियों को विभक्त करके तथा रोगों के प्रतीकार के मूलभूत उपाय पञ्चकर्म आदि प्रधान विषयों को संगृहीत करके भिन्न-भिन्न संहिताओं के रचयिताओं ने सबसे पूर्व सूत्रस्थान को बनाया। उतने को ही ठीक-ठीक जानकर उनसे कल्पित योगों के द्वारा रोग दूर किये जा सकते हैं इस लिये सूत्रस्थान मात्र भी ओषधियों के लिये पर्याप्त है, यह कहा जा सकता है। आजकल भी गांवों तथा पहाड़ों में भिन्न-भिन्न रोगों में केवल एक दो वनस्पतियों का प्रयोग किया जाता हुआ उसी प्राचीन मौलिक प्रक्रिया को सूचित करता है। इसके बाद धीरे-धीरे ज्यों-ज्यों वस्तुओं के गुणों तथा दोषों का अनुभव बढ़ता गया तथा रोग भी क्लिष्ट (कई दोषों से युक्त) होते गये त्यों-त्यों २ एक ही योग द्वारा सब दोषों को दूर करने की इच्छा से समान एवं विशेष गुण वाली ओषधियों को मिलाकर सामूहिक योग बनाकर प्रयोग करने की विधि प्रचलित हुई। ज्यों-ज्यों प्राणिसमूह की वृद्धि, देश-काल-जल-वायु-अन्न-पान-स्थान-अवस्था आदि में परिवर्तन, व्यक्तियों में परस्पर सम्पर्क एवं संघर्ष का उदय, तथा नाना रोग स्वरूप बाह्य एवं आभ्यन्तर शारीरिक विकार उत्पन्न होते गये, त्यों-त्यों क्रम से उस-उस रोग तथा उसकी निवृत्ति के उपायों के ज्ञात होने पर तथा परिस्थिति के अनुसार वही रोग अनेक रूपों में दिखाई देता हुआ नये रूप तथा नये नाम द्वारा प्रकट होने लगा। तथा उसी के अनुसार उन-उन दोषों को दूर करने के लिये वस्तुओं को मिलाकर सामूहिक रूप में योग बनने लगे होंगे। फिर ऋषियों ने इन पूर्वकल्पित तथा अपने विशुद्ध अन्तःकरणों में प्रस्फुरित योगौषधियों को मिलाकर सूत्र-स्थान में आये हुए विषयों को अपने विचारों द्वारा बढ़ाकर सूत्रस्थान के अनुसार ही अन्य स्थानों को जोड़कर इसे पूरी संहिता का रूप दिया होगा। इसके बाद उत्तरोत्तर अन्य विद्वानों ने पूर्वापर अनुभवों से सिद्ध रोगों तथा उनके प्रतिकारों के उपायों को लेकर देश-काल तथा परिस्थिति के अनुसार अन्य अनेक आयुर्वेद के ग्रन्थ बनाये। इस प्रकार नाना द्रव्यों के योग (समूह) से बनी हुई ओषधियों के प्रयोग की पद्धति भी अर्वाचीन नहीं है। हार्नले द्वारा निर्दिष्ट, श्टाइन द्वारा पूर्व टर्की स्थित तूह्नाडु (Tun Huang-चीन की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित) नामक स्थान में प्राप्त प्राचीन पुस्तक के प्राचीन ईरानी भाषा के अनुवाद के साथ जो मूल संस्कृत का लेख है उसमें भगवान् बुद्ध द्वारा जीवक को संबोधित करके उपदिष्ट ओषधियों का वर्णन मिलता है। महावग्ग में निर्दिष्ट जीवक के साहचर्य से बुद्ध के इस उपदेश में नाना ओषधियों के योग से बनी हुई ओषधियों का उल्लेख होने से नाना द्रव्यों के योग से बनी ओषधियों का प्रचार भी बुद्ध के समय से पहले से विद्यमान था ऐसा अन्य ग्रन्थों से भी प्रतीत होता है। पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति में भी दूर करने


१. आर. जी. भण्डारकर कमोरेशन भाग १ पृ. ४१६

१८२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

योग्य दोष के अनुसार अमुक गुण एवं दोष वाली वस्तुओं को उपयोग के समय मिलाकर व्यवहार करने की प्रक्रिया के प्राचीन समय में होने पर भी आजकल अनेक मिले हुए दोषों वाले रोगों को दूर करने के लिये मिली हुई ओषधियों द्वारा पेटेन्ट ओषधियां भी बनती हैं तथा उन्हें नुस्खे या फार्मूले के रूप में प्रकाशित भी किया जाता है। पूर्वापर स्थानभेद से संक्षेप एवं विस्ताररूप से अपने ज्ञातव्य विषय का ठीक-ठीक ज्ञान कराने वाली संहिताओं तथा वर्तमान निबन्धों द्वारा विशद किया हुआ भी यह चिकित्सा विज्ञान केवल दिग्दर्शन मात्र के लिये ही है। सब लोगों की शारीरिक तथा प्राकृतिक परिस्थिति सदा एक जैसी नहीं रहती। एक ही रोग प्रत्येक व्यक्ति तथा उसकी प्रकृति के भेद से विभक्त होकर अनेक रूपों वाला हो जाता है। ज्यों-ज्यों देश, काल, जल-वायु, आहार-विहार आदि की परिस्थिति के भेद से तथा दोषों के संयोग से नाना रूपों में रोग बढ़ते हैं तथा नये-नये रूप धारण करते हैं त्यों-त्यों देश-काल आदि के अनुसार ओषधियों के आवापोद्वाप, मान में गुरु एवं लघु का अन्तर तथा रचना के पौर्वापर्यक्रम को करके नये-नये रोगों के प्रतिकार के उपाय तथा अनुभवसिद्ध ओषधियों को लेकर प्राचीन आयुर्वेद विज्ञान के कोश को सुरक्षित रखने तथा बढ़ाने की आवश्यकता है।

(२) ग्रन्थ परिचय सहित आचार्यों का विवरण

आयुर्वेद का प्रकाश तथा आचार्य—उत्पन्न हुए प्राणियों की स्वास्थ्यरक्षा की दृष्टि से सृष्टि के प्रारम्भ में स्वयंभू ब्रह्मा ने ही संहितारूप से आयुर्वेद को प्रकाशित^१ किया। वह आयुर्वेद अश्विनीकुमार तथा इन्द्र आदि द्वारा ऋषियों को प्राप्त होकर उनके द्वारा लोक में प्रचलित हुआ, आयुर्वेद के आचार्य इसका ऐसा इतिहास बतलाते हैं। अस्तु, चाहे यह आयुर्वेद ब्रह्मा से प्रारम्भ हुआ हो, चाहे देवताओं द्वारा उपदिष्ट हो और चाहे यह ऋषिवर्ग द्वारा प्रकाशित हो, इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसका प्रादुर्भाव प्रत्येक अवस्था में प्राचीन ही है। आयुर्वेद के मूलग्रन्थों से निम्न सम्प्रदाय क्रम मिलता है—

ब्रह्मा
दक्ष
अश्विनीकुमार
इन्द्र

(सुश्रुत संहिता के अनुसार)(काश्यप संहिता के अनुसार)(चरक संहिता के अनुसार)
धन्वन्तरिकश्यप वसिष्ठ अत्रि भृगुभरद्वाज
दिवोदासइनके पुत्र तथा शिष्यआत्रेय पुनर्वसु
सुश्रुत औपधेनव वैतरणअग्निवेश भेड जतूकर्ण पराशर
औरभ्र पौष्कलावत करवीर्यहारीत क्षारपाणि आदि
गोपुर रक्षित भोज आदि

इस काश्यपसंहिता की उपदेश-परम्परा के वर्णन में 'स्वयम्भूर्ब्रह्माऽऽयुर्वेदमग्रेऽसृजत्, ततश्च तं पुण्यमायुर्वेदमश्विभ्यां कः प्रददौ, ताविन्द्राय, इन्द्र ऋषिभ्यश्चतुर्भ्यः कश्यपवसिष्ठात्रिभृगुभ्यः, ते पुत्रेभ्यः शिष्येभ्यश्च प्रददुर्हितार्थम् (पृ. ६१), इस लेख के द्वारा इन्द्र से साक्षात् हीं कश्यप आदि प्राचीन ऋषियों ने यह विद्या प्राप्त की ऐसा प्रतीत होता है। चरक के


१. (क) स्वयम्भूर्ब्रह्मा प्रजाः सिसृक्षुः प्रजानां परिपालनार्थमायुर्वेदमेवाग्रेऽसृजत्। (काश्यपसंहितायां पृ. ६१)
(ख) इह खल्वायुर्वेदमष्टाङ्गमपाङ्गमथर्ववेदस्यानुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्त्रं च कृतवान् स्वयम्भूः। (सुश्रुते सू. अ. १)
(ग) ब्रह्मणा हि यथाप्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः। (चरके सू. अ. १)

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८३

प्रारम्भ में रोगों से दुःखी हुए प्राणियों की रोगमुक्ति के उपाय को ढूंढने की इच्छा से समवेत हुए महर्षियों की प्रेरणा से इन्द्र के पास जाकर उससे आयुर्वेद विद्या को प्राप्त कर लौटे हुए भरद्वाज द्वारा महर्षियों को इसका उपदेश देने के निर्देश से प्रतीत होता है कि इन्द्र द्वारा उपदिष्ट भरद्वाज से ही ऋषियों को यह विद्या प्राप्त हुई। भरद्वाज आयुर्वेद विद्या का कोई प्राचीन आचार्य था ऐसा 'ज्वरसमुच्चय' में आये हुए वचनों से भी ज्ञात होता है। महाभारत में भी वैद्याचार्य भरद्वाज का निर्देश है। चरकसंहिता के उपक्रम तथा उत्तर भाग में भरद्वाज का दो प्रकार से उल्लेख किया गया है। वातकलाकलीय (च.सू.अ. १२) तथा आत्रेयभद्रकाप्यीय (च.सू.अ. २६) अध्यायों में कुमारशिरा भरद्वाज का मत दिया हुआ है। इस विशेषण से युक्त दिया होने के कारण यह भरद्वाज कोई अन्य ही प्रतीत होता है। इसके मत का आत्रेय ने खण्डन भी किया है। यज्जः पुरुषीय (च. सू. अ. २५) तथा खुड्डीका-गर्भावक्रान्ति (च. शा. अ. ३) अध्याय में विशेषण रहित भरद्वाज का मत दिया है। वहां भी भरद्वाज के मत का आत्रेय ने खण्डन ही किया है। तथा उसके बाद अपने मत का खण्डन होने पर जिज्ञासा द्वारा पूछने पर आत्रेय ने उसका विशेष विवरण दिया है। इस प्रकार का निर्देश होने से भरद्वाज इसका गुरु प्रतीत नहीं होता है। वातकलाकलीय अध्याय में भरद्वाज का कुमारशिरा यह विशेषण आत्रेय के गुरु भरद्वाज के निराकरण के लिये कहा है तथा 'खुड्डीकागर्भावक्रान्ति' अध्याय में भरद्वाज शब्द से यहां आत्रेय के गुरु का बोध नहीं है अपितु अन्य ही कोई भरद्वाज गोत्र वाला प्रतीत होता है, इस प्रकार लिख कर टीकाकार चक्रपाणि ने स्पष्ट रूप से बतलाया है कि उपर्युक्त दोनों स्थलों पर आया हुआ भरद्वाज आत्रेय का गुरु नहीं है चक्रपाणि की उक्ति के अनुसार संभवतः गोत्रवाचक कई भरद्वाजों के संभव होने पर अत्रि परम्परागत किसी आत्रेय ने किसी भरद्वाज से इस विद्या को ग्रहण किया हो परन्तु आत्रेय संहिता में कहीं भी भरद्वाज से उपदेश ग्रहण, उसका सम्मान तथा उसके मत की प्रतिष्ठा को दिखाने वाले संकेतों के न मिलने से मन में सन्देह उत्पन्न होता है। इस प्रकार आत्रेय का गुरु भरद्वाज कौन है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। काश्यपसंहिता के रोगाध्याय में केवल कृष्ण भरद्वाज का उल्लेख है। यह भी विशेषणयुक्त कोई विभिन्न ही भरद्वाज प्रतीत होता है। काश्यपसंहिता के आयुर्वेदाध्ययन प्रकरण में प्रजापति, अश्वि, इन्द्र तथा सब विद्याओं के आचार्य परम पुरुष धन्वन्तरि के साथ अपने ग्रन्थ के मूल आचार्य कश्यप का भी स्वाहाकार देवताओं में जिस प्रकार निर्देश किया गया है, उसी प्रकार आत्रेयसंहिता (चरक. वि. अ. ८) में भी प्रजापति, अश्वि, इन्द्र तथा धन्वन्तरि के ही केवल स्वाहाकार का उल्लेख है। वहां 'सूत्रकारिणामृषीणाम्' इस सामान्य उल्लेख द्वारा यद्यपि भरद्वाज का ग्रहण भी हो सकता है परन्तु अपने ही ग्रन्थ में इन्द्र के बाद परम्परागत आचार्य एवं अपने ही गुरु रूप से निर्दिष्ट भरद्वाज के नाम तक का निर्देश न करना उचित प्रतीत नहीं होता है। जिस प्रकार काश्यप संहिता में कश्यप, वसिष्ठ, अत्रि तथा भृगु का इन्द्र से साक्षात् औपदेशिक सम्बन्ध दिखाया है, उसी प्रकार आत्रेयसंहिता के रसायनपाद में (च. चि. अ. १) भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, अङ्गिरा, अगस्त्य, पुलस्त्य, वामदेव, असित तथा गौतम आदि का इन्द्र द्वारा साक्षात् रसायन का उपदेश प्रदर्शित किया हैं। इसमें भी कहीं भरद्वाज का उल्लेख नहीं है। चरक के उपक्रम ग्रन्थ में मिलने वाले महर्षियों के समवाय में बहुत समय के पौर्वापर्य वाले आचार्यों का भी निर्देश होने से तथा उत्तरतन्त्र के समान लेख की प्रौढ़ता भी न दीखने से कुछ सन्देह उत्पन्न होता है। इस प्रकार चरक के उपक्रम में भरद्वाज द्वारा ही महर्षियों की जो विद्याप्राप्ति का निर्देश किया गया है उसका क्या तात्पर्य है यह नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार अनुसन्धान करने पर कश्यप, वसिष्ठ, अत्रि, भृगु, आदि महर्षियों द्वारा ही अति प्राचीन काल से अपने पुत्र एवं शिष्यसन्तति में आयुर्वेद विद्या का प्रचलन किया गया प्रतीत होता है। इसीलिये आत्रेय आदि शब्दों के गोत्रवाचक होने से आत्रेय परम्परा में चरक संहिता का मूल आचार्य आत्रेय पुनर्वसु, कृष्ण आत्रेय, भिक्षु आत्रेय आदि कई देखने में आते हैं। कश्यप परम्परा में भी कश्यप, वृद्ध काश्यप आदि बहुत से आचार्य मिलते हैं। एक आचार्य की गोत्र परम्परा में आया हुआ कोई व्यक्ति विशेष ज्ञान के लिए दूसरे आचार्य से भी विद्या ग्रहण कर सकता है। इस प्रकार चरक के उपक्रम के अनुसार अपनी पूर्व परम्परा से विद्या प्राप्त करके आत्रेय पुनर्वसु द्वारा भरद्वाज

