काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १६९
'धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलसाधनम्' (च. सू. अ. १) अर्थात् धर्म अर्थ काम मोक्ष इन सबका मूल साधन आरोग्य ही है।
इस प्रकार क्योंकि स्वस्थ जीवन रूपी वृक्ष में उत्तम फल लगते हैं इसलिये दीर्घायुष्य एवं उत्तम जीवन के लिये शारीरिक कष्टों तथा ऐहिक दुःखों का दूर किया जाना आवश्यक है। शारीरिक दुःख विविध रोगों से सैकड़ों प्रकार से उत्पन्न होते रहते हैं, तथा ये सैकड़ों प्रकार के रोग किसी एक ही उपाय या उपदेश द्वारा न जाने जा सकते हैं और नहीं दूर किये जा सकते हैं इसलिये इन रोगों की निवृत्ति तथा इनको उत्पन्न ही न होने देने के लिये मनुष्य को जितने भी उपाय या साधन हैं वे सब यथाशक्ति अपनी बुद्धि तथा बल के अनुसार अवश्य जानने चाहिये।
इसके लिये हमें चार बातें जाननी चाहिये।
१. हेय—अर्थात् दुखों को उत्पन्न करने वाले रोग।
२. हेतु—उन रोगों के कारण (निदान)
३. हेय अर्थात् रोगों का हान (निवृत्ति-दूर करना) तथा
४. निवृत्ति के साधन (ओषधि आदि उपाय)
हेय (रोगों) के स्वरूप तथा उनके निदान (कारणों) को देखकर ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि पहले तो रोग उत्पन्न ही न हों और यदि उत्पन्न हो भी जावें तो ज्ञात साधन (ओषधि आदि) के द्वारा उन्हें दूर कर दिया जाय।
लोगों का कल्याण करने वाले हितकारी एवं विविध ज्ञान विज्ञानों में जो सबसे अधिक उपयोगी ज्ञान है उसी को आयुर्वेदविज्ञान कहते हैं। यह आयुर्वेद-विज्ञान केवल अपने या केवल एक दो व्यक्तियों के लिये ही उपयोगी नहीं, अपितु इससे कुटुम्ब, समाज, तथा सम्पूर्ण देश का उपकार एवं उन्नति होती है अतः प्रत्येक व्यक्ति को इसे जानना चाहिये तथा जानने वालों को इसका उपदेश एवं प्रचार करना चाहिये। इस प्रकार इसका ज्ञान तथा उपदेश विशेष रूप से उपयोगी है।
आयुर्वेद की प्राचीनता
जब सृष्टि के प्रारंभ में जगत् स्रष्टा ने पञ्चमहाभूत तथा उनसे उत्पन्न पदार्थों को बनाया तभी से प्राणियों के दीर्घायुष्य के साधनों का भी ज्ञान कराया। यदि प्राणी उत्पन्न होते ही मिथ्योपचार के कारण नष्ट हो जायें तो स्रष्टा का परिश्रम व्यर्थ ही होगा। ज्यों-ज्यों वे चिर सत्ता को प्राप्त करते जाते हैं त्यों २ वे स्रष्टा की अभिलषित बात को करने में समर्थ हो जाते हैं। और यदि वे प्राणी सत्ता को प्राप्त करके भी विकल (अपूर्ण) अङ्गों वाले हों तो उनसे भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है, अतः आदिकाल से ही सत्त्व एवं बल से युक्त सम्पूर्ण अङ्गों सहित दीर्घायुष्य की अपेक्षा होती थी। इस संसार में उस शिल्पकार स्रष्टा के चर, अचर, भोक्ता, भोज्य, आदि अनेक भेद हैं। भोक्ता तथा भोज्य के भी अनेक भेदहोते हैं। सब भोक्ताओं के लिये भी सब प्रकार के भोज्य पदार्थ अनुकूल नहीं होते, अपितु भोक्ताओं की जाति, देश, काल तथा अवस्था आदि के भेद के अनुसार ही उपकारी या अपकारी होते हैं। एक व्यक्ति के लिये अनुकूल या प्रतिकूल वस्तु भी सबके लिये समान नहीं होती। उसी व्यक्ति के लिये भी कोई वस्तु सदा एक समान अनुकूल या प्रतिकूल नहीं हो सकतीं अपितु वहां भी अवस्था आदि के अनुसार ही परिवर्तन होता रहता है। इसलिये किस व्यक्ति के लिये कब क्या अनुकूल होता है, उसके क्या साधन हैं, क्या प्रतिकूल है, किस प्रकार उसका उदय होता है, उसकी शान्ति का क्या उपाय है तथा रोग, रोग के कारण तथा रोगों को दूर करने के उपाय आदि का सृष्टि के प्रारंभ से ही ज्ञान था। सब एषणाओं (इच्छाओं) में से प्राणैषणा सबसे प्रथम उत्पन्न होती है। इस प्रकार प्राणियों की उत्पत्ति के साथ ही आयुर्वेद का प्रारंभ होता है।
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अनुत्पाद्यैव प्रजा ‘आयुर्वेदमेवाऽग्रेऽसृजत्’ (प्राणियें उत्पत्ति से पूर्व ही सृष्टि के प्रारंभ में आयुर्वेद को उत्पन्न किया) सुश्रुत के इस वाक्य के समान ‘आयुर्वेदमेवाग्रेऽसृजतो विश्वानि भूतानि’ (आयुर्वेद को सृष्टि के प्रारंभ में उत्पन्न किया, उसके बाद सम्पूर्ण प्राणियों को उत्पन्न किया) काश्यपसंहिता के इस वाक्य के द्वारा यद्यपि सृष्टि से भी आयुर्वेद की प्राचीनता प्रकट की है परन्तु निमित्त तथा निमित्ती (कार्य तथा कारण) के पूर्वापर संबन्ध को दृष्टि में रखते हुए ‘अग्निहोत्रं जुहोति’ ‘यवागूं पचति’ आदि वाक्यों में पाठक्रम के अनुसार बलवान् अर्थक्रम की तरह ‘अभिज्ञान शाकुन्तल’ के ‘तव प्रसादस्य¹ पुरस्तु संपदः’ इस वाक्य के अनुसार प्रसाद (कृपा) से पूर्व ही संपदाओं के होने के समान ही वास्तव में सृष्टि के साथ आयुर्वेद का आलंकारिक रूप से घनिष्ठ एवं निकट सम्बन्ध बतलाया है। अथवा बालक की उत्पत्ति से पूर्व ही स्तन्य (दूध) की उत्पत्ति के समान ही सृष्टि से पूर्व भी आयुर्वेद की उत्पत्ति वस्तुतः संभव हो सकती है। विकासवाद की दृष्टि से भी भौतिक सृष्टि से पूर्व ओषधि वनस्पति आदि की उत्पत्ति को स्वीकार किया जाना भी प्राणियों की उत्पत्ति से पूर्व भैषज्य विज्ञान (आयुर्वेद) का होना सिद्ध करता है। भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने ‘सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात् स्वभावसंसिद्धलक्षणत्वात्’ (च.सू.अ. ३०) अर्थात् यह आयुर्वेद अनादि तथा लक्षण के स्वभावसिद्ध होने से नित्य है इस लक्षण के द्वारा आयुर्वेद के ज्ञान तथा उपदेश के आदि (जिसका आदि कारण विद्यमान हो) होने पर भी संसार के समान आयुर्वेद की ज्ञान परम्परा को भी अनादि दर्शाया है।
आयुर्वेद
आयुर्वेद शब्द का अर्थ करते हुए इस काश्यपसंहिता में ‘आयुर्जीवितमुच्यते’ विद्ज्ञाने धातुः, विद्लृलाभे च, आयुरनेन ज्ञानेन विद्यते ज्ञायते विन्दते लभते न रिष्यतीत्यायुर्वेदः, (आयु का अर्थ है जीवन, उसके साथ विद्ज्ञाने धातु या विद्लृ लाभे धातु से आयुर्वेद शब्द बनता है, अर्थात् इसके द्वारा आयु का ज्ञान होता है या आयु की प्राप्ति होती है इसलिये इसे आयुर्वेद कहते हैं) इस परिभाषा के द्वारा दीर्घ जीवन के बतलाने वाले तथा उपायों के द्वारा उसे प्राप्त कराने वाले अविनाशी शास्त्र को आयुर्वेद कहते हैं। इस निर्वचन के द्वारा आयुर्वेद का स्वरूप तथा प्रयोजन प्रकट होता है। इस प्रकार आयुर्वेद शास्त्र के द्वारा आयु का स्वरूप, जिनके द्वारा वह जाना जाता हैं वे उपाय, तथा विद्यमान आयु के लक्षणों को जाना जाता है। इन सबको जानकर तथा उनके अनुसार ठीक आचरण करने से आयु स्थिर होती है तथा इस ज्ञान के बिना आचरण करने से आयु विनाश की ओर अग्रसर हो सकती है। इस प्रकार साधनों सहित आयु को स्थिर करने वाला शास्त्र आयुर्वेद कहलाता है।
आत्रेय² तथा सुश्रुत³ के अनुसार भी आयुर्वेद के प्रयोजन व्याधि परिमोक्ष तथा स्वास्थ्यरक्षा (Curative and Preventive Treatmant) प्रतीत होते हैं।
१. उदेति पूर्वं कुसुमं ततः फलं, घनोदयः प्राक् तदनन्तरं पयः। निमित्तनैमित्तिकयोरयं क्रमस्तव प्रसादस्य पुरस्तु संपदः॥
(शाकुन्तले ७ अङ्के)
२. चरकसंहिता में—‘हिताहितं सुखं दुःखम्’ इत्यादि द्वारा अपने भोग के आयतन, पंचभूतों के विकाररूप शरीर, भोग के साधन चक्षु आदि इन्द्रियों, मन, अन्तःकरण तथा ज्ञान कराने वाली आत्मा का अदृष्टपूर्वक हुआ संयोग आयु नामक पदार्थ. आयु का स्वरूप, आयु के लिये हितकर तथा अहितकर (पथ्य और अपथ्य) तथा उसके परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुए सुख दुख तथा अवस्थानुरूप आयु के लक्षण इत्यादि साधनों एवं फलों से युक्त आयु को जो प्राप्त कराता है अथवा उसका ज्ञान कराता है उसे आयुर्वेद कहा है (च.सू. १ अ. ४०)
३. सुश्रुत में—‘आयुरस्मिन् विद्यतेऽनेन वाऽऽयुर्विन्दतीत्यायुर्वेदः’ के द्वारा ‘शरीर, इन्द्रिय, सत्व तथा आत्मा का संयोगरूप आयु जिसमें स्थित हो, जिसके द्वारा आयु का ज्ञान हो तथा जिससे आयु की प्राप्ति हो इत्यादि आयुर्वेद के निर्वचन किये गये हैं।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १७१
आयुर्वेद शब्द बहुत शाखाओं वाले चिकित्साविज्ञान को प्रकट करता हुआ केवल मनुष्यों की चिकित्सा से ही संबन्ध नहीं रखता अपितु इसमें हाथी, घोड़े, गौ आदि पशुपक्षी तथा वृक्ष लता आदि उद्भिज्ज की चिकित्सा का भी विधान है क्योंकि वराहसंहिता, भट्टोत्पल के उस प्रकरण की व्याख्या तथा उपवन विनोद आदि ग्रन्थों में पालकाप्य, १ मतङ्ग, शालिहोत्र आदि पशुचिकित्सकों, तथा उनके उपदेशों और परम्परागत ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार वृक्षायुर्वेद में भी काश्यप, सारस्वत, पराशर आदि आचार्य एवं तत्सम्बन्धी उनके उपदेश भी देखने में आते हैं। अग्निपुराण (अ. २७९-२९२) में धन्वन्तरि द्वारा भी सुश्रुत को मनुष्य हाथी, घोड़े, गौ तथा वृक्ष आदि से संबन्धित आयुर्वेद के उपदेश का उल्लेख मिलता है। परन्तु धन्वन्तरि काश्यप, आत्रेय आदि सब आचार्यों ने मानवीय आयुर्वेद को ही लेकर विशेषरूप से वर्णन किया है इसलिये हम भी उन्हीं के अनुसार उसी को लेकर प्रवृत्त होंगे।
विद्वान् लोग आद्यज्ञान (प्रारंभिक ज्ञान) होने के कारण इसका वेद शब्द से उल्लेख करते हैं। वेद आर्यों का सबसे प्रारंभिक (ईश्वरीय) ज्ञान समझा जाता है। इसमें प्राचीन समय का सब ज्ञान विज्ञान संग्रहीत है। आर्यों के तपस्या प्रणिधान आदि के आलोक से उज्ज्वल हृदयों में प्रतिभा रूप से अव्याहत आद्यज्ञान रूपी संपत्ति उत्पन्न हुई थी उसी को वेद शब्द से कहा है। उसी ज्ञान विज्ञान में से ही एक यह आयुर्वेद भी है।
वेद तथा आयुर्वेद का परस्पर संबन्ध
ऋक्, यजु, साम तथा अथर्ववेद के क्रमशः धनुर्वेद गान्धर्ववेद, स्थापत्यवेद, (भवन निर्माण कला) तथा आयुर्वेद उपवेद हैं उपशब्द समीप अर्थ का द्योतक है। आयुर्वेद का किस वेद के साथ संबन्ध है, जब हम इस विषय में विचार करते हैं तो देखते हैं कि सुश्रुताचार्य ‘इह खल्वायुर्वेदंमष्टाङ्गम उपाङ्गमथर्ववेदस्य’ (सू. अ. १) इस वाक्य के द्वारा स्पष्ट रूप से आयुर्वेद का अथर्ववेद के साथ अवयव तथा अवयवों का संबन्ध दिखाते हैं। आत्रेय भगवान् भी ‘चतुर्णामृक्सामयजुरथर्ववेदानामथर्ववेदे भक्तिरादेश्या’ (च. सू. अ. ३०) इस वाक्य द्वारा ऋग्वेद आदि चारों वेदों के साथ थोड़ा बहुत संबन्ध होते हुए भी भक्ति शब्द के द्वारा अर्थवेद के साथ ही आयुर्वेद का घनिष्ठ संबन्ध प्रकट करते हैं। इस काश्यपसंहिता में भी ‘आयुर्वेदः कथं चोत्पन्नः’ इस प्रश्न के ‘अथर्ववेदोपनिषत्सु प्रागुत्पन्नः’ इस उत्तर द्वारा प्रारंभ में इसे अथर्वमूलक दिखलाकर ‘कं च वेदं श्रयति’ इस दूसरे प्रश्न के उत्तर में ‘अथर्ववेदमित्याह, तत्र हि रक्षाबलि होमशान्ति ...... प्रतिकर्मविधानमुद्दिष्टं विशेषेण, तद्वदायूर्वेदे, तस्मादथर्ववेदं श्रयति, सर्वान्वेदानित्येके’ यह कहकर ‘आयुर्वेदमेवाश्रयन्ते वेदा ..... तस्माद्ब्रूमः ऋग्वेदयजुर्वेदसामवेदाथर्ववेदेभ्यः पञ्चमोऽयमायुर्वेदः’ (वेद आयुर्वेद के ही आश्रित हैं। इसलिये ऋक्, यजु, साम तथा अथर्ववेद के अतिरिक्त आयुर्वेद को पांचवां वेद कहा है) इत्यादि के द्वारा आचार्य विषयसन्निकर्ष के कारण पहले अथर्ववेद से संबन्ध दिखलाकर तथा उसी के साथ-साथ सब वेदों में ही आयुर्वेद का थोड़ा बहुत विषय मिलने से एकीय मत से सब वेदों के साथ आयुर्वेद का संबन्ध दिखलाते हैं। और अन्त में ब्रह्मा, अश्विनीकुमार तथा इन्द्र आदि की सम्प्रदाय परम्परा द्वारा क्रमशः विकसित आयुर्वेद के एक स्वतन्त्र प्रस्थान (विज्ञान) के रूप में परिवर्तित होकर वेदों के समान ही सब के जीवनधारक तथा लोक कल्याण परक होने से पृथक् एक शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठा तथा आयुर्वेद की अपने विषय में प्रधानरूप से उपादेयता दिखलाकर उसे महाभारत की तरह ही पांचवां वेद स्वीकार किया है।
सुश्रुत के ‘आयुर्वेदंमष्टाङ्गमूपाङ्गमथर्ववेदस्य’ इस वाक्य में उपाङ्ग शब्द को देखकर कुछ विद्वान २ सुश्रुत तथा उसी के द्वारा आयुर्वेद को बहुत अर्वाचीन सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। वे कहते हैं कि जहां साक्षात् संबन्ध होता है उसे
१. शालिहोत्रः सुश्रुताय ह्यायुर्वेदमुक्तवान् । पालकाप्योऽङ्गराजाय गजायुर्वेदमब्रवीत् ।। (अग्निपुराण २९२ अध्याय)
२. हिस्ट्री ऑफ हिन्दू कैमिस्ट्री-भाग १-पी. सी. राय.
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अङ्ग कहते हैं तथा अङ्ग का जिससे संबन्ध होता है उसे उपाङ्ग कहते हैं अर्थात् आयुर्वेद वेदाङ्ग का भी अङ्ग है और क्योंकि शिक्षा आदि वेदाङ्ग वेद के बाद हुए हैं अतः आयुर्वेद जो कि वेदाङ्ग का अङ्ग (उपाङ्ग) है वह वैदिक काल तथा वेदाङ्गकाल के भी बाद हुआ है, इस प्रकार वे सुश्रुत को अर्वाचीन सिद्ध करते हैं। परन्तु उपाङ्ग शब्द से आपाततः वैसा प्रतीत होने पर भी वेद के अङ्ग शिक्षा कल्प आदियों में वैद्यक विषय विशेषरूप से दिखाई नहीं देता है, अपितु श्रौत तथा ब्राह्मणग्रन्थ तथा उससे भी पूर्व के संहिता ग्रन्थों में आयुर्वेद विषय यथापूर्व अधिक मिलता है। इसमें भी अथर्ववेद में इसका बाहुल्य होने से वेद के साथ ही इसका घनिष्ठ संबन्ध प्रतीत होता है। अङ्ग का अर्थ अप्रधान या गौण की तरह अवयव भी होता है। मीमांसकों ने अङ्गों के दो भाग किये हैं। जो शरीर के अन्दर प्रविष्टा होकर (समीप होकर) उप कारक होते हैं उन्हें अन्तरङ्ग तथा जो शरीर के बाहर (दूर) से उपकारक ही उसे बहिरङ्ग कहते हैं। वैदिक शरीर से बहिर्भूत होने के कारण शिक्षा आदि बहिरङ्ग हैं परन्तु इसके विपरीत भैषज्य आयुष्य संशमनीय आदि बहुत से आयुर्वेद के विषय के वेदसंहिताओं में ओतप्रोत होकर उसके शरीर के अन्दर प्रविष्ट होने से आयुर्वेद तो अन्तरङ्ग रूप से ही विद्यमान है। नाना ज्ञान विज्ञान के भण्डार वेद का प्रधान विषय याज्ञिक (यज्ञसंबन्धी) है। परन्तु आयुर्वेद उसमें प्रसङ्गवश अवान्तर रूप से आया हुआ होने से वैदिक विज्ञान के शरीर में प्रविष्ट हुआ अवयव अङ्गरूप से है। बाहु आदि बड़े अवयवों को अङ्गरूप से तथा हाथ आदि छोटे अवयवों को उपाङ्गरूप से दिखलाकर सुश्रुत के टीकाकार डल्हण ने भी आयुर्वेद को अन्तरङ्ग ही बतलाया है। यदि वेद के बहिरङ्गभूत शिक्षा आदि को अङ्ग मानकर उसी के अनुसार सुश्रुत में आयुर्वेद को उपाङ्ग माना गया हो तो शिक्षा आदि अङ्गों के बाद में होने वाले आयुर्वेद को सुश्रुत में ही भूतसृष्टि से भी पूर्व होनेवाला कैसे कहा गया है ? अपितु शिक्षा आदि अङ्गों में अव्यवहृत वेद शब्द के द्वारा आयुर्वेद का निर्देश किया जाना इसे उनसे पूर्व काल का ही सिद्ध करता है। ज्ञान विज्ञान के समुद्र वेद के एक तरङ्ग रूप से विद्यमान आयुर्वेद को वेद के शरीर में अनुप्रविष्ट हुआ देखकर कुछ लोग इसे उपवेद शब्द से अवयव अवयविभाव को देखकर कुछ लोग वेदाङ्गशब्द से तथा स्वल्प अवयव को दृष्टि में रखकर कुछ लोग वेदोपाङ्ग शब्द द्वारा व्यवहार करते हैं इसलिये इनमें परस्पर कोई असंगति नहीं है। इसीलिये काश्यपाचार्य ने तो उपशब्द को बिलकुल ही छोड़कर इसे पञ्चमवेद ही कहा है।। अन्तरवयव सदा अवयवी के साथ ही रहते हैं। अवयव का समय अवयवी के बाद नहीं होता। इस प्रकार उपवेद शब्द के समान अर्थ वाला यह उपाङ्ग शब्द भी आयुर्वेद को प्राचीन ही सिद्ध करता है अतः इसमें अर्वाचीनता की शंका नहीं करनी चाहिये।