१३ का.सं.

१८४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

से भी किसी विशेष विद्या का ग्रहण किया जाना सम्भव है। जिस प्रकार भृगु परम्परागत जीवक का मारीचकश्यप द्वारा भी विद्या ग्रहण किये जाने का निर्देश इस संहिता में भी मिलता है। महाभारत में यद्यपि भरद्वाज द्वारा धन्वन्तरि को विद्या की प्राप्ति तथा दिवोदास का भरद्वाज के आश्रम में जाने का उल्लेख मिलता है तथापि सुश्रुतसंहिता के अनुसार धन्वन्तरि दिवोदास का साक्षात् इन्द्र द्वारा ही विद्या-प्राप्ति का वर्णन मिलता है। परन्तु सब में इन्द्र को परम आचार्य होने से साक्षात् अथवा परम्परा द्वारा मूल उपदेष्टा स्वीकार किया गया है। इन धन्वन्तरि, मारीच कश्यप, आत्रेय पुनर्वसु आदि ऋषियों ने लोकोपकार के लिये इस विज्ञान का संहिता रूप से अपने शिष्यों को उपदेश किया। इस प्रकार वैदिक विज्ञान रूपी भूमिका में ब्रह्मा के विज्ञान सम्बन्धी बीज को लेकर उत्पन्न हुआ तथा अश्वि, इन्द्र, कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, भृगु आदि परम्परा तथा धन्वन्तरि, आत्रेय, कश्यप आदि अन्य पूर्वाचार्यों द्वारा प्रयत्न पूर्वक प्रत्येक शाखा का परिष्कार करके पल्लवित, पुष्पित, एवं फलित किया गया यह प्राचीन आयुर्वेदरूपी कल्पवृक्ष काल के ग्रास से बचे हुए कुछ फलों से शिष्य परम्परा द्वारा आज भी लोगों को जो जीवन दान कर रहा है यह भी सन्तोष का ही विषय है।

यद्यपि वैदिकसाहित्य में आयुर्वेद के आठ विभाग तथा उनके नामों का उल्लेख नहीं मिलता। तथा आत्रेय के लेखानुसार ब्राह्म विज्ञान (ब्रह्मा ने जब आयुर्वेद का उपदेश किया) के समय यह विज्ञान हेतु¹ (Cause), लिङ्ग (Symptoms) तथा औषध (Treatment) के ज्ञानवाला त्रिसूत्र रूप में ही था। इस प्रकार वैदिक आयुर्वेद विज्ञान प्राचीनकाल में त्रिस्कन्धात्मक ही प्रतीत होता है। तथापि वैदिक आयुर्वेद के विषयों के संग्रह तथा पूर्वोक्तानुसार अश्वियों के वर्णन में जङ्घा का जोड़ना, टुकड़े किये हुये शरीर का सन्धान, दृष्टि तथा श्रवण शक्ति का प्राप्त कराना, कुष्ठादि का निवारण, च्यवनरसायन, अपुत्रा के पुत्रोत्पादन आदि तथा इन्द्र की स्तुति में भी इसी प्रकार के नाना विषयों के मिलने से तथा ऋक्, यजु और अथर्ववेद आदि में अनेक प्रकार की भैषज्य, ओषधि विद्या, भूतविद्या तथा विषयपरिहार विद्या के स्थान-स्थान पर मिलने से शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, अगद, भूतविद्या, रसायन आदि आठों भागों के विषय पृथक्-पृथक् रूप में भी उस समय थे ऐसा प्रतीत होता है। भूतविद्या का आचार्य अथर्वा, महाभारत में आया हुआ अगद-तन्त्राचार्य काश्यप, कौमारभृत्याचार्य कश्यप, शालाक्याचार्य गार्ग्य एवं गालव तथा शल्याचार्य शौनकादि एक-एक प्रस्थान (विभाग) के आचार्य रूप में विद्यमान प्राचीन महर्षियों के उल्लेख मिलने से आयुर्वेद का आठ विभागों में विभक्त होना भी प्राचीन ही सिद्ध होता है। इसीसे एक-एक विभाग की विशिष्टता (Specialisation) के कारण कुछ महर्षियों की प्रसिद्धि हो गई। कोई-कोई सब विभागों (ज्ञानों) के सामूहिक रूप से भी ज्ञाता हो सकते हैं। जिस प्रकार ऋग्वेद की अपेक्षा अथर्ववेद में ओषधि, भैषज्य, भूतचातन, विषापहरण आदि विषय विकसित रूप में मिलते हैं उसी प्रकार उसका एक-एक अंश कालक्रम से विज्ञान द्वारा पुष्ट होकर ग्रहण, धारण तथा प्रयोग के सौकर्य की दृष्टि से पृथक्-पृथक् प्रस्थान (विज्ञान) रूप से विभागों में विभक्त हो गया। आर्ष समय में आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीनों प्रकार के दुःखों को पृथक्-पृथक् दूर करने के लिये अदृष्ट उपायों की तरह दृष्ट उपायों के भी क्रमशः विकसित होने से अथर्ववेद में होने वाले विकास को दृष्टि में रखते हुए निम्न आठ विभाग हो गये। शारीरभैषज्य में शरीरक्रिया की प्रधानता को लेकर शल्य, बहुत सी मुख्य इन्द्रियों की स्थिति के कारण प्रधान माने जाने वाले उत्तमाङ्ग (शिर) को लेकर शालाक्य, बल तथा वीर्य की वृद्धि संबन्धी वाजीकरण, वयःस्थापन रूप महाफल वाले तथा लम्बे विशेष प्रयोगों को लेकर रसायन, ऋतु, गर्भ तथा बालक की प्राथमिक अवस्था से संबनिधत कौमारभृत्य, इनसे भिन्न शारीरिक तथा मानसिक भैषज्यसंबन्धी कायचिकित्सा, बाह्य आगन्तुक विकार को शान्त करने तथा सांप, विच्छू आदि प्राणियों के विष विकार से संबन्धित अगदतन्त्र, भूतग्रहस्कन्द आदि देवताओं के विकारसंबन्धी भूतविद्या इत्यादि। इस प्रकार तीनो दुःखों के प्रत्येक विभाग


१. हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम् । त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं विबुधे यं पितामहः ॥
सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः । यथावद् चरात्सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ॥ (चरके सू. अ. १)

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८५

को लेकर उस-उस के प्रतीकार की दृष्टि से आठ प्रस्थान (विभाग) विभक्त हुए प्रतीत होते हैं। प्राचीन आचार्यों में ब्रह्मा तथा इन्द्र सर्वप्रस्थानों (आठों विभागों) के आचार्य थे। महाभारत के अनुसार इन्द्र द्वारा उपदिष्ट भरद्वाज तथा हरिवंश पुराण के अनुसार भरद्वाज से तथा सुश्रुतसंहिता के अनुसार साक्षात् इन्द्र द्वारा उपदिष्ट धन्वन्तरि सर्वप्रस्थानों के आचार्य माने गये हैं। एक-एक विषय के अधिक विकसित हो जाने के कारण जिस प्रकार आजकल एक-एक अङ्ग की विशेष चिकित्सा द्वारा एक-एक विभाग के विशेषज्ञ (Specialist) होते हैं। उसी प्रकार उस-उस विषय में विशेष नैपुण्य प्राप्त करने तथा शिष्यों के ग्रहण एवं धारण के सौकर्य के लिए महाभारत के अनुसार भरद्वाज ने तथा हरि^१वंश के अनुसार धन्वन्तरि ने आयुर्वेद विज्ञान को आठ भागों में विभक्त करके तथा एक-एक विभाग को विकसित करके पृथक्-पृथक् शिष्यों को उपदेश दिया तथा उसका प्रचार किया। इससे प्रतीत होता है कि आठों प्रस्थान पृथक्-पृथक् प्रवाहरूप में लोक में प्रचलित थे। कायचिकित्सा संबन्धी आत्रेय संहिता में तथा कौमारभृत्य संबन्धी काश्यप संहिता में प्रजापति, इन्द्र आदि आचार्यों के साथ धन्वन्तरि का हौम्य देवरूप से निर्देश किया जाना तथा नाना प्रस्थानों में धान्वन्तर घृत आदि का विधान होना धन्वन्तरि का अष्टाङ्गविभागों का आचार्य होना सूचित करता है। न केवल मूलधन्वन्तरि अपितु उसके सम्प्रदाय वाला द्वितीय धन्वन्तरि दिवोदास भी 'आयुर्वेद के आठों अङ्गों में से किसका उपदेश करूं' इस प्रकार सुश्रुत से पूछकर इस प्रश्न के उत्तर में 'शल्यशास्त्र का उपदेश कीजिये' ऐसी सुश्रुत द्वारा प्रार्थना किये जाने पर उसे शल्यशास्त्र का उपदेश दिया। इस प्रकार सुश्रुतसंहिता के उपक्रम के लेख द्वारा तथा पीछे अपने मुंह^२ से भी अष्टाङ्ग आयुर्वेद का ज्ञाता होना स्वीकार करने से भी अष्टाङ्ग विभाग का आचार्य होना सिद्ध होता है। अष्टाङ्ग के ज्ञाता भरद्वाज या इन्द्र द्वारा उपदिष्ट आत्रेय पुनर्वसु के अग्निवेश आदि ६ शिष्यों द्वारा पृथक्-पृथक् तन्त्रों के निर्माण के उल्लेख से तथा धन्वन्तरि दिवोदास से शल्यशास्त्र का उपदेश लेकर सुश्रुत द्वारा सुश्रुतसंहिता के निर्माण के उल्लेख से यद्यपि उन दोनों में कहीं-कहीं प्रसङ्गवश अन्य प्रस्थानों के विषय भी आ जाने से 'प्राधान्यतो व्यपदेशा भवन्ति' इस न्याय से भरद्वाज के अष्टाङ्गसम्प्रदाय में एक आत्रेय पुनर्वसु का कायचिकित्सा विभाग तथा धन्वन्तरि दिवोदास के अष्टाङ्ग सम्प्रदाय में से एक सुश्रुत का शल्यप्रधान सम्प्रदाय है। इस प्रकार आजकल भी चिरकाल से दोनों सम्प्रदाय हैं। इसके अतिरिक्त कौमारभृत्य के विषय में आत्रेय से भी प्राचीन मारीचकश्यप सम्प्रदाय के भी अब मिल जाने से आजकल तीन सम्प्रदाय हो गये हैं। चरक तथा सुश्रुत संहिता में लेशरूप से आये हुए कौमारभृत्य के विषय में स्वतन्त्र प्रस्थानरूप में पृथक् संहिता के मिल जाने से हम कह सकते हैं कि सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में संक्षिप्त रूप से आये हुए शालाक्य आदि अन्य विषय के भी इसी प्रकार से सर्वाङ्गपूर्ण स्वतन्त्र संहिताएँ तथा आचार्य होंगे। अन्य प्रस्थान यद्यपि कालवश आजकल लुप्त हो चुके हैं तो भी महा^३भारत, हरिवंश, सुश्रुत आदि में वर्णित यह अष्टङ्ग विभाग प्राचीन ही है। इस प्रकार यह कल्पना करना ठीक नहीं है। कि कायचिकित्सा में भरद्वाज का सम्प्रदाय तथा शल्यचिकित्सा में धन्वन्तरि सम्प्रदाय ये दो विभाग पुनः आठ विभागों में विभक्त हुए हैं।

इस प्रकार आर्ष समय में भी अष्टाङ्गों में से कालक्रम से विकसित एक-एक विभाग का विशेष रूप से निरूपण करने से उस विभाग में वे २ ऋषि प्रधान आचार्य माने गये हैं। सुश्रु^४त संहिता में शालाक्यतन्त्र के कर्ता के रूप में विदेहनिमि का, सुश्रु^५त, औपधेनव, औरभ्र, पौष्कलावत आदियों का शल्यचिकित्सक के रूप में शौन^६क, कृतवीर्य,


१. तस्य गेहे समुत्पन्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा। काशिराजो महाराजः सर्वरोगप्रणाशनः ॥
आयुर्वेदं भरद्वाजात् प्राप्येदं भिषजां क्रियाम्। तमष्टधा पुनर्व्यस्य शिष्येभ्यः प्रत्यपादयत् ॥ (हरिवंशे अ. २९)
२. अष्टाङ्गवेदविद्वांसं दिवोदासं महौजसम्। विश्वामित्रसुतः श्रीमान् सुश्रुतः परिपृच्छति ॥ (सु. उ. तं. अ. ६६)
३. महाभारते सभापर्वणि- 'आयुर्वेदस्तथाऽष्टाङ्गो देहवांस्तत्र भारत' ! एवं पूर्वनिर्दिष्टयोर्महाभारतहरिवंशलेखयोः। (११/१७)
४. सुश्रुते- शालाक्यतन्त्राभिहिता विदेहाधिपकीर्तिताः ॥ (सु. उ. अ. १४)
५. सुश्रुते- औपधेनवमौरभ्रं सौश्रुतं पौष्कलावतम्। शेषाणां शल्यतन्त्राणां नामान्येतानि निर्दिशेत् ॥ (सु. सू. अ. ४)
६. सुश्रुते- शरीरनिर्मितिविषये शौनकमतोल्लेखः ॥ (सु. शा. अ. ३)

१८६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

पाराशर्य, मार्कण्डेय, सुभूतिगौतम आदि का पूर्वाचार्य के रूप में वर्णन है। चरक¹ संहिता में अग्निवेश, भेड आदि छहों का कायचिकित्सा के आचार्य के रूप में, कांका²यन, वायोर्विद, हिरण्याक्ष, कौशिकमैत्रेय, कुश, साङ्कृत्यायन, कुमारशिरा भरद्वाज, वडिश, धामार्गव, मारीचि काष्य, काशीपति वामक, पारीक्षित् मौद्गल्य, शरलोम, कौशिक, भद्रकाप्य, धन्वन्तरि आदि का मतोल्लेख, अङ्गिरा³ जमदग्नि, काश्यप आदि बहुत से ऋषियों के नाम दिये हैं। इसी प्रकार इस वृद्धजीवकीय तन्त्र के भी सूत्रस्थान रोगाध्याय, सिद्धिस्थान राजपुत्रीयाध्याय, वमनविरेचनीयाध्याय तथा ग्रन्थ में भिन्न-भिन्न मत आने पर भार्गव, वायोर्विद, कांकायन, कृष्ण भरद्वाज, दारुवाह, हिरण्याक्ष, वैदेहनिमि, गार्ग्य, माठर, आत्रेय पुनर्वसु, पाराशर्य, भेड तथा कौत्स आदि नामों वाले बहुत से पूर्व आचार्यों का स्मरण किया गया है।

इनमें से पराशर, भेड, काङ्ख्यायन, हारीत, क्षारपाणि जातूकर्ण, आश्विन, भारद्वाज, भोज, भानुपुत्र, कपिलबल, भालुकि, खरनाद तथा विश्वामित्र आदि कुछ आचार्यों के मधूकोश, चरक तथा सुश्रुत की व्याख्या में तथा ताडपत्र लिखित प्राचीन 'ज्वरसमुच्चय' तथा 'ज्वरचिकित्सित' आदि पुस्तकों में उद्धृत वचन मिलने से इनके ग्रन्थों की सत्ता प्रकट होती है। तथा जिनके आजकल वचन उपलब्ध नहीं होते हैं उनके भी स्थान-स्थान पर तन्त्रकर्ता एवं सूत्रकार के रूप में निर्देश तथा मतों के दिखाई देने से ग्रन्थों का होना स्पष्ट है। हेमा⁴द्रि के लक्षणप्रकाश तथा शालिहोत्रोक्त अश्वशास्त्र के अश्वाभिषेक मन्त्रों में भी आयुर्वेद के कर्ता के रूप में बहुत से ऋषियों के नाम दिये हुए हैं।

इस प्रकार दैवयुग से लेकर आजतक देवर्षि तथा महर्षि आदि बहुत से आयुर्वेद के आचाय हुए हैं। अष्टाङ्ग आयुर्वेद के एक-एक विभाग को उन-उन आचार्यों ने ग्रन्थ निर्माण एवं उपदेश द्वारा बहुत बढ़ाया है। उस सब का यदि संकलन किया जाय तो आयुर्वेद का एक बड़ा भारी ग्रन्थ बन सकता है। परन्तु कालप्रवाह में अन्य शास्त्रों की तरह आयुर्वेद के भी बहुत से अमूल्य रत्न लुप्त हो चुके हैं। इन प्राचीन विलुप्त ग्रन्थों के विषय में मेरे परम मित्र श्रीयुत गण⁵नाथ सेनजी तथा गिरीन्द्र⁶नाथ मुखोपाध्याय आदि भारतीय तथा बहुत से पाश्चात्य विद्वानों ने पर्याप्त विवेचन किया है अतः उसके पिष्टपेषण की आवश्यकता नहीं है।


१. चरके—अग्निवेशश्च भेडश्च जतूकर्णः पराशरः। हारीतः क्षारपाणिश्च जगृहुस्तन्मुनेर्वचः ॥
तन्त्रस्य कर्ता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत्। अथ भेडादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च ॥ (च. सू. अ. १)
२. सूत्रस्थाने वातकलाकलीय (१२) यज्जः पुरुषीय (२५) आत्रेयभद्रकाप्यीया (२६) ध्यायेषु। (च. सू. अ. १)
३. चरकोपक्रमग्रन्थे।
४. विक्रम संवत् १५२५ में लिखी हुई हेमाद्रि की 'लक्षण-प्रकाश' नामक एक प्राचीन जीर्ण पुस्तक मेरे संग्रहालय में है। उसमें हाथियों के प्रकरण में पालकाप्य आदियों के वचन के समान अश्वप्रकरण में अनेक स्थानों पर शालिहोत्र के वचन दिये हैं। वे निम्न हैं—
वसिष्ठो वामदेवश्च च्यवनो भारविस्तथा। विश्वामित्रो जमदग्निर्भारद्वाजश्च वीर्यवान् ॥
असितो देवलश्चैव कौशिकश्च महाव्रतः। सावर्णिंगालवश्चैव मार्कण्डेयस्तु वीर्यवान् ॥
गौतमश्च ..... भागंश्च आगरुप (?) काश्यपस्तथा। आत्रेयः शाण्डिलश्चै तथा नारदपर्वतौ ॥
काण्वगो नहुषश्चैव शालिहोत्रश्च वीर्यवान्। अग्निवेशो मातलिंश्च जतुवर्णः पराशरः ॥
हारीतः क्षारपाणिश्च निमिश्च वदतांवरः। अदालिकश्च भगवान् श्वेतकेतुर्भृगुस्तथा ॥
जनकश्चैव राजर्षिस्तथैव हि विनन्गजित्। विश्वेदेवाः समरुतो भगवांश्च बृहस्पतिः ॥
इन्द्रश्च देवराजश्च सर्वलोकचिकित्सकाः। एते चान्ये च बहव ऋषयः संश्रितव्रताः ॥
आयुर्वेदस्य कर्तारः सुस्नातं तु दिशन्तु ते ॥ (पृ. १५९)
५. प्रत्यक्षशारीरभूमिकायाम् ॥
६. History of Indian Medicine.

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८७

आत्रेय तथा सुश्रुतसंहिताएँ—बहुत से प्राचीन ग्रन्थों के विलोप के कारण क्षतिग्रस्त आयुर्वेद की बची हुई महिमा को स्थिर रखने के लिए अत्यन्त प्राचीन काल से आत्रेय तथा धन्वन्तरि की संहिताएँ क्रमशः चरक तथा सुश्रुतसंहिता नाम से प्रसिद्ध आज भी मिलती हैं। इनके अत्यन्त प्रसिद्ध होने के कारण सूर्य तथा चन्द्रमा के लिये अन्य प्रकाश के समान इनके परिचय की आवश्यकता नहीं है।

अष्टाङ्गहृदय के लेखक वाग्भट के समय यद्यपि आयुर्वेद के अन्य आचार्यों की भी संहिताएँ विद्यमान थीं परन्तु फिर भी—

यदि चरकमधीते तद्ध्रुवं सुश्रुतादिप्रणिगदितगदानां नाममात्रेऽपि बाह्यः।
अथ चरकविहीनः प्रक्रियायामखिन्नः किमिव खलु करोति व्याधितानां वराकः ।।

इत्यादि श्लोक द्वारा मालूम पड़ता है कि यदि चरक का ही अध्ययन किया जाय तो सुश्रुत में आये हुए रोगों का नाम मात्र भी ज्ञान नहीं हो सकता तथा यदि केवल सुश्रुत का अध्ययन किया जाय तो रोगों के प्रतीकार की प्रक्रिया का ज्ञान असम्भव है। इसलिये चरक तथा सुश्रुत दोनों का अध्ययन ही आवश्यक है। इस प्रकार मध्यकाल में वाग्भट के समय में भी ये दोनों ग्रन्थ ही सर्वोपरि माने जाते थे। हजार वर्ष पूर्व के ज्वरसमुच्चय नामक पुस्तक में भी चरक तथा सुश्रुत के बहुत से वचन दिये हुए हैं। इसी प्रकार चतुर्थ शताब्दी के नावनोतक नामक पुस्तक में भी चरक तथा सुश्रुत का उल्लेख है। बाणभट्ट के हर्षचरित में पौनर्वसव (पुनर्वसु के पुत्र या शिष्य) वैद्यकुमार के निर्देश से आत्रेय पुनर्वसु के सम्प्रदाय का उस समय भी प्रचार मालूम पड़ता है। जब से चरक तथा सुश्रुत संहिता का उद्भव हुआ है तभी से ही अपने विचारों की गुरुता एवं गुणों की महिमा से भारत तथा उससे बाहर भी ये अत्यन्त प्रचलित रहे हैं तथा आज भी ये ग्रन्थ वैद्यों के लिये सर्वस्व हैं। सप्तम¹ अष्टम तथा नवम शताब्दी में जब कि अरब तथा पारसीक (पर्शिया) देश अत्यन्त उन्नत अवस्था में थे उस समय भारतीय चिकित्सा विज्ञान के आदर की ही दृष्टि से चरक तथा सुश्रुत संहिताओं का अनुवाद हुआ था। अरबी में अनूदित चरक-सरक नाम से तथा सुश्रुत सस्त्रद नाम से प्रसिद्ध हैं। अबूसीना (Abusina), अबूरासी (Abu Rasi), तथा अबूखिराबि (Abusirabi) नामक अरबी के चिकित्सा ग्रन्थों के लैटिन भाषा के अनुवाद में भी स्थान-स्थान पर चरक का नाम आता है। अ²लबेरूनी (Alberuni) नामक यात्री के पुस्तकालय में चरक का अनुवाद था ऐसा उसके अंगरेजी अनुवाद से ज्ञात होता है। अलम³नसूर (Almansur) ई. प. ७५३-७७४ ने बहुत से आयुर्वेदिक ग्रन्थों, चरक के सर्पचिकित्सा प्रकरण तथा सुश्रुत का अनुवाद किया था। रजस् (Rhazas) नाम का उसका वैद्य चरक का बहुत सम्मान करता था। सिरसीन नामक पाश्चात्य विद्वान् के पू⁴र्वज भी भारतीय आयुर्वेद तथा चरक सुश्रुत को जानते थे ऐसा पुरावृत्त के लेखकों से मालूम पड़ता है। अशोक राजा के पोते (सम्प्रति) के समय बौद्ध धर्म के साथ भारतीय आयुर्वेद भी सिंहल द्वीप में पहुंचा था। भारतीय आयुर्वेद विशेषकर बहुत सी टीकाओं से युक्त वाग्भट तिब्बत में अपना प्रकाश फैलाकर वहां से मंगोल तक पहुंच गया। भारत में विलुप्त बहुत सी वाग्भट की टीकाएँ आज भी तिब्बत में अनूदित हुई मिलती हैं।