यद्यपि ब्राह्मणग्रन्थ उपनिषद् महाभारत पुराण तथा स्मृति आदि में चारों वेदों का समानरूप से वर्णन मिलता है। इसके साथ ही अथर्ववेद¹ में ऋक्, यजु, सामवेदों का उल्लेख है परन्तु इन² तीनों वेदों में अथर्ववेद का उल्लेख न होने से विद्वानों की सम्मति में यह त्रयीविभाग (ऋक् यजु साम वेद) प्राचीन है। मन्त्रात्मक वेद के पद्यात्मक ऋक्, गद्यात्मक यजु तथा गीत्यात्मक साम इस प्रकार तीन विभाग हैं। इस त्रयीविभाग (तीन वेदों) में ही अथर्ववेद के मन्त्रों का भी यथास्थान समावेश हुआ है। ऋषियों के हृदयों में प्रारंभ में आदिमज्ञानरूप तीनों³ वेदों का जब ज्ञान हुआ था तभी आयुर्वेद विज्ञान भी था, ऐसा ऋक् यजु तथा सामवेद में स्थान २ पर आये हुए आयुर्वेद के विषयों से ज्ञात होता है। विशिष्टज्ञान के कारण अथर्ववेद की पृथक् गणना करके इसके सहित चार वेद हो जाते हैं। ब्राह्मण, उपनिषद्, स्मृति तथा मीमांसा आदि में भी चारों वेदों तथा उनके ज्ञाताओं का निर्देश मिलता है। इस प्रकार ऋक्, यजु, साम, अथर्व इन
१. यस्मादृचोऽवातक्षन्यजुर्यस्मादपाकषन्। सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखम् (अथर्व १०/७/२०)
२. तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसिजज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत। (ऋक् १०/७/८, यजु ३१/७/ अथर्व १७/६/१३)
३. सा वा एषा वाक् त्रेधा विहिता ऋचो यजूंषि सामानि। (शतपथ १०/५/१७)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १७३
चारों वेदों के पुरातन काल से ही समकक्ष होने के प्रमाण न्यायमञ्जरी तथा वेदसर्वस्व में बहुत से मिलते हैं। अथर्ववेद के सहित चारों वेदों के उपवेदों का उल्लेख करते हुए चरणव्यूहकार ने "ऋग्वेदस्यायुर्वेद उपवेद इत्याह भगवान् न्यासः स्कन्दो वा" वाक्य द्वारा भगवान् व्यास तथा स्कन्द के मत में आयुर्वेद को ऋग्वेद का¹ उपवेद बताया है। उसकी सम्मति में तीनों वेदों में आयुर्वेद के विषय मिलने पर भी ऋग्वेद में विशेषरूप से स्वर्वैद्य अश्विनीकुमारों के सूक्तों में तथा अन्यत्र भी दूसरे अतीत पुरावृत्तों के साथ आयुर्वेद विषय के विशेषरूप से मिलने से त्रयीविभाग को दृष्टि में रखते हुए ऋग्वेद के साथ आयुर्वेद का विशेष संबन्ध होने से संभवतः उपर्युक्त उक्ति कही हो। परन्तु उसके बाद जब कर्मकाण्ड के विशेष विकसित हो जाने पर शान्तिक पौष्टिक आदि ऐहिक कल्याणकारक कर्म तथा दैहिक आगन्तुक संशमन कर्म प्रधान अथर्ववेद की पृथक् गणना करके वैदिक विज्ञान चार भागों में विभक्त हो गया तब अथर्ववेद में² भैषज्यकर्म, आयुष्यकर्म तथा भूतादि परिहारकर्म विशेषरूप से पृथक् कर दिये गये। कौशिकसूत्रकार ने भी स्थान-स्थान पर उसी प्रकार का विनियोग प्रदर्शित किया है। इस प्रकार आथर्वण प्रक्रिया में विशेषरूप से आये हुए शान्तिक पौष्टिक आदि क्रियाओं से युक्त भैषज्य विज्ञान के क्रमिक विकास के साथ-साथ आयुर्वेदिक विषयों के भी विकसित होने से तथा पूर्वोक्तानुसार अन्य वेदों की अपेक्षा अथर्ववेद में विशेषरूप से इस विषय के मिलने से तात्कालिक स्थिति के अनुसार अथर्ववेद के साथ इसका घनिष्ठ संबन्ध देख कर धन्वन्तरि आत्रेय तथा कश्यप आदि प्राचीन आचार्यों ने आयुर्वेद के विषय में 'अथर्ववेद का उपाङ्ग' अथर्ववेद में विशेष भक्ति (श्रद्धा) का रखना तथा अथर्वमूलक इत्यादि जो कहा है वह युक्तिसंगत ही है।
वेदों में आयुर्वेद संबन्धी विषय
वेदों के विषय में दो मत हैं। प्रथम प्राचीन मीमांसकों का सिद्धान्त है कि वैदिक पद्धति में श्रवणपरम्परा द्वारा वर्तमान, प्राचीन आचार्यों द्वारा भी कर्ता का ज्ञान न होने से "यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं या वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै" इस श्वेताश्वतरोपनिषद् के वचन द्वारा पूर्व सिद्ध ऐश्वर ज्ञानात्मक इस वेद के जगत् स्रष्टा के मन में प्रतिभा (इलहाम-Revelation) के रूप में उदित होने के उल्लेख से, तथा ऋषियों के भी केवल मन्त्रद्रष्टा होने से पद तथा पद के अर्थ के नित्य संबन्ध होने से यह वेद अनादि तथा नित्य है। परन्तु इसके विपरीत तार्किकों (नैयायिकों) का सिद्धान्त है कि उस परमेश्वर से ऋक्, साम तथा यजु के उत्पन्न होने का उल्लेख मिलने से वेद रूपी शब्द के प्रत्येक उच्चारण की नई उत्पत्ति के कारण शब्दों के समुदायरूप वेदों का भी यद्यपि नित्यत्व संभव नहीं, अपितु ये सृष्टि के प्रारंभ में ईश्वर द्वारा बनाकर उपदेश करने से पौरुषेय हैं। तथापि सब दोषों से रहित परम आप्त परमात्मा की कृतिरूप होने से इसे प्रामाणिक तो मानना ही चाहिये। वेद अनादि हैं, अपौरुषेय (ईश्वरीय ज्ञान) हैं, पौरुषेय (पुरुषमनुष्यकृत) हैं, अथवा आर्ष हैं और इस वेद की उत्पत्ति अथवा प्रकाशन का कौन सा वास्तविक तथा ठीक ठीक समय है—एतद्विषयक विचार को इस समय हम यहीं पर समाप्त करते हैं। यह निर्विवाद तथ्य है कि प्राचीन ऋषियों द्वारा भी सबसे अधिक प्रामाणिक माना जाने के कारण यह अत्यन्त प्राचीन काल से ही सम्मानित माना गया है। आजकल के प्राच्य तथा पाश्चात्य विद्वान् भी इसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। पुरातत्वानुसन्धान की दृष्टि से वैदिक साहित्य की आलोचना करने वाले विद्वानों को यदि हम देखें तो किसी-किसी के मत में यह बारह हजार वर्ष पूर्व का है तथा किसी-किसी के मत में यह चार हजार वर्ष पूर्व का है—इत्यादि। इस प्रकार अपने-अपने विचारों के अनुसार बहुत से पक्ष हमारे दृष्टि गोचर होते हैं परन्तु संसार में
१. तञ्जौर के पुस्तकालय में विद्यमान उमा-महेश्वर संवाद रूप एक अन्य काश्यपसंहिता में भी 'ऋग्वेदस्योपवेदाङ्ग काश्यपं रचितं पुरा। लक्षग्रन्थं महातेजः अग्रेयं मम दीयताम् (?) इस श्लोक के द्वारा आयुर्वेद को ऋग्वेद का उपवेद बतलाया गया है।
२. भेषजं वा आथर्वणानि (ताण्ड्यमहाब्राह्मणे १२. ९. १०)
१७४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
जितने भी प्राचीन साहित्य उपलब्ध हैं उन सबसे प्राचीन वैदिक साहित्य (वेद) हैं, इसमें किसी का विरोध नहीं है। इस प्रकार इस वैदिक विज्ञान का तथा उसके अन्तर्गत आयुर्वेद विज्ञान का भी समय प्राचीन ही स्थिर होता है। इस वैदिक विज्ञान रूपी भण्डार में अन्य विज्ञानों की तरह आयुर्वेद विज्ञान भी बहुत प्रकार से ओतप्रोत दिखाई देता है। उदाहरणार्थ—
ऋग्वेद संहिता में—वृद्धावस्था से जीर्ण हुए च्यवन तथा वन्दन ऋषि का अश्विनीकुमारों द्वारा रसायन प्रयोग से पुनः यौवन की प्राप्ति-Rujuvenilation (१-११६-१०/१-११७-१३/ १-११९-७) दासों द्वारा अग्नि और जल में फेंकने पर भी बचे हुए दीर्घतमस् ऋषि का पुनः दास द्वारा सिर तथा छाती के काट दिये जाने पर अश्विनीकुमारों द्वारा जीवन दान देकर दस युग पर्यन्त वृद्धावस्था से रहित होकर जीवित रहना (१. १५८. ४-६) युद्धक्षेत्र में खेल राजा की पत्नी विश्पला की शत्रुओं द्वारा टांग काट दी जाने पर अश्विनीकुमार द्वारा लोहे की जंघा जोड़ना (१. ११६. १५) कटे हुए अङ्गों वाले अत्रि आदि के अवयवों को जोड़ना (१. ११७. १९) शत्रुओं द्वारा तीन टुकड़े किये हुए श्यावाश्व के अङ्गों को जोड़कर पुनरुज्जीवित करना (१. ११७, २४) अश्विनीकुमारों द्वारा दधीच (दधीची या दध्यङ्) ऋषि के सिर को अलग करके उसे रखकर उसकी जगह घोड़े का सिर जोड़कर उसके द्वारा मधुविद्या (प्राणविद्या) ग्रहण करके फिर घोड़े का सिर काटकर उसके स्थान पर पुनः पहला (मनुष्य का) सिर जोड़ देना (१. ११६. १२/१. ११७. २२) अन्धे ऋज्राश्व को दृष्टिदान (१. ११६. १६/१. ११७. १७) अन्धे कण्व को दृष्टिदान तथा बहरे नार्षद को श्रोत्रदान (१. ११७. ८) पङ्गु (लूले) परावृज तथा जिसके घुटने खराब हुए हैं ऐसे शोणर्षि को गतिदान (१. ११२. ८) नपुंसक पतिवाली बध्रियती के भी पुत्रोत्पादन (१. ११६. १३) विश्वक की नष्ट हुए पुत्र (विष्णाश्व) की प्राप्ति (१. ११६. २३) कुष्ठ रोग के कारण पति को न प्राप्त करके पितृगृह में जीर्ण होती हुई कक्षीवती की पुत्री घोषा का कुष्ठ निवारण करके पति की प्राप्ति कराना (१. ११७. ७) कुष्ठरोग से कृष्ण वर्ण वाले श्याव के रोग को दूर करके सुन्दर पती की प्राप्ति (१. ११७. ८) इत्यादि अश्विनीकुमारों के अनेक अद्भुत चमत्कार-वायु, द्यु, पृथिवी आदि के समान देवभिषग् अंश्विनीकुमारों द्वारा अनुकूल भेषज की प्रार्थना (१. ८९. ४) अश्विनीकुमारों द्वारा ओषधि वनस्पति आदि की विशेष रूप से अभिव्यक्ति (१. ११६. ८) तुम दोनों भैषज्य के द्वारा भिषक् होवो-इस प्रकार अश्विन्यों की प्रार्थना (१. १५८. ६) आंखों द्वारा देखना, अन्य सब इन्द्रियों द्वारा समर्थ होना, वृद्धावस्था को दूर करना तथा सौ वर्ष की आयु की प्राप्ति की अश्विन्यों से प्रार्थना (१. ११६. २५) आर्चतक तथा संयु ऋषि की निवृत्तप्रसवा गौ को भी अश्विन्यों द्वारा प्रसव कराना तथा दूध का दिलवाना (१. ११६. २२/१. ११७. २०) इन्द्र द्वारा भी अन्धे परावृज को दृष्टिदान तथा पङ्गु (लूले) श्रोण को गतिदान (२. १५. ७) इन्द्र द्वारा अपाला के चर्मरोग तथा उसके पिता गंजरोग (Baldness) दूर करना (८. ९१. ७) इन्द्र का औषधि धारण करना (२. २३. ७) नाना विष तथा कृमियों का वर्णन और उनका प्रतिकार (१. १९१. १-१६) नाना प्रकार के यक्ष्मा रोगों को दूर करना (१०. १६३-१-६) सूर्यचिकित्सा द्वारा हृद्रोग आदियों को दूर करना (१. ५०. ११-१३) जल का भेषजत्व (१०. १३७. ६/१. २३. १९) औषधियों का वर्णन (१०. ९७. १-२३) यक्ष्मा, अज्ञातयक्ष्मा (अज्ञात रोग-Obsevre diseases) राजयक्ष्मा, ग्राहि, पृष्ठ्यामय, सिपसिमि तथा हृद्रोग आदि का उल्लेख (१०. ९७. १०५. १३७. १६१. १६७) इत्यादि बहुत से विषय स्थान २ पर मिलते हैं।
शुक्ल यजुः संहिता—में भी १२ वें अध्याय के दो सूक्तों (१२. ७५. ८९/१२. ९०. १०१) में औषधियों का रोगनाशकत्व, औषधियों के खोदने वाले तथा जिनके लिये औषधियां खोदी गई हैं उन दोनों के लिये उपकारी होना, श्लेष्मरोग, अर्श, श्वयथु, गण्डु, श्लीपद, यक्ष्म, मुखपाक, क्षत आदि रोगों का नाश करना, स्थान २ पर (१९. ८१. ९३/२०. ५. ९/२५. १-९/३१. १०-१३/३०. ८-१०) घोड़े तथा मनुष्य के शरीर के अङ्गों का उल्लेख, यक्ष्मा, रोग, कफरोग, शोथ, पाकारु, अर्श, विषूचिका, हृद्रोग, अर्म, चर्मरोग, कुष्ठ, अङ्गभेद आदि रोगों का उल्लेख मिलता है।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १७५
तैत्तिरीय संहिता के काम्येष्टि प्रकरण में दृष्टिप्राप्ति तथा यक्ष्मा उन्माद आदि रोगों के परिहार की प्रार्थना, यक्ष्म, राजयक्ष्म तथा उससे उत्पन्न अन्य रोगों की उत्पत्ति का विषय (२. १. १. १/२. ४. १४. १५) में दिखाई देता है।
सामसंहिता में भी ऋग्वेद में दिये हुए मन्त्रों के प्रवेश तथा आयुर्वेद संबन्धी मन्त्रों के मिलने से सामवेद भी इस विषय में ऋग्वेद के समान ही प्रतीत होता है।
अथर्ववेद में तो विशेषरूप से आयुर्वेद के बहुत से विषय मिलते हैं। वहां इस विषय के सैकड़ों सूक्त तथा मन्त्र मिलते हैं। ऋग्वेद आदियों में तो प्रायः केवल ऐतिहासिक रूप से कहीं-कहीं प्रसङ्गवश आयुर्वेद का विषय आता है परन्तु अथर्ववेद में तो स्थान-स्थान पर रोग, शारीरिक अवयव, रोग प्रतीकार, अमुक-अमुक औषधियों का अमुक-अमुक रोग में उपयोग, इत्यादि बहुत से विषय भरे पड़े हैं जिससे कि आयुर्वेद का अथर्ववेद से संबन्ध स्पष्ट प्रतीत होता है। उदाहरण के लिये रोग के विषय में—तक्म (ज्वर) रोग का वर्णन तथा उसके भेदों (६. २१. १-३) सतत, शारद, ग्रैष्म, शीत, वार्षिक (वर्षाऋतु में होने वाला) तृतीयक आदि का निर्देश (१. २५. ४/५. २२. १-१४) ज्वर के भेद तथा उनमें मण्डूक (मेंढक) का उपयोग (७. ११६. १.२) उस समय जांगल प्रदेश होने के कारण मुंजवत्, बाहीक, गान्धार, अङ्ग, मगध आदि देशों में ज्वर का निर्देश (५. २२. १४) श्लेष्मा का अस्थि, सन्धिस्थान तथा हृदय को पीडा देना (६. १४. १-३) मन्या-गण्डमाला के ५५ भेद, ग्रीवा की गण्डमाला (Goitre) के ७७ भेद, स्कन्ध गण्डमाला के ९९ भेद (६. २५. १-३) अपचित (गण्डमाला-Scrofula) के एनी, श्येनी, कृष्णा, रोहिणी, सूतिका, आदि भेद (६. ८३. १-३) शीर्षक्ति, शीर्षामय, कर्णशूल, विलोहित, विसल्यक, अङ्गभेद, अङ्ग्ज्वर, विश्वाङ्य, विश्वतक्म, शारदतक्म, बसाल, हरिम, यक्ष्मोध, काहावाह, क्लोम (Pharynx) उदर, नाभि हृदयगतयक्ष्म, पार्श्व, पृष्ठि, वंक्षण (Groin) आन्त्र तथा मज्जागत पीडा विद्रधि वातोकर अलजी पाद जानु श्रोणि परिमंश (कटि या जघन प्रदेश) उनूक (रीढ की हड्डी) उष्णिहा (ग्रीवानाडी) तथा शीर्ष वेदना आदि नाना रोगों का वर्णन मिलता है (९. ८. १-२२)
शारीर शास्त्र के विषय में—शरीर की नाडी तथा धमनियों का निर्देश सौ शिराओं तथा सहस्र धमनियों का उल्लेख (१. १७. १. ४७. ३६. २) नाना रोगों के साथ शारीरिक अवयवों का वर्णन (२. ३३. १-७) नाना शरीरावयवों का उल्लेख (२. ३३. २/४. १२. ४/१०. २. १/१०. ९. १३-२५) केश, अस्थि, स्त्राव मांस, मज्जा, पर्व, उरु (जंघा) पैर, घुटने, शिर, हाथ, मुख, पृष्ठ, वर्जह्या (स्तन) पार्श्व, जिह्वा, ग्रीवा, कीकस (लोम) तथा त्वचा आदियों का उल्लेख (११. १०. ११-१५) में मिलता है।
रोग प्रतीकार के विषय में—मूत्राघात रोग में शर तथा शलाका (Cathetar) आदि द्वारा मूत्र का निकालना या भेदन करना (१. ३. १-९) सुखप्रसव (Normal Delivery) तथा उसकी विकृति (Abnormal Delivery) में योनिभेदन-Scissarian Section (१. ११. १-६) व्रण की जल द्वारा चिकित्सा (५. ५७-१-३) पकी हुई पिडका (Abscess) का शलाका द्वारा वेधन (७. ७४. १-२), पिडका को पकाने के लिये लवण का उपचार (७. ७६. १-२) इत्यादि शल्यप्रक्रियाऐं, बाहर से शरीर में प्रविष्ट होकर रोगों को उत्पन्न करने वाले विविध कृमियों तथा उनके निकलने का वर्णन (२. ३१. १-५) चक्षु नासिका तथा दातों में प्रविष्ट होकर रोगों को उत्पन्न करने वाले येवास, कष्कष, एजत्क. शिपी विलुक आदि कृमियों को नष्ट करना (५. २३. १-१३) नाना रंग के कृमियों का वर्णन, मनुष्य तथा गौ आदि पशुओं में विद्यमान कृमियों का सूर्य की किरणों द्वारा नष्ट किया जाना (२. ३२. १-६) हानिकारक रोग कृमियों को सूर्य की किरणों द्वारा नष्ट किया जाना (४. ३७. १-१२) सूर्य की लाल किरणों (Red rays) द्वारा हृद्रोग, कामला, पाण्डु आदि रोगों का नाश (१. २२. १-४) प्रातःकाल की धूप में स्वेदन, प्रभास्नान (Sun bath) तथा जल स्नान आदि द्वारा शारीरिक रोगों को नष्ट करना (३. ७. १-७) हृद्रोग में नदी के हिमयुक्त जल का उपयोग (६. २४. १-३) जल का सर्वरोग
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नाशकत्व (६. ९२. ३) जंगल तथा पर्वत की वायु का आरोग्यदायकत्व (१. १२. १-४) वायु का भेषज्व (४. १३. २-३), आरोग्य का वर्णन (२. १०. १-८) क्लैव्य-नपुंसकता नाशन के उपाय (६. १३८. १-५) इत्यादि विषय मिलते हैं।