भेडसंहिता—आज कल भेडसंहिता नाम की पद्यमय तथा संक्षिप्त लेख वाली एक अन्य संहिता भी कलकत्ता से प्रकाशित हुई है ? आर्ष छाया के अनुरूप रचना होने से वह भी प्राचीन तथा आर्ष प्रतीत होती है। परन्तु उपक्रम (प्रारम्भ)


१. H. H. wilson
२. Pr. Sachu.
३. Hindu Superiority by Har Bilas Sarada.
४. किताबे अलफेरिस्त एण्टिक्विटी ऑफ हिन्दू मैडिसिन।

१८८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

उपसंहार (समाप्ति) तथा बीच-बीच में भी इसमें बहुत से त्रुटित अंश एवं अशुद्धियां हैं। आजकल एक हजार वर्ष पूर्व की ताडपत्रों पर लिखी हुई ज्वरसमुच्चय नामक पुस्तक मिली है जिसमें आश्विन, भरद्वाज आदियों की तरह भेड के भी केवल ज्वरप्रकरण के बहुत से वचन उद्धृत किये गये हैं। उनमें से उपलब्ध मुद्रित भेडसंहिता में केवल दो तीन श्लोक ही मिलते हैं। उसके अन्य श्लोक इसमें नहीं मिलते हैं। इस प्राचीन पुस्तक में इतने श्लोकों के भी मिलने से यह संहिता प्राचीन नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। परन्तु उसी ज्वरप्रकरण में भेड नाम से उद्धृत अन्य श्लोक, तन्त्रसार नामक अन्य संग्रह ग्रन्थ में भेडसंहिता नाम से दिये हुए अन्य प्रकरण के श्लोक तथा इसी प्रकार टीकाकारों द्वारा स्थान-स्थान पर भेड नाम से उद्धृत १ श्लोक भी इस मुद्रित भेडसंहिता में प्रायः नहीं मिलते है। इस वृद्धजीवकीय तन्त्र (काश्यपसंहिता) में बस्तिकर्म के समय का निर्देश करते हुए 'षड्वर्षप्रभृतीनां तु भेड' द्वारा भेड के मत में ६ वर्ष के बाद बस्तिकर्म का विधान बताया है। परन्तु उपलब्ध भेडसंहिता में 'बालानाामथवृद्धानां युवमध्यमयोस्तथा। स्वस्थानामातुराणां च बस्तिकर्म प्रशस्यते' द्वारा सर्वसाधारण के लिये बस्ति का विधान दिया है। यह परस्पर विरोध है। इस प्रकार भिन्न ग्रन्थों में भेड के नाम से मिलने वाले वचनों के यहां न मिलने से यह भेडसंहिता बहुत से अंशों से विच्छिन्न तथा सन्देहास्पद प्रतीत होती है। इन्हीं विच्छिन्न अंशों के न मिलने तथा चरक सुश्रुत के समान इसमें विषय निरूपण को अस्पष्टता के कारण ही वाग्भट ने भी निम्न श्लोक द्वारा भेड के विषय में कटाक्ष किया है—

ऋषिप्रणीते भक्तिश्चेन्मुक्त्वा चरकसुश्रुतौ । भेडाद्याः किं न पठ्यन्ते तस्माद् ग्राह्यं सुभाषितम् ।।
(अष्टाङ्गहृदये उ. तं. अ. ४०)

हारीतसंहिता—प्रायः इसी के अनुरूप दो तीन सौ वर्ष पूर्व लिखित हारीत संहिता भी प्रकाशित हुई आजकल मिलती है। इसमें प्राचीन आर्ष लेख की छाया न होकर केवल साधारण संग्रह मात्र होने से यह न तो प्राचीन तथा न आर्ष ही प्रतीत होती है। प्राचीन ज्वरसमुच्चय नामक पुस्तक में हारीत नाम से उद्धृत बहुत से श्लोक दिये हैं। अन्य ग्रन्थों में भी स्थान स्थान पर हारीत के वचन उद्धृत किये गये हैं। परन्तु वे वचन उपलब्ध हारीतसंहिता में न मिलने से किसी अन्य ही प्राचीन हारीतसंहिता की पूर्वस्थिति का अनुमान होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि संभवतः प्राचीन हारीतसंहिता के लोप को देखकर उस (हारीत) के नाम से स्थिर रखने के लिये पीछे होने वाले किसी विद्वान ने हारीत के नाम से इस ग्रन्थ की रचना की हो ?।

नवोपलब्ध काश्यपसंहिता—अत्यन्त प्राचीन काल से प्रसिद्ध चरक सुश्रुत संहिताएँ तथ अभी (वर्तमान समय में) मिली हुई भेडसंहिता की अपेक्षा उपलब्धि (प्राप्ति) की दृष्टि से चौथे नम्बर पर होती हुई भी प्राचीन आर्ष लेख, विषय की गम्भीरता तथा सारयुक्त होने की दृष्टि से चरक तथा सुश्रुत की समकक्ष कौमारभृत्य विषय की यह प्राचीन काश्यपसंहिता प्रतिकूल दैव के कारण बहुत समय तक विलुप्त रहकर फिर सौभाग्य से कहीं दबी हुई जीर्णशीर्ण अवस्था में प्राचीन ताडपत्र की पुस्तक के रूप में प्राण शेष तथा स्थान-स्थान पर खण्डित अंशों से युक्त वृद्धजीवकीय तन्त्र रूप में अब मिली है। करालकाल के द्वारा इसके अवयवों के खण्डित हो जाने पर शेष अवयवों द्वारा भी अपने विषय की गम्भीरता को प्रकट करती हुई तथा नाम से भी लुप्त हुई इस प्राचीन आर्ष संहिता का मिलना भी विद्वानों के लिये सन्तोष का ही विषय है।

पहले किसी समय नेपाल देश में आकर विद्वद्वर महामहोपाध्याय श्रीयुत पण्डित हरप्रसाद शास्त्री ने निम्न विवरणसहित काश्यपसंहिता का उपलब्धि वृत्तान्त Report on the Search of Sanskrit Manuscripts (1895 to-1900) नामक पत्र में प्रकाशित किया था तथा उस विवरण को जूलियस जौली नामक विद्वान् ने मैडिसन की पुस्तक में भी दिया है—'नेपाल में मुझे काश्यप भार्गवसंवाद रूप वैद्यक विषय की ३८ पृष्ठों की अपूर्ण प्राचीन काश्यपसंहिता मिली है जिसके प्रारम्भ में भेषज्योपक्रमणीय में आठवें पृष्ठ से ज्वर निदान दिया हुआ है। इसमें चरक,

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

१८९

सुश्रुत, कश्यप, आश्विन, आत्रेय, भेड, पराशर, हारीत तथा जतूकर्ण आदियों के वचन भी दिये हुए हैं। भैषज्योपक्रमणीय नाम होने पर भी इसमें ओषधियों का उल्लेख नहीं है'। इस विवरण के अनुरूप पुस्तक नेपाल राजकीय पुस्तकालय के उन्हीं द्वारा तैयार करके प्रकाशित किये हुए पुस्तकों के सूचीपत्र (Index) में भी नहीं दी हुई है। उससे बाहर भी यत्नपूर्वक ढूंढने पर ऐसी काश्यपसंहिता नहीं मिली है। परन्तु ज्वरनिदान आदि के विषय में नाना ऋषियों के वचनों का संग्रहस्वरूप प्राचीन ताडपत्रीय ज्वरसमुच्चय नाम का वैद्यक ग्रन्थ नेपाल में अन्यत्र भी मिलता है तथा मेरे पास भी है, जिसमें ज्वर के विषय में बहुत से काश्यप, चरक, सुश्रुत, आश्विन, भेड आदि के वचन दिये हुए है। काश्यपसंहिता के खिल भाग में आये हुए 'शृणु भार्गव तत्त्वार्थं सन्निपातविशेषणम्' आदि वचनों के मिलने से इसमें भार्गव तथा कश्यप का संवाद प्रकट होता है। उसके विवरण में आदि (प्रारम्भ) में भैषज्योपक्रमणीय के उल्लेख होने से, परन्तु ज्वरसमुच्चय में इसके अभाव होने से, काश्यपसंहिता के खिलभाग के तृतीय अध्याय का नाम भैषज्योपक्रमणीय होने से संभवतः प्रारम्भ के आठ पृष्ठों में काश्यपसंहिता के खिलभागान्तर्गत भैषज्योपक्रमणीय अध्याय भी उसमें जोड़ दिया गया हो। इस प्रकाशित काश्यपसंहिता में चरक, सुश्रुत आदियों के वचन नहीं दिये हैं। इस प्राचीन पुस्तक में अर्वाचीन चरक आदि के नामों का उल्लेख होना भी नहीं चाहिये। इसमें ज्वर प्रकरण तथा ओषधियों का विषय भी नहीं है। इस प्रकार उनकी दृष्टि में आया हुआ वह ग्रन्थ सर्वांश रूप से यह काश्यपसंहिता नहीं हो सकती अपितु इस संहिता के भैषज्योपक्रमणीय अध्याय के कुछ पृष्ठों को मिलाकर उक्त विवरण वाला ज्वरसमुच्चय अथवा इसी प्रकार का कोई प्राचीन संग्रहात्मक अन्य ग्रन्थ होगा।

इस उपलब्ध ताडपत्र पुस्तक की आकृति २१-१/२×२-१/४ है। प्रत्येक पृष्ठ में ६ पंक्तियां है। सबसे प्रारम्भ का पृष्ठ २९ और अन्तिम पृष्ठ २६४ है। तथा बीच-बीच में भी बहुत से पृष्ठ विलप्त हैं। इस उपलब्ध पुस्तक के आदि, अन्त तथा मध्य के भी स्थान-स्थान पर खण्डित होने के कारण बहुत प्रयत्न करने पर भी खण्डित पृष्ठ तथा प्रतीकों की प्राप्ति नहीं हो सकी है। लुप्त पत्रों का संकेत मुद्रित पुस्तक के प्रथम पृष्ठ की पादटिप्पणी (Foot note) में कर दिया गया है। ग्रन्थ के आदि के १०-१२ अध्याय खण्डित हैं तथा अन्त में भी खिल भाग के ८० में से केवल २५ अध्याय तक ही होने से उसके बाद का भाग भी खण्डित है। शेष बचे हुए पृष्ठों में से भी बहुत से अंश पूरे नहीं हैं इसलिये स्थान-स्थान पर विलुप्त पंक्ति, शब्द तथा अक्षर आदि को प्रकाशित करते हुए बिन्दुमाला द्वारा दिखाया गया है। इसकी लिपि प्राचीन होने पर भी बहुत से स्थानों पर लेखभेद होने से एक ही समय में दो लेखकों ने मिलकर खण्डरूप में इस मूल पुस्तकी पूर्ति की होगी, ऐसा प्रतीत होता है। इस पुस्तक के उपक्रम तथा उपसंहार के लुप्त होने के कारण उसके द्वारा ज्ञातव्य विषयों का कुछ भी ज्ञान नहीं हो सकता। अन्तिम भाग के न मिलने से उसके लेख के समय के विषय में भी कुछ नहीं मिलता। परन्तु फिर भी इसकी लिपि की आकृति, अक्षरों द्वारा निर्दिष्ट पृष्ठों के अङ्क (संख्या), कहीं-कहीं अध्याय और श्लोकों की संख्या तथा ताडपत्र की लम्बाई और चौड़ाई को देखकर यह अनुमान किया जा सकता है कि इस पुस्तक का लेख सात आठ सौ वर्ष पूर्व का है। परन्तु इस आदर्श पुस्तक में भी अक्षरों के लुप्त होने से तथा कहीं-कहीं बिना अक्षरों के अधूरे ही स्थलों के मिलने से यह आदर्श मूल पुस्तक भी इस प्रकार की जराजीर्ण तथा प्राचीन प्रतीत होती है। पुस्तक की आकृति के ज्ञान के लिये मूल पुस्तक के दो पृष्ठों की प्रतिच्छाया (Reproduction) भी साथ में दे दी गई है।

कश्यप सम्बन्धी विमर्श—प्राचीन वैद्यक ग्रन्थों में से हमारे सामने सुश्रुत संहिता, चरक संहिता, तथा नवोपलब्ध काश्यपसंहिता, ये जो तीन महान आर्ष ग्रन्थ हैं। उसमें सुश्रुतसंहिता में धन्वन्तरि तथा चरक संहिता में पुनर्वसु आत्रेय की तरह काश्यपसंहिता में कश्यप मूल उपदेशक हैं। इस ग्रन्थ के उपक्रम तथा उपसंहार भाग के खण्डित होने के कारण इस कश्यप का विशेष परिचय न मिलने पर भी संहिता के कल्पस्थान के संहिताकल्प नामक अध्याय में ही निम्न विवरण मिलता है—

१९० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

'दक्षयज्ञे वधत्रासाद् ...... निखिलेन ते' (श्लो. १४-२८)

अर्थात् दक्ष के यज्ञ में उत्पन्न हुई अव्यवस्था से उत्पन्न प्राचीन नाना रोगों से पीड़ित प्राणियों के उद्धार की दृष्टि से पितामह ब्रह्मा की सहायता तथा तपोबल से महर्षि कश्यप ने इस महान् तन्त्र का निर्माण करके ऋषियों को उपदेश दिया। सर्वप्रथम इस विस्तृत तन्त्र को ग्रहण करके ऋचीक के पुत्र जीवक नाम वाले एक बालमुनि ने इसका संक्षिप्त रचना के रूप में परिणत कर दिया। परन्तु बालजल्पित (बालक का वचन) कहकर जब अन्य ऋषियों ने इसे स्वीकार नहीं किया तब उसी समय सब ऋषियों के देखते-देखते कनखल स्थित गङ्गा के कुण्ड में डुबकी लगाकर क्षण भर में वलिपलितयुक्त (झुर्रियों तथा सफेद बालों से युक्त) वृद्ध रूप में परिणत हो गया। इस चमत्कार के कारण विस्मित हुए मुनियों ने वृद्ध आकृति वाले उस बालक का वृद्धजीवक नाम रखकर तथा उसे उत्तम वैद्य मानकर उसके तन्त्र को स्वीकार कर लिया। उसके बाद लुप्त हुए इस तन्त्र को भाग्यवश अनायास नामक किसी यक्ष ने प्राप्त करके लोककल्याण के लिये इसकी रक्षा की। इसके बाद वृद्धजीवक के ही वंश में उत्पन्न हुए वेद वेदाङ्ग के ज्ञाता, तथा शिवकश्यप के भक्त वात्स्य नामक विद्वान् ने अनायास को प्रसन्न करके उससे इस तन्त्र को प्राप्त करके कीर्ति, धर्म तथा लोककल्याण के लिये अपनी बुद्धि तथा श्रम से उसका प्रतिसंस्कार करके उसे प्रकाशित किया। तथा इसके आठ स्थानों में न आये विषयों को खिलस्थान के रूप में इसमें जोड़ दिया। इस प्रकार का इसका वृत्तान्त मिलता है।

वैदिक समय में भी मन्त्र ब्राह्मण आदियों में कश्यप और काश्यप नाम वाले अनेक महर्षियों तथा अन्य ग्रन्थों में भी इस नाम के अनेक विद्वानों का उल्लेख मिलता है। इनमें से कौनसा कश्यप इस कौमारभृत्य संहिता का मूल आचार्य है जिसके उपदेश को वृद्धजीवक ने ग्रहण किया यह विचारणीय विषय है। अत्रि, कश्यप आदि के गोत्रप्रवर्तक मूल आचार्य के रूप में मिलने से कश्यप शब्द से मूल कश्यप तथा काश्यप शब्द से कश्यप गोत्र में होनेवाले व्यक्ति का सामान्य रूप से बोध होता है। गोत्र प्रवरों (पुरोहित का गोत्र) के निर्देश करने वाले आचार्यों के लेख के अनुसन्धान में बोधायन (धर्मसूत्रकार-समय लगभग ४ थी शती ई. पू.) ने मूलगोत्र के प्रवर्तक केवल एक आचार्य में कश्यप तथा अन्यों के लिये काश्यप शब्द का व्यवहार उचित होने पर भी 'कश्यपान् व्याख्यास्यामः' द्वारा प्रारम्भ करके उस गोत्र वाले तथा अन्य गोत्र प्रवर्तकों का विभाग पूर्वक निर्देश करके अन्त में 'इत्येते निध्रुवाः कश्यपाः' द्वारा समाप्त करके काश्यप गोत्र वाले तथा अन्य गोत्र के पर्वतों का काश्यप शब्द से व्यवहार उचित होने पर भी कश्यप शब्द से ही व्यवहार किया गया है। आपस्तम्ब¹ आश्वालायन तथा कात्यायन आदि में भी इसी प्रकार के उल्लेख मिलते हैं। बहुत व्यक्तियों के निर्देश होने पर गोत्र² प्रत्यय का लोप होकर 'कश्यपाः' यह व्यवहार सम्भव होने पर भी शतपथ³ ब्राह्मण में 'हरितः कश्यपः', 'शिल्पः कश्यपः', 'नैध्रुविः कश्यपः' इत्यादि द्वारा हरित आदि परम्पर विभिन्न एक-एक व्यक्ति का भी कश्यप शब्द से निर्देश किया है। इस प्रकार प्राचीन काल में कश्यपगोत्र वाले व्यक्तियों का काश्यप शब्द के समान व्यक्तिविशेष के लिये कश्यप शब्द का व्यवहार भी प्रायः देखा गया है। इस प्रकार बोधायन आदि के लेख से मूल कश्यप के समान उस परम्परा वाले अन्य कश्यप के लिये भी कश्यप शब्द आता है। परन्तु कश्यप के सम्प्रदाय में बोधायन आदि द्वारा अन्य मारीच के निर्देश न होने से तथा अन्यत्र वैदिक संहिताओं में कश्यप का मरीचि के पुत्ररूप में मिलने से यह कहा जा सकता


१. अथ कश्यपानां त्र्यार्षेयः काश्यपावत्सारनैध्रुवेति। (आपस्तम्बप्रवरकाण्डे)
कश्यपानां काश्यपावत्सारासितेति। (आश्वलायनप्रवरकाण्डे)
कश्यपान् व्याख्यास्यामः। (कात्यायनलौगाक्षिप्रवरकाण्डे)
२. अनृष्यानन्तर्ये विदादिभ्योऽञ् ४/१/१०४ यञञोश्च २/४/९४ (पाणिनिसूत्रे)
३. हरितात् कश्यपाद्धरितः कश्यपः शिल्पात् कश्यपाच्छिल्पः कश्यपः कश्यपान्नैध्रुवेः कश्यपो नैध्रुविः। (शतपथवंशब्राह्मणे)

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद१९१

है कि बोधायन आदि के लेख के अनुसार मूल कश्यप ही मरीचि का पुत्र होने से मारीच है। ¹मत्स्य पुराण के गोत्रप्रवरों के वर्णन में मरीचि के पुत्र कश्यप का मूलगोत्र प्रवर्त्तक के रूप में निर्देश करके उसकी सन्तति में अवान्तरगोत्रों के प्रवर्त्तक की दृष्टि से मरीच के पुत्र कश्यपों का पुनः निर्देश किया है। गोत्र प्रवरों के विषय का संग्रहकर्त्ता ²कमलाकर (१७ शताब्दी) भी मात्स्योक्त कश्यपों का उल्लेख करता हुआ 'अथ कश्यपाः' द्वारा कश्यप परम्परागत अन्य गोत्रप्रवर्तक एक मारीच (मरीच के पुत्र) ऋषि का एकवचनान्त शब्द द्वारा निर्देश करता है। कश्यप परम्परागत होने से इस मारीच का भी कश्यप होना संगत है। इस प्रकार कश्यप परम्परागत एक दूसरा भी मारीच कश्यप हुआ है-ऐसा ज्ञात होता है। ³चरक के प्रारम्भ में एकत्रित महर्षियों का वर्णन करते हुए पहले कश्यप का पृथक् निर्देश करके फिर 'मारीचिकश्यपौ' इस द्विवचनान्त पद द्वारा मारीचि तथा काश्यप का पृथक् निर्देश मिलता है। इस प्रकार कश्यप, काश्यप तथा मारीचि तीन भिन्न-भिन्न व्यक्ति प्रतीत होते हैं।

इस काश्यपसंहिता में प्रत्येक अध्याय के प्रारम्भ तथा अन्त में 'इति ह स्माह कश्यपः' तथा कहीं-कहीं बीच में भी 'इत्याह कश्यपः' 'इति कश्यपः' 'कश्यपोऽब्रवीत्' इत्यादि द्वारा बहुत से स्थानों पर कश्यप⁴ शब्द से आचार्य का उल्लेख किया है। कहीं-कहीं ⁵मारीच शब्द द्वारा भी निर्देश किया है। पूर्वापर वाक्यों को देखते हुए कश्यप ही मारीच तथा मारीच ही कश्यपरूप से दिखाई देने से इस ग्रन्थ का आचार्य मारीच कश्यप मालूम होता है। तथा सर्वत्र एक वचनान्त मारीच तथा कश्यप शब्द द्वारा व्यवहृत होने से स्पष्टरूप से वह एक व्यक्ति प्रतीत होता है। आत्रेयसंहिता के वातकलाकलीय अध्याय में भगवान् आत्रेय के द्वारा वार्योविद के साथ संवाद करते हुए मारीचि का वर्णन करने से मारीच तथा वार्योविद की समकक्षता प्रतीत होती है। इस काश्यपसंहिता के निम्न प्रसङ्ग द्वारा भी इस संहिता के आचार्य मारीच का वार्योविद का समकालीन होना प्रकट होता है—

इति वार्योविदायेदं महीपाय महानृषिः। शशंस सर्वमखिलं बालानामथ भेषजम्।।

अर्थात् वार्योविद नामक राजा के लिये ऋषि कश्यप ने बालकों की सम्पूर्ण औषधियों का उपदेश किया।

आत्रेय संहिता में पीछे शारीर निर्वृत्ति (शरीर के अङ्गों के गर्भ में प्रकट होने) के विषय में विचार करते हुए 'विप्रतिपत्तिवादास्त्वत्र बहुविधाः सूत्रकारिणामृषीणां सन्ति' (अर्थात् शास्त्रकर्ता ऋषियों के बहुत से एक दूसरे से विरुद्ध वाद हैं-भिन्न-भिन्न मत हैं) इत्यादि वाक्य द्वारा पूर्व आचार्यों के मतों का निर्देश करते हुए 'कश्यपः 'सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिः' इस विशेष पाठ द्वारा आत्रेय ने कश्यप के सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिवाद (सब अङ्गों का साथ-साथ उत्पन्न होना) को चरमपक्ष के रूप में दिया है। इस काश्यपसंहिता में भी निम्न श्लोक द्वारा अपने आचार्य मारीच कश्यप का सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिवाद मिलता है—


१. १ से ५ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २१-२२ देखें।
२. मुद्रित चरक पुस्तक में विप्रतिपत्तिवाद के वर्णन में 'परोक्षत्वादचिन्त्यमिति मारीचिः कश्यपः, युगपत्सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिरिति धन्वन्तरिः' इस पाठ के मिलने से तथा सुश्रुतसंहिता में भी धन्वन्तरि के इसी सिद्धान्त के मिलने से सर्वाङ्गिनिर्वृत्ति वाद धन्वन्तरि का तथा अचिन्त्यवाद कश्यप का प्रतीत होता है। संभव है इस विषय में धन्वन्तरि का भी यही सिद्धान्त हो किन्तु एक हस्तलिखित चरक की पुस्तक में 'कश्यपः सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिः' द्वारा कश्यप का सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिवाद का पाठ मिलता है। श्रीयुत गिरीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय ने भी काश्यप के निरूपण में अपनी पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ इण्डियन मेडिसिन” भाग प्रथम पृष्ठ १७९ पर यही पाठ दिया है। वार्योविद के सहभावी मारीच कश्यप के इस संहिता के आचार्य होने से और आत्रेय संहिता में आया हुआ कश्यप भी वही होने से इस काश्यपसंहिता में आये हुए 'सर्वेन्द्रियाणि गर्भस्य' इत्यादि वाक्य द्वारा सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिवाद के सिद्धान्तरूप से दिये होने से तथा उसमें अचिन्त्यवाद के न मिलने से विरुद्ध सिद्धान्तों के अभाव के औचित्य की दृष्टि से कश्यप के सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिवाद वाला पाठ की उचित प्रतीत होता है। संभवतः इसमें पूर्वापर पदों के पाठ में उलटफेर हो गया है।

१९२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

सर्वेन्द्रियाणि गर्भस्य सर्वाङ्गावयवास्तथा। तृतीये मासि युगपन्निर्वर्त्तन्ते यथाक्रमम्।।