**ओषधि के विषय में—**नक्त रामा कृष्णा असिक्री तथा ब्रह्मसंज्ञक औषधियों का किलास (कुष्ठ) तथा पलित (बालों का झड़ना) आदि रोगनाशकत्व (१. २३. १-४) सुपर्णा आसुरी सरूपा श्यामा आदि औषधियों का त्वग्रोगनाशकत्व (१. २४. १-४) वल्मीक (सांप की बाँबी) में मिलने वाली औषधियों का अतिसार, अतिमूत्र, नाडीव्रण आदि को नाश करना (२. ३. १-६) पृश्निपर्णी का गर्भनाश तथा रक्तविकार को दूर करने तथा शरीर की वृद्धि करने में (२. २५. १-४) कुरंग श्रृंग तथा उसके चर्म का क्षय कुष्ठ, तथा अपस्मार के नाश करने में (३. ७. १-३) शतवीर्या, दूर्वा का दीर्घायुष्य तथा नाना रोगों के दूर करने में (३. १५. १-८), वृषा शुष्मा आदि औषधियों का वृष्य रूप में (४. ४. १-८), रोहिणी नामक औषधि का भग्नसंधान तथा क्षत के प्रतीकार में (४. १२. १-७) वर्णन, सहदेवी तथा अपामार्ग का तृषा क्षुधा आदि की इन्द्रियों के रोगों हिंसाकर्म तथा शत्रुओं के नाश करने की महिमा का वर्णन (४. १७. १-८/४. १८. १-८/४. १९. १-८) अपामार्ग का पाप को दूर करना तथा मुख और दांतों का शोधन करना (७. ६७. १-३) सिलाच्य औषधि की महिमा का वर्णन (५. ५. १-९) कुष्ठ औषधि का तक्म (ज्वर) यक्ष्मा तथा कुष्ठ नाशन (५. ४. १-१०) कुष्ठ औषधि का वर्णन (६. ९५. १-३) कुष्ठ औषधि की धूप का तक्म (ज्वर) नाशकत्व तथा उसका विश्वभेषजत्व (सब रोगों की औषधि होना), यातुधान (कृमि) तथा ज्वर आदि नाशकत्व (१९. ३९. १-१०) की महिमा आशरीक, विशरीक, पृष्ठिका, विश्व तथा शारद ज्वरों में जङ्गिड औषधियों का उपयोग (५. २२. १-२४) जङ्गिड औषधियों का वर्णन, मणियों का बांधना तथा उसके द्वारा शत्रुओं का नाश, आयुष्य की प्राप्ति, विष्कन्ध (वातरोग) का नाश तथा आशरीक विशरीक, कफरोग, पृष्टरोग तथा विश्व शारद आदि ज्वरों का नाश (२. ४. १-६/१९. ३४. १-१०) जङ्गिड ओषधि का विष्कन्ध (वातरोग) नाशन, विश्वभेषजत्व, यक्ष्मानाशन, वातरोगनाशन, श्वित्र, दद्रु, पामा आदि त्वग्रोग तथा दुर्नाम (अर्श) रोग नाशन (१९. ३५. १-५) विषाण ओषधि का रक्तस्राव तथा वातरोग में हितकर होना (६. ८४. १-३) वरण ओषधि का यक्ष्मा नाशकत्व (६. ८५. १-३) पिप्पली का क्षिप्त, अतिवृद्ध तथा वातीकृत रोगों की ओषधि होना (६. १०९. १-३) कफरोग, विद्रधि, लोहितक, विसल्यक आदि रोगों में चीपद्रु नामक औषधि का उपयोग (६. १२७. १-३) देवीतितली ओषधि द्वारा केशवृद्धि के उपायों का वर्णन (६. १३६. १-३/ ६. १३७. १-३) गुग्गुल की धूप की गन्ध द्वारा यक्ष्मा रोग का नाश (१९. ३६. १-३) जलवायु द्वारा फैलने वाले रोगों के नाशक के रूप में अजशृङ्गी, जल द्वारा फैलने वाले रोगों के नाशक के रूप में गुग्गुलु पीलानल द्यौक्षगन्धि प्रमन्दि आदि, तथा प्रसारिरोगों (Infections deseases) के नाशक के रूप में अश्ववत्थ, न्यग्रोध शिखण्डी आदि ओषधियों का वर्णन (४. ३७. १-१२) ओषधियों की महिमा (६. २१. १-३) असिक्री, कृष्णा, पृष्णि, ञ्रस्तृणती, स्तम्बिनी, एकशृङ्गा, प्रतन्वती, अंशुमती, कण्डिनी, विशाखा, वैश्वदेवी, उग्रा, अवकोल्वा, तथा तीक्ष्णशृङ्गी आदि के रूप में नाना ओषधियों तथा उनके प्रकारों का वर्णन, नाना वनस्पतियों के रस से निर्मित गुटिकात्मक वैयाघ्रमणि का वर्णन, अश्वत्थ, दर्भ, सोम, ब्रीहि, यव आदियों का तथा पुष्पवाली, प्रसूमती, फलिनी तथा फलरहित ओषधियों और विषदूषण कृत्यानाशन तथा श्लेष्मरोगनाशन गुण वाली ओषधियों का वर्णन (८. ७. १-२८) दर्भ भङ्ग (शण) यव सह स्तेम आदि का वर्णन (११. ८. १५) ब्राह्मण नामक औषधि का विषहरत्व, अयस्कम्प नामक ओषधि का विष में बुझे हुए शस्त्रों द्वारा किये हुए व्रण आदि में हितकर होना तथा पूर्ण अधिशृङ्ग कुड़्मल आदि का शस्त्र प्राणी तथा ओषधियों का विषनाशन (४. ६. १-८) वरणा प्रक्रूया आदि ओषधियों का विषहरत्व (४. ७. १-७) नाना जाति के सर्पों का उल्लेख करके तावुव तथा तस्सुव आदि ओषधियों के विषनाशक गुण का वर्णन (५. १३. १-११) मधुप रूष्णीशी पाला आदि ओषधियों का सर्पविषनाशकत्व (६. १२. १-
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १७७
३) व्याख्याभेद से वल्मीक मिट्टी (सायण के मत से) अथवा सिलाच्य ओषधि (ग्रिफिथ के मत से) का विषहरत्व (६. १००. १-३) मधुक नामक ओषधि का नाना प्रकार के सर्प कृमि तथा विष को दूर करना (७. ५६. १-८) विष के द्वारा ही विष का प्रतीकार (७. ८८. १) विषदोहन विद्या के द्वारा विष का प्रतीकार (८. ५. १-१६/८. ६. १-४) पर राष्ट्र पर आक्रमण तथा इन्द्रशान्ति के निमित्त दर्भमणि का बांधना (१९. २८. १-१०/१९. २९. १-९/१९. ३०-१-५) पुष्टि की कामना करने वाले व्यक्ति को औदुम्बर मणि का बांधना (१९. ३१. १-४) मृत्यु के भय की निवृत्ति के लिये दर्भमणि का बांधना (१९. ३२. १-२/१९. ३३. १-५) इत्यादि सैकड़ों ओषधियों के निर्देश, भेद, प्रयोग तथा उपयोग आदि स्थान २ पर उपलब्ध होते हैं।
ब्राह्मण ग्रन्थों में भी निम्न वर्णन मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में-कहीं कहीं शरीर की उत्पत्ति तथा प्राण का उल्लेख, अश्वियों का देवताओं के वैद्य के रूप में निर्देश तथा ज्ञानेन्द्रियों का वर्णन (५. २२) ओषधियों का रोगों को दूर करना (३. ४०) अञ्जन के प्रयोग से नेत्ररोगों की निवृत्ति (१. ३) शाप के द्वारा भी उन्माद कुष्ठ आदि रोगों की उत्पत्ति, शुनःशेष की कथा में वरुण के कोप से जलोदर रोग का होना। छान्दोग्य में—हृदय नाड़ियों का वर्णन (८. १. ६) आहार के पचने की प्रक्रिया (६. ५) निद्रा तथा स्वप्न का उल्लेख (४. ३. ३) पामा रोग का वर्णन (४. १. ८) रोग को दूर करके एक सौ सोलह वर्ष की आयु की प्राप्ति के उपायों का उल्लेख (३. १६)।
बृहदारण्यक में—अश्व के अङ्गों (१. १. १) मनुष्य के अङ्गों (२. ४. ११) हृदय तथा उसकी नाडियों का वर्णन (२. १. १९/४. २. ३/४. ३. २०) मनुष्य तथा वृक्ष की तुलना (३. ९. २८) नेत्र की रचना (२. २. ३) मृत्यु का उल्लेख (३. २. ११) शाप के द्वारा रोगों की उत्पत्ति (३. ७. १/३. ९. २६)।
सामविधानब्राह्मण में—सर्पों से रक्षा (२. ३. ३)। भूतों का आक्रमण (२. २. २) रोगों का आक्रमण (२. २. ३)।
तैत्तिरीयारण्यक में—कृमियों का वर्णन (४. ३६. १)।
श्रौतग्रन्थों में—
आश्वलायन में—यज्ञाय पशुओं तथा ऋत्विगों में परिहरणीय रोगों का निर्देश। आपस्तम्ब में कृमियों का वर्णन (१५. १९. ५)।
गृह्य-ग्रन्थों में—
आश्वलायन में—सूर्योदय तथा सूर्योस्त के समय सोने में रोग का कारण (३. ७. १. २) यजमान में परिहरणीय रोग का उल्लेख (१. २३. २०) पशुओं के रोगों को दूर करना (४. ८. ४०)।
शाङ्खायन में—शारीरिक कष्ट के समय वेदमन्त्रों के गायन का निषेध (४. ७. ३६) आग्रहायण यज्ञ में भोज्यवस्तुओं में भूतों की निवृत्ति (३. ८) सब रोगों की निवृत्ति (५. ६. १-२)।
गोभिलीय सूत्र में—रोग निवर्तक मन्त्रों का उल्लेख (४. ६. २) सर्पदंश का उपाय (४. ९. १६)।
आपस्तम्ब में—रुग्ण स्त्री को पद्मपत्र आदियों के द्वारा अभिमन्त्रित करना (३. ९. १०) आधा सीसा) (Hemicronia) का कारणभूत कृमियों तथा बालकों में अपस्मार रोग के कारणभूत कुक्कुरभूत का निर्देश (७. १८. १) बालक में क्षेत्रिय रोग (सहज, पतृत-Congenital) का परिहार (६. १५. ४)।
पारस्कर गृह्य सूत्र में—मर्दन (मालिश) के द्वारा शिरःशूल का प्रतीकार (३-६)।
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हिरण्यकेशीय गृह्यसूत्र में—अग्नि का रोगनाशकत्व (१. २. २८) बालक के क्षेत्रीय रोग को दूर करना (२. ३. १०)।
खादिर गृह्य सूत्र में—कृमियों का वर्णन (४. ४. ३) गोरोग की निवृत्ति के लिये होम के धूम से युक्त प्रदेश में विचरण करना (४. ३. १३) सर्पदंश का उपाय (४. ४-१) इत्यादि आयुर्वेद संबन्धी विषय स्थान २ पर न्यूनाधिक रूप में उपलब्ध होते हैं।
वैदिक साहित्य में आयुर्वेद संबन्धी विषयों को लेकर ब्लूमफील्ड (M. Bloomfield), हिलब्राण्ड (A. Hillebrandt) केलेण्ड (Caland) डॉ. पी. कार्डियर (P. Cordier), जॉली (J. Jolly), बोलिङ्ग (G. M. Bolling) झीमर (Zimmer) इत्यादि पाश्चात्य विद्वानों तथा कुछ भारतीय विद्वानों ने भी बहुत कुछ लिखा है। इन सबके विषय में विमर्श करना उपयोगी होने पर भी अब हम विस्तार के भय से इसे यहीं समाप्त करते हैं।