इसी प्रकार आत्रेयसंहिता में आत्रेय द्वारा वर्णित मारीच और कश्यप को एक ही मानने से आत्रेय पुनर्वसु द्वारा भी सम्मानपूर्वक निर्देश किये हुए आयुर्वेद के आचार्य राजर्षि वायोर्विद का समकालीन मारीच कश्यप ही इस संहिता का उपदेष्टा प्रतीत होता है। इस संहिता तथा बोधायन आदिके लेख में मारीच शब्द व्यवहृत किया गया है। मरीचि शब्द से अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय करके मारीच शब्द बनता है। आत्रेय संहिता में ‘धौम्यो मारीचिकाश्यपौ, मारीचिरुवाच, मारीचिः कश्यपः’ इत्यादि इकारान्त पाठों के मिलने पर भी मरीचि शब्द के बहादिगण में पाठ होने से तथा वायोर्विद के समकालीन होने से इञ् प्रत्यय होकर मारिचि शब्द भी मारीच शब्द का पर्याय ही है। अत इञ् (४/१/९५) सूत्र द्वारा मारीच शब्द से मारिचि शब्द बनने पर भी मारीच तथा मारिचि के साथ वायोर्विद का साहचर्य संभव है।

इस प्रकार पूर्वोक्तानुसार मारीच तथा कश्यप इन दोनों नामों का व्यवहार संभव होने से इस संहिता के शिष्योपक्रमणीयाध्याय में इन्द्र द्वारा विद्या प्राप्त किये हुए कश्यप, अत्रि आदि के शिष्य तथा पुत्रों द्वारा इस विद्या के प्रचार के उल्लेख से बोधायन आदि में कहा हुआ मरीचि पुत्र मूलकश्यप इस संहिता का आचार्य हो सकता है। तथा सतयुग और त्रेतायुग के बीच में उत्पन्न हुए रोगों से प्राणियों के कष्टों को दूर करने के लिये कश्यप ने इस संहिता का निर्माण किया जिसका वृद्ध जीवकतन्त्र नामक संक्षिप्तरूप कलियुग में विलुप्त होकर पुनः वात्स्य द्वारा प्राप्त करने संस्कार किया गया—संहिता कल्पाध्याय के इस लेख के अनुसार तथा आत्रेय के लेख में कांकायन आदि के समकालीन मारीचिकश्यप के मिलने से मात्स्योक्त कश्यप परम्परा वाले द्वितीय मारीच का भी इस संहिता का आचार्य होना संभव है। इस विषय में निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। मात्स्योक्त द्वितीय मारीच कश्यप को यद्यपि निश्चय पूर्वक मूल कश्यप परम्परा वाला नहीं कहा जा सकता तो भी अवान्तर गोत्र वाला होने पर भी मन्त्रद्रष्टाओं के प्रवर्त्तक का ही उल्लेख होने से वह भी प्राचीन ही होना चाहिये। संहितातल्पाध्याय में कलियुग में लुप्त हुए वृद्धजीवकतन्त्र का यक्ष से प्राप्त करके वात्स्य द्वारा उसका संस्कार किये जाने के उल्लेख मिलने से वृद्धजीवकतन्त्र की भी मूलभूत काश्यपसंहिता का समय उससे भी प्राचीन होने से संहिताकार कश्यप का समय प्राचीन ही सिद्ध होता है। पाणिनि के मत में विदादिगणमें प्रविष्ट हुए कश्यप शब्द से बहुत्व अर्थ में ही गोत्र प्रत्यय के लुक् (लोप) का विधान है परन्तु वंशब्राह्मण आदि में उससे विपरीत एक व्यक्ति के लिये भी कश्यप शब्द का व्यवहार मिलने से यहां काश्यप के लिये आया हुआ कश्यपशब्द पाणिनि से भी प्राचीन प्रयोग को सूचित करता है।

इस काश्यपसंहिता में धन्वन्तरि का मत दिया होने से परन्तु उसके अनुयायी दिवोदास तथा सुश्रुत के नाम न होने से तथा ¹महाभारत में गुरुदक्षिणा में दिये जाने वाले घोड़ों की प्राप्ति के लिये काशीपति दिवोदास के पास पहुंचने वाले गालव ऋषि को हिमालय की तलहटीमें वायव्य (पश्चिमोत्तर) दिशा में मारीचि कश्यप के आश्रम का निर्देश होने से यह मारीचि कश्यप धन्वन्तरि के बाद परन्तु उसकी चतुर्थ सन्तति दिवोदास के कुछ समय पूर्व या उसके समकालीन हिमालय की तलहटी में आश्रम बनाकर रहता था—ऐसा प्रतीत होता है। इससे इस संहिता में आये हुए आचार्य की ²गङ्गाद्वारनिवासित्व की संगति भी ठीक बैठती है।

अवान्तर गोत्र प्रवर्त्तक मारीच कश्यप को भी यदि इस संहिता का आचार्य माना जाय तो चरक के उपक्रममें मारीचि तथा कश्यप से भिन्न प्राचीन कश्यप के मिलने से तथा इस संहिता में भी इन्द्र के शिष्य कश्यप द्वारा अपनी सन्तति में आयुर्वेद विद्या के प्रचार के उल्लेख होने से अत्रि, भृगु आदि के साहचर्य से मूलकश्यप से ही यह विद्या मारीच कश्यप में गई प्रतीत होती है। इस प्रकार परम्परागत मारीच ने इस संहिता का निर्माण किया प्रतीत होता है। इसीलिये वमनविरेचनीयाध्याय में वृद्ध काश्यप का मत देकर ‘अथ कश्यपोऽब्रवीत्’ द्वारा जो अपना मत दिया है वह बाद में होने


१. १-२ तक की टिप्पणी उपो. संस्कृत पृ. २३ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १९३

वाले मारीच कश्यप के लिये ही संभव है न कि मूलकश्यप के लिये। अन्य आचार्यों के मतों को देकर अन्त में नामोल्लेख सहित अपने मत के प्रतिपादन करने की प्राचीन शैली कौटलीय अर्थशास्त्र तथा आत्रेयसंहिता में भी दिखाई देती है। 'इति ह स्माह कश्यपः' इस वाक्य द्वारा प्रारंभ किये हुए अध्याय के बीच में भी अन्य आचार्यों के मतों के बिना भी कहीं-कहीं जो 'इति कश्यपः' 'इत्याह कश्यपः' आदि वाक्य आये हुए हैं वे नये एवं विशेष अर्थ को सूचित करने की दृष्टि से भी संभवतः ग्रन्थकार ने अपने नामसहित दिये हों, परन्तु मारीच कश्यप की संहिता में 'कश्यपाय स्वाहा' इस प्रकार जो स्वाहाकार देवता के रूप में कश्यप का उल्लेख मिलना है वह प्राचीन कश्यप का ही नाम होना चाहिये इसीलिये मूलकश्यप परम्परा द्वारा ही उसकी सन्तति में इस विद्या के प्रवृत्त होने से पूर्वाचार्य कश्यप के उपदेश को जताने के लिये उसका नाम लेना संभव है।

अस्तु यह कश्यप चाहे मूल व्यक्ति हो और चाहे परम्परागत व्यक्ति हो केवल इतने से ही उसे अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता। वैदिक साहित्य में भी मन्त्रद्रष्टा के रूप में इसका उल्लेख है। कात्यायन के ऋक् सर्वानुक्रम सूत्र में कश्यप तथा काश्यपों द्वारा दृष्ट बहुत से सूक्तों में से जातवेद के प्रारंभ के एक ^१हजार सूक्त कश्यप ऋषि प्रणीत बताये गये हैं। उसकी व्याख्या करत हुआ ^२षड्गुरुशिष्य 'अयं मरीचिपुत्रः कश्यपः' ऐसा परिचय देता है। ^३बृहद्देवता में भी इन एक हजार सूक्तों का द्रष्टा कश्यप को ही बताया है। सायनाचार्य ने भी जातवेदस के मन्त्रों में मारीचि कश्यप ऋषि का निर्देश किया है। बभ्रूसूक्त^४ में तो सूत्रकार ने भी स्वयं मारीच कश्यप को ऋषिरूप से स्वीकार किया है। आथर्वण सर्वानुक्रम सूत्र में भी 'पृतनां जितम्' इत्यादि जातवेदस् सूक्त के द्रष्टा मारीचि काश्यप (मारीच, कश्यप) का उल्लेख है।

ऋग्वेद के नवम मण्डल तथा अन्यत्र भी काश्यपावत्सार, काश्यप निध्रुवि तथा मारीच कश्यप द्वारा दृष्ट अनेक सूक्त हैं। जिनका सायन ने भी उसीरूप में विवरण दिया है। उनमें दिव्य ओषधि सोम की अनेक प्रकार से स्तुति की गई है। जातवेदस् के मन्त्र में अग्नि की स्तुति करते हुए भी सोम का विषय आया हुआ है। जातवेदस् के प्रारंभ के एक हजार सूक्त कश्यप ऋषि प्रणीत हैं, ऐसा सर्वानुक्रम सूत्रकार आदि निर्देश करते हैं। उपलब्ध ऋग्वेद में मारीच कश्यप ऋषि द्वारा प्रणीत ये एक हजार सूक्त नहीं मिलते हैं। जातवेदस् में एक ऋचा वाला केवल यही एक सूक्त मिलता है। ^६सर्वानुक्रम सूत्र, ^७बृहद्देवता तथा षड्गुरुशिष्य द्वारा उद्धृत शौनक शाकपूणि आदि के निर्देश में 'जातवेद' तथा 'सयोवृषा' आदि सूक्तों के बीच के ९९९ सूक्तों की विद्यमानता प्रकट होने से यह स्पष्ट है कि इनका लोप हो चुका है। खिलरूप से विद्यमान ये सूक्त वेदों से लुप्त हो चुके हैं ऐसा षड्गुरुशिष्य ने स्पष्ट कहा है। इन विलुप्त मन्त्रों का अनुसन्धान करते हुए सर्वानुक्रम के टीकाकार ^८षड्गुरुशिष्य ने प्रारंभ में एकर्च, तृच, द्यूतृच आदि सहस्रर्च पर्यन्त^९ सूक्तों का निर्देश करके उनकी गिनती करते हुए गणित के अनुसार पांच^१० लाख चार सौ निन्यानबे ऋचाओं के लुप्त होने का संकेत किया है परन्तु ऋग्वेद में एक-एक मन्त्र को बढ़ाकर-सूक्तों में मन्त्रों के विन्यास की रीति कहीं दिखाई नहीं देती है। परन्तु सूत्र तथा बृहद्देवता में इन हजार सूक्तों में एक ऋचा वाले सूक्तों के बाहुल्य का निर्देश है, इस प्रकार उक्त संख्या पूरी नहीं होती। उक्त संख्या के निर्देश की सङ्गति हो, चाहे न हो परन्तु इतना तो स्पष्ट ही है कि इन एक हजार सूक्तों के एकर्च बाहुल्य निर्देश होने से एकर्च (एक ऋचा वाले) सूक्तों के अधिक संख्या में होने पर भी अन्य बह्वृच (बहुत ऋचाओं वाले) सूक्तों का प्रवेश संभव होने से इसमें हजारों मन्त्र थे। कश्यप तथा काश्यप के नाम से उपलब्ध सूक्तों में दिव्यौषधि सोम की स्तुति का वर्णन मिलने से संभवतः अन्य विलुप्त हजारों मन्त्रों में भी प्रायः ओषधियों का ही वर्णन प्रतीत होता है। कश्यप के आयुर्वेद विद्या का आचार्य होने से तथा काश्यपसंहिता में उसकी परम्परा में उस विद्या की अनुवृत्ति होने का तथा महान् आकृति वाली कश्यपसंहिता का पीछे वृद्धजीवक द्वारा संक्षेप किये जाने के उल्लेख होने से संभवतः ये विलुप्त एक हजार सूक्त ही काश्यपसंहितारूप में प्रकट हुए थे। आयुर्वेद के विषयों का प्रतिपादन करता


१. १ से १० तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २४ देखें।

१९४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकियं तन्त्रम्

हुआ वह भाग कश्यप ने ऋग्वेद में खिलरूप से प्रविष्ट किया हो फिर कालक्रम से च्युत होकर पीछे संभवतः विलुप्त भी हो गया हो । आगे निर्दिष्ट काश्यपसंहिता नाम से मिलने वाली एक अन्य संहिता में निम्न श्लोक दिया है—

ऋग्वेदस्योपवेदाङ्गं काश्यपं रचितं सुरा । लक्षग्रन्थं महातेजः अमेयं मम दीयताम् ।।

उपर्युक्त श्लोक द्वारा वर्णित ऋग्वेद के उपवेद रूप तथा लक्षग्रन्थात्मक यह काश्यपदर्शन भी संभवतः उसी विलुप्त काश्यप संहितारूप एक हजार सूक्तों की ओर लक्ष्य करता है । यह भी संभव हो सकता है कि खिलरूप में अवस्थित स्वदृष्ट सहस्र तथा इसी प्रकार के अन्य परदृष्ट सूक्तों की संहिता बनाकर कश्यपाचार्य ने शिष्योपक्रमणीय अध्याय में आयुर्वेद को पंचम वेद माना है उसी खिलरूप में अवस्थित आयुर्वेद विषय का ज्ञान कराने वाली कश्यप की महासंहिता को ही वृद्धजीवक ने संक्षिप्त करके तन्तरूप से उपस्थित किया प्रतीत होता है । अस्तु, कुछ भी हो इतना तो स्पष्ट है कि यह उप, लभ्यमान काश्यपसंहिता वेदरूपी मूल महावृक्ष का ही संक्षिप्त रूप है ।