कौशिक सूत्रकार के उन २ मन्त्रों के विनियोग के दिखाने में उस-उस मन्त्र की महिमा को दिखाते हुए ४ थे अध्याय में 'अथ भैषज्यानि' इत्यादि से प्रारंभ करके उस-उस रोग के प्रतीकार के लिये उन-उन मन्त्रों द्वारा मन्त्रित करके जल, ओषधि आदि का पिलाना तथा हवन मार्जन आदि बहुत से उपाय दिये हैं। मन्त्रसंहिता को लेकर बने हुए कौशिकसूत्र में ये मान्त्रिक विधान भी भरे हो सकते हैं परन्तु वातिक तक्म रोग में मांस तथा भेद का पिलाना, श्लैष्मिक में मधु का पान, वातपित्तज में तैलपान, धनुर्वात, अङ्गकम्प, शरीरभङ्ग आदि वातरोगों में घृत का नस्य, रक्त के बहने तथा स्त्रियों की अतिरजःप्रवृत्ति में सूखे कीचड़ की मिट्टी को घोलकर पिलाना, हृद्रोग तथा कामला में रोगी को हरिद्रा तथा ओदन खिलाना, श्वेत कुष्ठ में खूब लाल कुष्ठ को गोबर के साथ घिसकर भृङ्गराज, हरिद्रा, इन्द्रवारुणी तथा नीलिका के फूलों को पीसकर लेप करना, वातविकार में पिप्पली का सेवन, शस्त्र की चोट लगकर रक्तप्रवाह होने पर उस स्थान पर पकाये हुए लाख के पानी द्वारा सिञ्चन करना, राजयक्ष्मा, कुष्ठ, शिरोरोग तथा सारे शरीर की वेदना में मक्खन में कूठ को मिलाकर रोगी के शरीर पर लेप करना, शस्त्र की चोट लगने पर पकाये हुए दूध में लाक्षा डालकर पिलाना, गण्डमाला में शङ्ख को घिसकर लेप करना, जलौका द्वारा रक्त का निकालना, सेन्धा नमक का चूर्ण छिड़कना (Dusting) व्रण में गोमूत्र का उपयोग, मूत्र तथा मल के रुक जाने पर हरीतकी आदि भेदनीय (Lexatws) द्रव्य का बांधना, आखु किरि पूतीक मथित जरन प्रमन्द तथा स्त्रावस्क आदि ओषधियों को जल में घोलकर पिलाना, घोड़े आदि पर चढ़ना, बाण का छोड़ना, गोदोहनी में जल में २१ जौ डालकर शिश्न (Penis) को ऊपर करके उसमें वह जल डालना, लोहशलाका (Catheter or Sound) का डालना, जौ, गेहूँ, वल्ली, पद्मूल, तथा पाविका के क्वाथ रूप आलविसोल फाण्ट का पीना इत्यादि का वर्णन है। मन्त्रों द्वारा प्रतिष्ठापित (मन्त्रित), शान्त्युदक में भी शमी, शाम, काश, वंशा, शाम्य, बाका, तलाशा, पलाश, वासा, शिंपा, शिम्बल, सिपुन, दर्भ, अपामार्ग, कृति, लोष्ठ, वल्मीक वपा, दूर्वाप्रान्त, ब्रीहि, यव आदि शान्त ओषधियों को डाल कर तैयार किये हुए उस जल को भैषज्य के रूप में बहुत से रोगों का नाशक बताया है। इस प्रकार मान्त्रिक प्रक्रिया की तरह ओषधि विद्या में भी कौशिक सूत्रकार का अथर्ववेद से संबन्ध प्रतीत होता है।
प्राचीन काल में शारीरिक धातुओं की विषमता के समान राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, ग्रह, स्कन्द, रुद्र आदि देवताओं का कोप आदि भी रोग के कारण माने जाते थे जैसा कि 'रक्षोहाऽमीबचातन:' इत्यादि मन्त्रांश द्वारा रोग को दूर करने के लिये उस-उस रोग के निदानभूत राक्षस प्रभृति को दूर करना उपाय रूप से निर्दिष्ट है। पाश्चात्य चिकित्सा ग्रन्थों में भी उन्माद, अपस्मार आदि रोगों में भूत आदियों का निदान रूप में वर्णन मिलता है। इसी दृष्टि से वैदिक समय में भी कौशिक सूत्र आदियों में उस-उस रोग के निदान भूत राक्षस आदियों को दूर करने के लिये आथर्वण मन्त्रों का प्रयोग किया गया है। किसी-किसी का ऐसा भी विचार है कि अथर्व आदि मन्त्रोंमें उस-उस रोग के कारण भूत जो नाना प्रकार
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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के कृमियों का उल्लेख है वह भी रोगों के कारणभूत राक्षस आदि परक की जानना चाहिये। वे रोगों के जीवाणु (Germs) अथवा राक्षसभूत आदि दोनों ही संभव हैं। ग्रन्थकारों ने तीन सिर, तीन पैर, तथा लाल आँखों वाली ज्वर आदि रोगों की जो मूर्तियाँ (चित्र) बनाई हैं वे भी उन-उन रोगों के निदानभूत राक्षस आदि या रोगों के जीवाणुओं की आकृति की कल्पना द्वारा ही बनाई गई प्रतीत होती हैं। आजकल सूक्ष्मवीक्षणयन्त्र (Microscope) द्वारा देखने पर उन-उन रोगों में भिन्न-भिन्न तथा विचित्र आकृति वाले जीवाणु मिलते हैं। इन्हीं भीषण आकृति वाले जीवाणुओं का ही अन्तर्दृष्टि वाले प्राचीन ऋषियों ने संभवतः राक्षस रूप में वर्णन किया हो। आजकल भी पहाड़ी जाति में ज्वर आदि को भूत आदियों से उत्पन्न हुआ मानकर अपमार्जन (झाड़ना-फूकना), दूसरे प्राणियों में संक्रामण, तथा बलि देना आदि मान्त्रिक उपचार प्रायः किये जाने हैं तथा सफल भी होते देखे जाते हैं। आजकल कहीं-कहीं व्यवहार में दिखाई देने वाले ऐसे उपाय एकदम निर्मूल नहीं हैं अपितु प्राचीन वैदिक अवस्था से ही प्रारंभ होकर टूटी फूटी अवस्था में किसी न किसी रूप में आजतक भी प्रचलित हुए समझना चाहिये। इस प्रकार की मान्त्रिक प्रक्रिया से युक्त भैषज्य प्रक्रिया न केवल प्राचीन भारत में ही थी अपितु प्राचीन मिश्र, पाश्चात्य देश तथा उत्तरी अमेरिका के देशों में भी थी जैसा कि उन-उन देशों के प्राचीन इतिहास के अनुसन्धान से स्पष्ट है।
कुछ लोगों का जो यह विचार है कि आथर्वण सम्प्रदाय में केवल मान्त्रिक भूत विद्या ही रोगों को दूर करने का उपाय था, यह सर्वांश में सत्य नहीं है। वैदिक समय में मिथ्याहार-विहार के समान पाप, भूतप्रेत आदि रोगों के हेतु रूप से तथा रुद्र आदि देवताओं का कोप एवं ओषधियों के प्रयोग के समान उस-उस देवता का आराधन करके उसे प्रसन्न करना, विशेष-विशेष मन्त्रों द्वारा भूत आदियों को दूर करने के लिये रोगियों का मार्जन, जलाभिषेचन, अभिमन्त्रण, धूपन आदि रोगों को दूर करने के उपाय यद्यपि मिलते हैं तथापि पूर्वोक्तानुसार बहुत से रोग, शल्यप्रक्रियायें, बहुत से शारीरिक अवयव, उस-उस रोग को दूर करने वाली अनेक ओषधियों का मन्त्रों में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलने से यह कहा जा सकता है कि मन्त्रविद्या के समान भैषज्यप्रक्रिया में भी आथर्वणी प्रवृत्ति विद्यमान थी। इस प्रकार प्राचीन लोग मन्त्रविद्या तथा औषधविद्या दोनों ही मार्गों का अनुसरण करते थे। परन्तु आथर्वण सूक्तों के मन्त्रों में से कुछ मन्त्रों का शब्दार्थ करते हुए उनके भूतविद्या से रहित आयुर्वेदीय विषयों के प्रतिपादक दिखाई देने पर भी गृह्यकार आदि के द्वारा जल के प्रतिपादक 'शन्नो देवी' इत्यादि मन्त्रों का शनिग्रहादि परक अर्थ करने के समान ही कौशिक सूत्रकार द्वारा अभिचार (हिंसाकर्म), मन्त्रकरण्डबन्धन (रक्षासूत्र का बांधना) तथा भूतापसारण परक आदि अर्थ किया जाना कालक्रमागत दृष्टि भेद को प्रकट करता है।
ऋक संहिता में अल्प मात्रा में आई हुई मान्त्रिक उपचार प्रक्रिया तथा भैषज्य विद्या की अथर्ववेद में अधिकता दिखाई देने से विकास प्रतीत होता है। उसके बाद शुद्धरूप से भैषज्य का निर्देश करने वाले मन्त्रों का भी कौशिकसूत्रकार ने मान्त्रिक प्रक्रिया परक अर्थ लगाया है। इससे प्रतीत होता है कि सूत्रकाल में मान्त्रिक प्रक्रिया का विशेष विकास हुआ था। इस प्रकार क्रमिक विकासपरम्परा समाप्त हो जाती है। अथवा भूतविद्या का आचार्य था ऐसी भी श्रुति है। इसीलिये अथर्ववेद में भूतविद्या तथा मन्त्र विद्या के विषय विशेषरूप से सम्मिलित हैं। इस कौमारभृत्य तन्त्र में बालरोगों में स्कन्द, अपस्मार ग्रह, पूतना आदि को निदान रूप से तथा धूपन, पूजन आदि को रोग-प्रतीकार रूप से देने के समान ही धातुविषमता को रोग के हेतु रूप तथा उन-उन ओषधियों का उस-उस रोग को दूर करने में उपयोग दिया होने से प्रतीत होता है कि पूर्वकाल में दोनों प्रक्रियाएँ विद्यमान थीं।