इस प्रकार इस संहिता के कल्पाध्याय के लेख¹ से तथा ग्रन्थ के बीच-बीच में आये हुए पदविशेषों से स्पष्ट है कि इस संहिता का आचार्य कश्यप नाम वाला, आहिताग्नि (जिसने अग्नि का आधान किया हुआ है), वेद-वेदान्तों का पारदृष्टा प्रजापतिस्थानीय तथा गङ्गाद्वार निवासी मारीच कश्यप ही है । चरक संहिता के मूल आचार्य आत्रेय का जैसे पुनर्वसु विशेषण है वैसे ही इस संहिता के आचार्य कश्यप का भी मारीच विशेषण है ।

कौमारभृत्य विषयक इस संहिता के लेख से भी मारीच कश्यप तथा वृद्धकाश्यप दो भिन्न-भिन्न आचार्य प्रतीत होते हैं । जिससे मारीच कश्यप के उपदेशस्वरूप इस संहिता के वमनविरेचनीय प्रकरण में दूसरे आचार्यों के मतों में पहले वृद्धकाश्यप के मत का निर्देश करके अन्त में 'अथ कश्यपोऽब्रवीत्' द्वारा अपने (कश्यप के) मत को स्पष्टरूप में दिया होने से मारीच कश्यप ही इस संहिता का उपदेष्टा, तथा वृद्धकाश्यप इससे भिन्न अन्य आचार्य प्रतीत होते हैं । प्रत्येक अध्याय के प्रारम्भ में जो 'इति ह स्माह कश्यपः' दिया है वह भी इसी को सूचित करता है । इस कश्यप ऋषि को भी कहीं-कहीं जो वृद्ध लिखा है वह ज्ञानवृद्ध या वयोवृद्ध की दृष्टि से लिखा है । खिलभाग में एक स्थान पर 'वृद्धकाश्यपीयायां संहितायाम्' जो लिखा है वह सम्भवतः प्रक्षिप्त है । अथवा चरकसंहिता के पिछले भाग में जिस प्रकार कृष्णात्रेय आदि के मतों का उल्लेख है उसी प्रकार वृद्धजीवक के बनाये हुए खिलभाग में वृद्धकाश्यप नामक अन्य आचार्य का उल्लेख होने से संभवतः 'वृद्धकाश्यपीयायाम्' लिखा हो ।

महाभारत के तक्षक²दंशोपाख्यान में शापग्रस्त राजा परीक्षित को काटने के लिये जाते हुए तक्षक तथा राजा के प्रतीकार के लिये आने वाले महर्षि काश्यप के परस्पर मार्ग में मिलने से उनका संवाद मिलता है । यह मारीच शब्द से रहित काश्यप ऋषि विषहर विद्या में निपुण कश्यप-परम्परागत भिन्न ही व्यक्ति प्रतीत होता है ।

डल्लन ने सुश्रुत की ³व्याख्या में काश्यप नाम से तथा माधवनिदान की मधुकोश ⁴व्याख्या में वृद्धकाश्यप नाम से दो श्लोक दिये हुए है । वे श्लोक अगदतन्त्र विषयक होने से ये काश्यप तथा वृद्धकाश्यप भी भिन्न ही अगदतन्त्र के आचार्य प्रतीत होते हैं ।

पाणिनि द्वारा 'तृषिमृषिकृषेः काश्यपस्य' (१/२/२५) तथा 'नोदात्तस्वरितोदयमगार्य्यकाश्यपगालवानाम्' (८/४/६७) इन सूत्रों में प्राचीन वैयाकरणों की गिनती में दिया काश्यप भी अन्य ही प्रस्थानान्तरीय विद्वान् प्रतीत होता है । शिल्पाचार्य के रूप में कश्यप का निर्देश तैत्तिरीय ⁵संहिता में आया हुआ है ।

काश्यपसंहिता ⁶नाम की उमा महेश्वर संवाद रूप चिकित्सा विषयक एक अन्य भी छोटी सी पुस्तक तञ्जोर के पुस्तकालय में (नं. १०७८०) है, जिसके पूर्वार्ध भाग का प्रतिलेख श्री वैद्यवर यादव जी द्वारा मुझे भी प्राप्त हुआ है ।


१. १. टि. उपो. संस्कृत पृ. २५ देखें। २ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २६ देखें ।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १९५

इस पूर्वार्धभाग में नाना वातरोग, ज्वर, ग्रहणी, अतिसार, अर्श, इनके निदान, उनको दूर करने के लिये ओषधियां तथा निदानरूप पापों को दूर करने के लिये रुद्र, शिव, विष्णु आदि की आराधना संक्षेप से दिया हुआ है। इस पूर्वार्ध के अन्त में 'बालरोगस्य' द्वारा प्रारंभ करके निम्न श्लोक दिये हुए हैं—

सर्वाङ्गं मूर्ध्नि कक्षे द्वे श्रोणी द्वे पादबाहुकम् । पिटकं दर्दुरं कण्डूं तिमिरं कृमिसंकुलम् ।। पूयं रक्तं स्रवति च वेदनं शुष्कमङ्गजम् । विदाहं शोषमत्यन्तबालकं पिच्छिपिच्छिलाम् ।। एते गुणविकाराश्च पैत्तरूपं समुद्भवम् । तत्पैत्तनाडीनाशार्थं रास्नादिलेह्यकं तथा ।। ममासं मासत्रयं नित्यं बालपैत्तविनाशकम् । अश्वगन्धिघृतं सेवेद्विडङ्गादिघृतं तथा ।। वाकुचीघृतविख्यातं बालकं पिच्छिलं हरेत् ।

इन श्लोकों के बाद 'इति पार्वतीपरमेश्वरसंवादे काश्यपसंहितायां पूर्वार्द्धं समाप्तम्' द्वारा इसे समाप्त किया गया है। इस संहिता का लेख प्रौढ़ एवं सुसंस्कृत न होने से इसे प्राचीन नहीं कहा जा सकता। उसमें बालभैषज्य का भी मुख्यरूप से वर्णन नहीं है। केवल अन्त में इस विषय के उपरिनिर्दिष्ट श्लोक दिये हैं। वृद्धजीवकीयतन्त्र के साथ इसकी विषय रचना तथा भैषज्य की दृष्टि से बिलकुल भी समानता नहीं है। यह तान्त्रिक प्रक्रियाओं से युक्त भिन्न ही संहिता प्रतीत होती है। तथा इसका उपदेशक भी कश्यप नाम वाला कोई भिन्न ही प्रतीत होता है !

मद्रास प्रदेश में मुद्रित काश्यपसंहिता¹ नाम का अगदतन्त्र विषयक एक अन्य ग्रन्थ भी मिलता है। उसमें गारुडिविद्या (सर्पविद्या), विषनाशक औषधप्रयोग, मान्त्रिकप्रयोग, विषों की भिन्न-भिन्न जातियाँ और भेद तथा दंश आदि का वर्णन है। इस संहिता का लेख डल्लन तथा मधुकोश में उद्धृत अगदतन्त्र विषयक श्लोकों से लेशमात्र भी नहीं मिलता है। इसमें वे दोनों श्लोक भी नहीं दिये हैं। इस प्रकार अगदतन्त्र के ज्ञाता किसी अन्य अर्वाचीन काश्यप का अथवा प्राचीन अगदाचार्य काश्यप के सम्प्रदाय वाले किसी अन्य का ही यह लेख प्रतीत होता है। इस कौमारभृत्य विषयक संहिता में इसकी गन्ध तथा नाम भी नहीं है।

इस प्रकार कश्यप तथा काश्यप शब्दों के भिन्न-भिन्न दिखाई देने से इन उपरिनिर्दिष्ट काश्यपों के प्राचीन होने पर भी विषय के भेद से काश्यपसंहिता नाम से मिलने वाले उपरिनिर्दिष्ट दोनों ग्रन्थों के अर्वाचीन होने से तथा इन काश्यपों के साथ मारीच शब्द का विशेषण न लगा होने से इस कौमारभृत्य संहिता आचार्य मारीचकश्यप नाम वाला भिन्न ही आचार्य प्रतीत होता है। तथा उसकी यह नवोपलब्ध प्राचीन संहिता भी भिन्न ही प्रतीत होती है। कश्यप द्वारा उपदिष्ट होने पर भी तदीयत्व (उस विषयक) बोधक प्रत्यय से समानाधिकरण समास होकर पुंवद्भाव में 'कश्यप की संहिता' इस अर्थ को दृष्टि में रखते हुए इसका काश्यपसंहिता यह नाम उचित ही है।

अष्टाङ्ग हृदय में बालकों के रोगों के प्रतिषेध विषयक अध्याय में वृद्धकश्यप² तथा कश्यप³ नाम से दो औषध योग दिये हुए हैं। वृद्धकश्यप तथा कश्यप का पृथक्-पृथक् निर्देश होने से इस काश्यपसंहिता में वृद्धकश्यपोक्त विषय के न मिलने पर भी कश्यप नाम से दिया हुआ बालकों का ग्रहहर दशाङ्ग धूप धूपप्रकरण में कुछ पाठभेद से मिलता है। कश्यप नाम से दिया हुआ बालकों के यक्ष-राक्षस आदि की बाधाओं को नष्ट करने वाला अभयघृत वाग्भट⁴ में भी दिया है। वस्तुओं तथा रक्षोघ्नत्वादि की समानता से यह वही प्रतीत होता है।

खोटाङ्ग (मध्य एशिया) नामक स्थान के भूगर्भ से बावर मैनुस्क्रिप्ट (Bower manuscript) रूप से प्रसिद्ध नावनीतक नाम का एक प्राचीन वैद्यक⁵ ग्रन्थ अभी मिला है। इस पुस्तक की भोजपत्र पर लिखित प्राचीन लिपि को देखकर


१. टि. १ से ४ उपो. संस्कृत पृ. २७ देखें।
५. यह ग्रन्थ यूरोप तथा लाहौर से भी मुद्रित हुआ है।

१९६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विद्वानों ने इसे तीसरी चौथी शताब्दी में लिखा हुआ निश्चित किया है¹। ग्रन्थ रचना तो इससे भी प्राचीन होनी चाहिये। इसमें आत्रेय, क्षार पाणि, जातूकर्ण, पराशर, भेड, हारीत, सुश्रुत, काश्यप तथा जीवक आदि के नाम भी दिये हुये हैं। इन प्राचीन आचार्यों की संहिताओं के योगों का इसमें संग्रह होने से परन्तु अष्टाङ्गहृदयोक्त एक भी योग के न होने से यह निबन्ध कश्यप, काश्यप, आत्रेय, सुश्रुत, तथा भेड आदि से पश्चात् तथा वाग्भट से पूर्व का प्रतीत होता है। इसके कौमारभृत्य विषयक १४ वें अध्याय में काश्यप तथा जीवक नाम से कुछ औषध योग दिये हैं। यहां कौमारभृत्य के प्रकरण में जीवक के साथ आया हुआ काश्यप संभवतः इस काश्यप संहिता का आचार्य ही है। स्वार्थ में अण् करके अथवा उस गोत्र के अर्थ में कश्यप का काश्यप शब्द द्वारा भी व्यवहार संभव होने के कश्यप के स्थान पर काश्यप दिया हुआ प्रतीत होता है। वहीं पर निम्न श्लोक दिये हैं जिनमें कश्यप के नाम से गुटिका ओषधियों के रूप में विशेष योग दिया है—

आसवेन सुजातेन बालानां दापयेद्भिषक् । सुखं भवति तेनास्य काश्यपस्य वचो यथा ॥१०॥ तेन कोष्ठगतो वायुः क्षिप्रमेव प्रमुच्यते । शिरोरोगेषु शमनं वमनं चैव शाम्यति ॥११॥ कृमिर्गुदगतो यस्य गुटिकायाः प्रलेपयेत् । तेनास्य सौख्यं भवति काश्यपस्य वचो यथा ॥१२॥ शर्कराक्षौद्रसंयुक्तां पाययीत चिकित्सकः । सुखी भवति तां पीत्वा काश्यपस्य वचो यथा ॥१३॥

नवनीतक में इससे पूर्व के श्लोकों के लुप्त होने से इस गुटिकौषध का क्या स्वरूप है यह नहीं कहा जा सकता। काश्यपसंहिता में स्थान-स्थान पर गुटिकौषधियों की रचना तथा उपयोग दिये हैं, उन्हीं में से किसी एक को लेकर अपने अनुभूत अनुपान विशेष के साथ यहां दिया गया प्रतीत होता है।

प्राचीन रावणकृत बालतन्त्र में काश्यप तथा वृद्धकाश्यप के नाम दिये हैं। इस कौमारतन्त्र में वृद्धकाश्यप के साथ आचार्यरूप में आया हुआ काश्यप भी यही कौमारभृत्याचार्य कश्यप प्रतीत होता है।