वैदिक साहित्य में बहुत से वैद्यक के विषयों के मिलने पर भी पूर्वोक्तानुसार ऋग्वेद में अश्वियों द्वारा नाना चमत्कार रूप भैषज्य विषयों का केवल ऐतिहासिक रूप से ही वर्णन मिलता है। किस रीति से अश्वियों ने विश्पला की जङ्घा जोड़ी,
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ऋज्राश्व की आंखें ठीक की, श्रोण के जानुओं को क्रियाशील बनाया-इत्यादि के विशेष विधान का इससे ज्ञान नहीं होता। कहीं-कहीं किन्हीं ओषधियों का वर्णन है परन्तु वहां उनकी उपयोग विधि नहीं दी है। अथर्ववेद में यद्यपि नाना रोग, औषध, रोगों के कारण, कृमि आदि, अमुक ओषधि के सेवन से अमुक रोग का प्रतीकार इत्यादि विषय भी मन्त्रों में मिलते हैं परन्तु उनसे भी उनकी उपयोग की विधि मालूम नहीं होती। इस प्रकार उन मन्त्रों से केवल तात्कालिक आयुर्वेद विज्ञान की स्थिति सूचित होती है।
'यत्रौषधीः समग्मत राजानः समिताविव । विप्रः स उच्यते भिषग्रक्षोहामीव चातनः' ।।
(ऋक् १०. ९७. ६)
शतं ह्यस्य भिषजः सहस्रमुर्वी गभीरा सुमतिस्तेऽस्तु ।। (ऋक्. १. २४. ९)
शतं ह्यस्य भिषजः सहस्रमुत वीरुधः ।। (अथर्व २. ९. ३)
इत्यादि मन्त्रों से प्रतीत होता है कि सैकड़ों ओषधियों के संग्रहकर्ता विप्र भिषक् (वैद्य) होते थे। वैद्य भी न केवल एक दो थे अपितु सैकड़ों की संख्या में थे। ओषधिरूप से ज्ञात लता वनस्पतियां आदि भी स्वल्प नहीं थीं अपितु हजारों की संख्या में थीं। इनसे ज्ञात होता है कि इस विज्ञान के ज्ञाता सैकड़ों महर्षियों द्वारा प्रतिपादित, सम्पूर्णरूप से व्यवहृत, तथा श्रृंखलारूप में विद्यमान सम्पूर्ण ओषधियों से युक्त यह आयुर्वेद एक पृथक् ग्रन्थ के रूप में विद्यमान था। क्योंकि ज्ञातव्य विषयों की सूचना तथा उनके उपयोग से होने वाले लाभों का निर्देश वेदों में स्थान-स्थान पर विकीर्णरूप में (Scattereb) हमें मिलता है। वेद शब्द से समष्टि रूप में विद्यमान आदिम ज्ञान का बोध होता है तथा उसकी समीपता वाले व्यक्ति विशेष का ज्ञान उपवेद शब्द से सूचित होता है। गान्धर्व, धानुष्य, स्थापत्य आदि के ज्ञान की तरह व्यष्टि रूप से विद्यमान आयु की रक्षा का ज्ञान आयुर्वेद शब्द से ध्वनित होता है। यह प्राचीन आयुर्वेद ब्रह्मा, अश्वि तथा इन्द्र की संहिता रूप से पृथक् रूप में ही विद्यमान होगा। इसी कारण कुछ आचार्यों ने इसे जो उपवेद रूप से लिखा है तथा कश्यपाचार्य ने इसका पांचवें वेद के रूप में निर्देश किया है वह ठीक ही है। परन्तु कालव्यतिक्रम से वह प्राचीन तथा मूलभूत आयुर्वेद आजकल पृथक् रूप से नहीं मिलता है। केवल वैदिक संहिताओं में कहीं-कहीं विकीर्णरूप से अथवा सम्प्रदाय परम्परा द्वारा किसी-किसी ऋषि की लेखबद्ध रचना द्वारा ही मिलता है।
उपलब्ध प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रन्थों तथा वैदिक संहिता ग्रन्थों में आये हुए आयुर्वेद के विषयों का विचार करने पर रोगों के नाम, ओषधियों के नाम, उनके उपयोग तथा निरूपण शैली आदि में बहुत ही भेद दिखाई देता है। वैदिक विषयों की अपेक्षा आर्षसंहिता ग्रन्थों के विषयों में क्रमागत विकसितावस्था भी विशेषरूप से दिखाई देती है। भाषाशास्त्र की दृष्टि से भी इस प्रकार का अन्तर थोड़े समय के व्यवधान से संभव नहीं है। लेख तथा भाषा की शैली में जितना अन्तर प्राचीन सूत्र आदि ग्रन्थों, दो हजार वर्ष पूर्व के कवियों की रचनाओं, बौद्ध-साहित्य तथा काश्यप, आत्रेय, धन्वन्तरि आदि महर्षियों के लेखों का आधुनिक लेखों से है उससे भी अधिक अन्तर वैदिक संहिताओं तथा आर्षसंहिताओं में आये हुए आयुर्वेद के विषय में है। यह अन्तर (भेद) बहुत लम्बे समय के व्यवधान के विना संभव नहीं है। प्रत्येक साहित्य में विज्ञान का विकास क्रमिक ही हुआ करता है। आयुर्वेद विज्ञान के विषय में भी वैदिक साहित्य की अपेक्षा आर्षसंहिता के साहित्य का विकास बहुत लम्बा कालक्रमागत पूर्व परम्परा की अपेक्षा रखता है। वैदिक साहित्य के बाद ब्राह्मण, उपनिषद्, कल्प, सूत्र रूपी धाराओं में विरलरूप से बहता हुआ आयुर्वेद विज्ञान का प्रवाह अपनी-अपनी आचार्य परम्परा के बिना प्राचीन आर्ष संहिता ग्रन्थों में उस ज्ञानोदधि को किस प्रकार प्रकट कर सकता है। इसलिये स्थान-स्थान पर पूर्वाचार्यों द्वारा निर्दिष्ट, नाममात्र शेष तथा जिनके नाम भी लुप्त हो चुके हैं ऐसे प्राचीन आचार्यों की उपदेशरूपी विज्ञान परम्परा ही आयुर्वेद विज्ञानप्रवाह में वैदिक साहित्य एवं आर्षसंहिता की मिलाने वाले सेतु (Connecting link) के रूप में कार्य कर रही
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८१
है। यह अदृश्य सेतुभूत परम्परा भी अन्ततोगत्वा कम से कम हजार दो हजार वर्ष से कम नहीं हो सकती। ‘विविधानि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके’ के द्वारा भगवान् आत्रेय भी अपने समय में प्रचलित अन्य आचार्यों के शास्त्रों का उल्लेख करता है। इसप्रकार आत्रेय आदि से पूर्व भी अन्य आचार्यों का होना स्पष्ट है। यहां यह भी विचारणीय विषय है कि वैदिक आयुर्वेद विज्ञान में शल्यप्रक्रिया तथा अन्य शारीरिक आदि विभागों के संबन्ध में भी अत्यन्त सूक्ष्म विचार आये हुए हैं। ओषधिविभाग (Medical side) को देखने पर उसमें हमें धातु, रत्न, रस आदि का उल्लेख नहीं मिलता है। केवल वनस्पति आदि साधारण ओषधियां (Herbal drugs) ही प्रयुक्त की जाती हुई दिखाई देती हैं। तथा वे जङ्गिड, कुष्ठ, रोहिणी अपामार्ग आदि वनस्पतियां भी उस-उस रोग में केवल पृथक्-पृथक् ही व्यवहृत हुई मिलती हैं। कौशिक-सूत्रकार ने भी लगभग उसी प्रकार से मधु, तैल, घृत, पिप्पली, काष्ठ आदि वस्तुओं का अमुक-अमुक २ रोग में पृथक्-पृथक् व्यवहार किया है। आलविसोलफाण्ट-भृङ्गराज आदि पुष्पों के रस का लेप, नवनीत (मक्खन) मिले हुए कुष्ठ का प्रलेप (Paste) तथा पकाये हुए दूध और लाक्षा का पीना-इत्यादि दो तीन वस्तुओं के मिले हुए योग कहीं-कहीं ही दिये हैं। अमुक-अमुक रोग तथा अमुक-अमुक दोषहर वस्तुओं के ठीक-ठीक ज्ञान हो जाने पर उनके परिहार के उपाय यथासमय स्वयं विचारे जा सकते हैं। इसी को दृष्टि में रखते हुए मूल परिभाषा रूप में ज्ञातव्य शास्त्रों के विषयों को लेकर वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक तथा जीवनीय, बृंहणीय, तर्पणीय, संशमनीय एवं वृष्य आदि वर्गानुसार ओषधियों को विभक्त करके तथा रोगों के प्रतीकार के मूलभूत उपाय पञ्चकर्म आदि प्रधान विषयों को संगृहीत करके भिन्न-भिन्न संहिताओं के रचयिताओं ने सबसे पूर्व सूत्रस्थान को बनाया। उतने को ही ठीक-ठीक जानकर उनसे कल्पित योगों के द्वारा रोग दूर किये जा सकते हैं इस लिये सूत्रस्थान मात्र भी ओषधियों के लिये पर्याप्त है, यह कहा जा सकता है। आजकल भी गांवों तथा पहाड़ों में भिन्न-भिन्न रोगों में केवल एक दो वनस्पतियों का प्रयोग किया जाता हुआ उसी प्राचीन मौलिक प्रक्रिया को सूचित करता है। इसके बाद धीरे-धीरे ज्यों-ज्यों वस्तुओं के गुणों तथा दोषों का अनुभव बढ़ता गया तथा रोग भी क्लिष्ट (कई दोषों से युक्त) होते गये त्यों-त्यों २ एक ही योग द्वारा सब दोषों को दूर करने की इच्छा से समान एवं विशेष गुण वाली ओषधियों को मिलाकर सामूहिक योग बनाकर प्रयोग करने की विधि प्रचलित हुई। ज्यों-ज्यों प्राणिसमूह की वृद्धि, देश-काल-जल-वायु-अन्न-पान-स्थान-अवस्था आदि में परिवर्तन, व्यक्तियों में परस्पर सम्पर्क एवं संघर्ष का उदय, तथा नाना रोग स्वरूप बाह्य एवं आभ्यन्तर शारीरिक विकार उत्पन्न होते गये, त्यों-त्यों क्रम