ज्वरसमुच्चय नाम का एक प्राचीन ग्रन्थ हैं जिसमें ज्वर के विषय में प्राचीन ऋषियों के वचनों का संग्रह किया गया है। जिसकी एक ताडपुस्तक, लिपि के अनुसार सात-आठ सौ वर्ष पूर्व की तथा दूसरी ४४ नेपाली संवत्सर (ई. प. ९२४) में लिखी हुई मेरे पास है। जब ग्रन्थ का लेख (लिपि) समय ही इतना प्राचीन है तब ग्रन्थ का रचना समय तो इससे भी प्राचीन होना चाहिये। इस ग्रन्थ में कश्यप नाम से बहुत से श्लोक दिये हुए हैं। इन श्लोकों की काश्यपसंहिता में आये हुए श्लोकों से संगति है, इसका पीछे निर्देश किया जायगा। इससे यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि ज्वरसमुच्चय में आया हुआ काश्यप इस संहिता का आचार्य कश्यप ही है। तथा उसमें दिये हुए श्लोक भी इस संहिता से ही लिये गये हैं।

इसी प्रकार सुश्रुत की व्याख्या के निबन्धसंग्रह² अष्टाङ्ग हृदय³ की टीका तथा चरक की चक्रपाणि टीका में कश्यप


१. इस ग्रन्थ की उपलब्धि के विषय में भारतीय इतिहास की रूपरेखा पृ. ९८३ (जयचन्द्र विद्यालंकार) पर लिखा है— सन् १८९० में ब्रिटिश भारतीय सेना के लैफ्टिनेंट बावर नामक एक अफसर को एक दूसरे अंग्रेज के घातक की खोज में घूमते फिरते चीनी तुर्किस्तान के उत्तरपूर्वी छोर की कुचार (कूचा) नामक बस्ती से एक स्तूप के खण्डहरों में से निकाली गई भोजपत्रों पर लिखी एक पोथी मिली। वह अब बावर-पोथी कहलाती है। वह कलकत्ते में डॉ. हार्नली के पास भेजी गई और गुप्त युग ब्राह्मी में लिखी संस्कृत की पोथी निकली। वह वैद्यक का ग्रन्थ है जिसके पहले अंश में लहसुन के गुण बखाने गये हैं। बाबर पोथी अब आक्सफोर्ड में है। उसके पूरे फोटो लिप्यन्तर और अनुवार हार्नली ने आ. स. इ. जि. २२ में प्रकाशित किये हैं—अनुवादक। २. २ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २८ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १९७

नाम से अन्य भी दो तीन श्लोक दिये हुए हैं। परन्तु इस संहिता के बहुत से भागों के खण्डित होने से संभवतः वे श्लोक इस खण्डित भाग में हों ।

पीयूषधारा के गर्भाधानप्रकरण¹ में उक्तं च कश्यपसंहितायां, वर्षद्वादशकादूर्ध्वम्' इत्यादि द्वारा प्रारंभ करके निम्न श्लोक दिया है—

अन्तः पुष्पं भवत्येव पनसोदुम्बरादिवत् । अतस्तु तत्र कुर्वीत तत्सङ्गं बुद्धिमान्नरः ।।

(अर्थात् कटहल तथा गूलर की तरह बारह वर्ष के बाद स्त्री अन्तःपुष्पा होती है, इसलिये उसके साथ बुद्धिमान् पुरुष सङ्ग कर सकता है) ।

उपर्युक्त श्लोक के ज्योतिष के ग्रन्थ में होने से कश्यपसंहिता नाम का अन्य ज्योतिष का ग्रन्थ भी हो सकता है। काश्यपसंहिता के जातिसूत्रीयाध्याय में आये हुए गर्भाधान से संबन्धित विषय के अंशरूप में त्रुटित होने से तथा इस संहिता में आर्ष रचना द्वारा गर्भाधान के विषय का प्रतिपादन किया होने से यह श्लोक संभवतः उस त्रुटित भाग में आया हुआ भी हो सकता है। उस अवस्था में पीयूषधारा में वर्णित कश्यपसंहिता भी संभवतः यही हो ।

जीवक-संबन्धी विचार—पूर्वोद्दिष्ट काश्यपसंहिता के कल्पाध्याय के अनुसार ज्ञात होता है कि कश्यप द्वारा उपदिष्ट महातन्त्र रूपी इस संहिता को कनखल निवासी तथा ऋचीकपुत्र वृद्धजीवक नामवाले किसी महर्षि ने उसे ग्रहण किया तथा संक्षिप्त करके उसे तन्त्ररूप में प्रकाशित किया।

महाभारत के प्रारम्भ में जामदग्नोपाख्यान में ऋचीक नाम के महर्षि का उल्लेख मिलता है। असीरियन् देश के पूर्ववृत्त में भी गालव आदि के नाम की तरह ऋचीक का नाम भी मिलता है। साधक प्रमाणों के अभाव में इस वृद्धजीवक का पिता कौनसा ऋचीक है, यह नहीं कहा जा सकता। पुराण, इतिहास आदि में तथा आत्रेय सुश्रुत आदि प्राचीन वैद्यक ग्रन्थों में भी वृद्धजीवक या जीवक का नाम कहीं भी दिखाई नहीं देता है। परन्तु नावनीतक के कौमारभृत्य प्रकरण में कश्यप के समान ही नाम² ग्रहण पूर्वक छर्दि एवं उरोघात रोग में जीवक की ओषधि का भी उल्लेख होने से तथा बालभैषज्य के विषय एवं काश्यप के साहचर्य से यही वृद्धजीवक प्रतीत होता है। इस वृद्ध जीवक तन्त्र में छर्दि रोग के प्रकरण के खण्डित होने से वह ओषधि यहाँ नहीं मिलती है। उरोघात रोग में ओषधियों का निर्देश करने वाले श्लोक बीच-बीच में खण्डित हैं परन्तु अवशिष्ट भाग में पिप्पली के साथ मिलाकर किसी ओषधि का प्रयोग दिखाई देने से कुछ समानता प्रतीत होती है। सुश्रुत के उत्तर तन्त्र में 'ये च विस्तरतो दृष्टाः कुमाराबाधहेतवः' द्वारा सामान्यरूप से निर्देश करके उसकी व्याख्या करते हुए डल्लन ने 'पार्वतकजीवबन्ध्यकप्रभृतिभिः' द्वारा जिस जीवक का संकेत किया है, कौमारभृत्याचार्यों की श्रेणी में दिया होने से संभवतः वह यही वृद्धजीवक है। चक्रदत्त ने भी जीवक के नाम से सौरेश्वर घृत दिया हुआ है। अन्य टीकाग्रन्थों में भी कुमारों के लिये उपयोगी कास-श्वासनाशक ओषधियाँ जीवक के नाम से उद्धृत मिलती है।

यह वृद्धजीवक कौन है ? इसका अनुसन्धान करने पर हमें भगवान् बुद्ध के समय के महावग्ग नामक पालीग्रन्थ बौद्धजातक तथा तिब्बतीय गाथाओं में 'कुमारभच्च' विशेषण युक्त जीवक नामक किसी प्रसिद्ध वैद्य का वृत्तान्त मिलता है। इसमें कुमारभच्च विशेषण तथा जीवक नामक प्रसिद्ध वैद्य के मिलने से इसके परिचय के लिये महावग्ग नामक बौद्ध पालीग्रन्थ के आठवें अध्याय में निम्न कथानक मिलता है—


१. १ से २ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २८-२९ देखें ।

१९८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

राजगृह (वर्तमान राजगीर-पटना जिला) में शालावती नाम की किसी वेश्या द्वारा सद्यः प्रसूत बालक को दासी ने शूर्प (छाज) में रखकर बाहर फेंक दिया। राजकुमार अभय उसे देखकर महल में ले आया तथा दासी द्वारा इसका पालन-पोषण किया। 'उत्सृष्टोऽपि जीवति' (छोड़ा हुआ या फेंक दिया जाने पर भी जीवित हैं) इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसका नाम जीवक हुआ तथा राजकुमार द्वारा पालन-पोषण किया जाने के कारण पाली भाषा के अनुसार इसका नाम कु (को) मारभच्च (कौमारभृत्य, कुमारभृत) भी हो गया। उसके बाद कालक्रम से वृद्धि को प्राप्त होकर जीविका की दृष्टि से विद्याध्ययन के लिये राजकुमार को बिना कहे ही उसने तक्षशिला जाकर वहां के किसी प्रसिद्ध वैद्य से सात वर्ष तक वैद्यक विद्या का अभ्यास किया। विद्या समाप्ति के बाद आचार्य ने पाथेय बांधकर उसे विदा किया और वह वहां से लौट गया। मार्ग में साकेत (अयोध्या) पहुंचकर सात वर्षों से शिरोवेदना से पीडित किसी सेठानी के घर पहुंचकर उस तरुण वैद्य ने घृत नस्य आदि ओषधियों से उसको स्वस्थ कर दिया तथा सत्कार में मिले हुए धन, दास तथा रथ आदि लेकर राजगृह पहुंचा। उस अर्जित धन को पोषण के प्रत्युपकार रूप में उसने राजकुमार अभय को देना चाहा परन्तु उसने अस्वीकृत करके उसका सम्मान किया तथा राजप्रासाद के अन्दर ही उसका निवास स्थान बनवा दिया। इसके बाद मगध के राजा बिम्बिसार का तीव्र भगन्दर रोग उसने एक ही लेप में अच्छा कर दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा ने उसका ५०० स्त्रियों के आभूषणों से सत्कार करके उस तरुण जीवक को अपने अन्तःपुर में रहने वाले प्रमुख बौद्ध भिक्षुओं की भी चिकित्सा की अनुमति प्रदान की। फिर सात वर्षों से शिरोवेदना से पीड़ित एक सेठ को किसी ओषधि से संज्ञाहीन करके कपाल का भेदन करके उसमें से दो कृमियों को निकाल कर पुनः कपाल को सीकर कुछ दिनों में उसे स्वस्थ करके उससे सत्कार रूप में बहुत सा धन प्राप्त किया। उसके बाद राजाज्ञा से बनारस जाकर आन्त्रग्रन्थि (T. B. of Intestinal Glands) रोग से पीड़ित किसी सेठ के लड़के के पेट का भेदन करके उसको स्वस्थ किया। उस सेठ ने भी उसका धन द्वारा बहुत सत्कार किया। उसके बाद राजा की आज्ञा से उज्जायिनी के राजा प्रद्योत के पाण्डुरोग को घृत प्रयोग द्वारा शान्त करने के लिये पहुंचा। घृत को न पीने की इच्छा वाले राजा को जब उसने कषायरूप से घृत का पान करा दिया तो उसे वमन हो गया। तब राजा के डर से पहले से ही तैयार की हुई हथिनी पर सवार होकर भागकर राजगृह लौट गया। औषध प्रयोग द्वारा वमन होने से स्वस्थ हुए राजा ने जीवक के लिये शिवि देश (शोरकोट-मध्य पंजाब) में होनेवाले मृगचर्म आदि की भेंट भेजी। फिर आनन्द तथागत की सूचना से रुग्ण हुए भगवान् बुद्ध को जीवक ने विरेचन के प्रयोग से स्वस्थ किया। प्रद्योत और बनारस के राजा द्वारा दिये हुए मृगचर्म, कम्बल आदि जीवक ने भिक्षुओं के लिये भगवान् तथागत को अर्पित कर दिया।

तिब्ब¹तीय गाथाओं के अनुसार बिम्बसार द्वारा भुजिष्या में उत्पन्न हुए पुत्र को माता ने एक टोकरी में रखकर फेंक दिया। उस बालक का राजकुमार अभय ने पालन-पोषण किया इसलिये उसका नाम कुमारभृत (भृत्य) हो गया। वह भैषज्य विद्या का अभ्यास करके राजकुमार की आज्ञा से कपालभेदन आदि शल्यतन्त्र (Surgery) का विशेष ज्ञान प्राप्त करने के लिये तक्षशिला पहुंचा। वहां शल्यतन्त्र के परम विद्वान् आत्रेय से शिक्षा ग्रहण करके शल्यतन्त्र में अत्यन्त निपुण हो गया, तथा अपने गुरु आत्रेय से भी बढ़ गया। ई. प. ४५० में लिखित बुद्धघोषकृत धम्म²पदव्याख्या में जीवक द्वारा ५०० भिक्षुओं सहित भगवान् बुद्ध के भोजन तथा बुद्ध के पादव्रण की चिकित्सा का निर्देश है। इसके अतिरिक्त सतीगुम्बजातक, संकिच्चजातक तथा चुल्ल³हंसजातक आदि में भी जीवक का निर्देश है।

उसने कभी अम्बपाली नामक उद्यान में एक विहार बनवाकर साढ़े बारह सौ (१२५०) भिक्षुओं के सहित बुद्ध को निमन्त्रित करके उसका सत्कार किया। राजगृह के श्रीगुप्त परिखा (मोहल्लाबस्ती) में उसने किसी स्तूप का भी निर्माण


१. १ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३० देखें।