से उस-उस रोग तथा उसकी निवृत्ति के उपायों के ज्ञात होने पर तथा परिस्थिति के अनुसार वही रोग अनेक रूपों में दिखाई देता हुआ नये रूप तथा नये नाम द्वारा प्रकट होने लगा। तथा उसी के अनुसार उन-उन दोषों को दूर करने के लिये वस्तुओं को मिलाकर सामूहिक रूप में योग बनने लगे होंगे। फिर ऋषियों ने इन पूर्वकल्पित तथा अपने विशुद्ध अन्तःकरणों में प्रस्फुरित योगौषधियों को मिलाकर सूत्र-स्थान में आये हुए विषयों को अपने विचारों द्वारा बढ़ाकर सूत्रस्थान के अनुसार ही अन्य स्थानों को जोड़कर इसे पूरी संहिता का रूप दिया होगा। इसके बाद उत्तरोत्तर अन्य विद्वानों ने पूर्वापर अनुभवों से सिद्ध रोगों तथा उनके प्रतिकारों के उपायों को लेकर देश-काल तथा परिस्थिति के अनुसार अन्य अनेक आयुर्वेद के ग्रन्थ बनाये। इस प्रकार नाना द्रव्यों के योग (समूह) से बनी हुई ओषधियों के प्रयोग की पद्धति भी अर्वाचीन नहीं है। हार्नले द्वारा निर्दिष्ट, श्टाइन द्वारा पूर्व टर्की स्थित तूह्नाडु (Tun Huang-चीन की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित) नामक स्थान में प्राप्त प्राचीन पुस्तक के प्राचीन ईरानी भाषा के अनुवाद के साथ जो मूल संस्कृत का लेख है उसमें भगवान् बुद्ध द्वारा जीवक को संबोधित करके उपदिष्ट ओषधियों का वर्णन मिलता है। महावग्ग में निर्दिष्ट जीवक के साहचर्य से बुद्ध के इस उपदेश में नाना ओषधियों के योग से बनी हुई ओषधियों का उल्लेख होने से नाना द्रव्यों के योग से बनी ओषधियों का प्रचार भी बुद्ध के समय से पहले से विद्यमान था ऐसा अन्य ग्रन्थों से भी प्रतीत होता है। पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति में भी दूर करने
१. आर. जी. भण्डारकर कमोरेशन भाग १ पृ. ४१६
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योग्य दोष के अनुसार अमुक गुण एवं दोष वाली वस्तुओं को उपयोग के समय मिलाकर व्यवहार करने की प्रक्रिया के प्राचीन समय में होने पर भी आजकल अनेक मिले हुए दोषों वाले रोगों को दूर करने के लिये मिली हुई ओषधियों द्वारा पेटेन्ट ओषधियां भी बनती हैं तथा उन्हें नुस्खे या फार्मूले के रूप में प्रकाशित भी किया जाता है। पूर्वापर स्थानभेद से संक्षेप एवं विस्ताररूप से अपने ज्ञातव्य विषय का ठीक-ठीक ज्ञान कराने वाली संहिताओं तथा वर्तमान निबन्धों द्वारा विशद किया हुआ भी यह चिकित्सा विज्ञान केवल दिग्दर्शन मात्र के लिये ही है। सब लोगों की शारीरिक तथा प्राकृतिक परिस्थिति सदा एक जैसी नहीं रहती। एक ही रोग प्रत्येक व्यक्ति तथा उसकी प्रकृति के भेद से विभक्त होकर अनेक रूपों वाला हो जाता है। ज्यों-ज्यों देश, काल, जल-वायु, आहार-विहार आदि की परिस्थिति के भेद से तथा दोषों के संयोग से नाना रूपों में रोग बढ़ते हैं तथा नये-नये रूप धारण करते हैं त्यों-त्यों देश-काल आदि के अनुसार ओषधियों के आवापोद्वाप, मान में गुरु एवं लघु का अन्तर तथा रचना के पौर्वापर्यक्रम को करके नये-नये रोगों के प्रतिकार के उपाय तथा अनुभवसिद्ध ओषधियों को लेकर प्राचीन आयुर्वेद विज्ञान के कोश को सुरक्षित रखने तथा बढ़ाने की आवश्यकता है।
(२) ग्रन्थ परिचय सहित आचार्यों का विवरण
आयुर्वेद का प्रकाश तथा आचार्य—उत्पन्न हुए प्राणियों की स्वास्थ्यरक्षा की दृष्टि से सृष्टि के प्रारम्भ में स्वयंभू ब्रह्मा ने ही संहितारूप से आयुर्वेद को प्रकाशित^१ किया। वह आयुर्वेद अश्विनीकुमार तथा इन्द्र आदि द्वारा ऋषियों को प्राप्त होकर उनके द्वारा लोक में प्रचलित हुआ, आयुर्वेद के आचार्य इसका ऐसा इतिहास बतलाते हैं। अस्तु, चाहे यह आयुर्वेद ब्रह्मा से प्रारम्भ हुआ हो, चाहे देवताओं द्वारा उपदिष्ट हो और चाहे यह ऋषिवर्ग द्वारा प्रकाशित हो, इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसका प्रादुर्भाव प्रत्येक अवस्था में प्राचीन ही है। आयुर्वेद के मूलग्रन्थों से निम्न सम्प्रदाय क्रम मिलता है—
ब्रह्मा
दक्ष
अश्विनीकुमार
इन्द्र
| (सुश्रुत संहिता के अनुसार) | (काश्यप संहिता के अनुसार) | (चरक संहिता के अनुसार) |
|---|---|---|
| धन्वन्तरि | कश्यप वसिष्ठ अत्रि भृगु | भरद्वाज |
| दिवोदास | इनके पुत्र तथा शिष्य | आत्रेय पुनर्वसु |
| सुश्रुत औपधेनव वैतरण | अग्निवेश भेड जतूकर्ण पराशर | |
| औरभ्र पौष्कलावत करवीर्य | हारीत क्षारपाणि आदि | |
| गोपुर रक्षित भोज आदि |
इस काश्यपसंहिता की उपदेश-परम्परा के वर्णन में 'स्वयम्भूर्ब्रह्माऽऽयुर्वेदमग्रेऽसृजत्, ततश्च तं पुण्यमायुर्वेदमश्विभ्यां कः प्रददौ, ताविन्द्राय, इन्द्र ऋषिभ्यश्चतुर्भ्यः कश्यपवसिष्ठात्रिभृगुभ्यः, ते पुत्रेभ्यः शिष्येभ्यश्च प्रददुर्हितार्थम् (पृ. ६१), इस लेख के द्वारा इन्द्र से साक्षात् हीं कश्यप आदि प्राचीन ऋषियों ने यह विद्या प्राप्त की ऐसा प्रतीत होता है। चरक के
१. (क) स्वयम्भूर्ब्रह्मा प्रजाः सिसृक्षुः प्रजानां परिपालनार्थमायुर्वेदमेवाग्रेऽसृजत्। (काश्यपसंहितायां पृ. ६१)
(ख) इह खल्वायुर्वेदमष्टाङ्गमपाङ्गमथर्ववेदस्यानुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्त्रं च कृतवान् स्वयम्भूः। (सुश्रुते सू. अ. १)
(ग) ब्रह्मणा हि यथाप्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः। (चरके सू. अ. १)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८३
प्रारम्भ में रोगों से दुःखी हुए प्राणियों की रोगमुक्ति के उपाय को ढूंढने की इच्छा से समवेत हुए महर्षियों की प्रेरणा से इन्द्र के पास जाकर उससे आयुर्वेद विद्या को प्राप्त कर लौटे हुए भरद्वाज द्वारा महर्षियों को इसका उपदेश देने के निर्देश से प्रतीत होता है कि इन्द्र द्वारा उपदिष्ट भरद्वाज से ही ऋषियों को यह विद्या प्राप्त हुई। भरद्वाज आयुर्वेद विद्या का कोई प्राचीन आचार्य था ऐसा 'ज्वरसमुच्चय' में आये हुए वचनों से भी ज्ञात होता है। महाभारत में भी वैद्याचार्य भरद्वाज का निर्देश है। चरकसंहिता के उपक्रम तथा उत्तर भाग में भरद्वाज का दो प्रकार से उल्लेख किया गया है। वातकलाकलीय (च.सू.अ. १२) तथा आत्रेयभद्रकाप्यीय (च.सू.अ. २६) अध्यायों में कुमारशिरा भरद्वाज का मत दिया हुआ है। इस विशेषण से युक्त दिया होने के कारण यह भरद्वाज कोई अन्य ही प्रतीत होता है। इसके मत का आत्रेय ने खण्डन भी किया है। यज्जः पुरुषीय (च. सू. अ. २५) तथा खुड्डीका-गर्भावक्रान्ति (च. शा. अ. ३) अध्याय में विशेषण रहित भरद्वाज का मत दिया है। वहां भी भरद्वाज के मत का आत्रेय ने खण्डन ही किया है। तथा उसके बाद अपने मत का खण्डन होने पर जिज्ञासा द्वारा पूछने पर आत्रेय ने उसका विशेष विवरण दिया है। इस प्रकार का निर्देश होने से भरद्वाज इसका गुरु प्रतीत नहीं होता है। वातकलाकलीय अध्याय में भरद्वाज का कुमारशिरा यह विशेषण आत्रेय के गुरु भरद्वाज के निराकरण के लिये कहा है तथा 'खुड्डीकागर्भावक्रान्ति' अध्याय में भरद्वाज शब्द से यहां आत्रेय के गुरु का बोध नहीं है अपितु अन्य ही कोई भरद्वाज गोत्र वाला प्रतीत होता है, इस प्रकार लिख कर टीकाकार चक्रपाणि ने स्पष्ट रूप से बतलाया है कि उपर्युक्त दोनों स्थलों पर आया हुआ भरद्वाज आत्रेय का गुरु नहीं है चक्रपाणि की उक्ति के अनुसार संभवतः गोत्रवाचक कई भरद्वाजों के संभव होने पर अत्रि परम्परागत किसी आत्रेय ने किसी भरद्वाज से इस विद्या को ग्रहण किया हो परन्तु आत्रेय संहिता में कहीं भी भरद्वाज से उपदेश ग्रहण, उसका सम्मान तथा उसके मत की प्रतिष्ठा को दिखाने वाले संकेतों के न मिलने से मन में सन्देह उत्पन्न होता है। इस प्रकार आत्रेय का गुरु भरद्वाज कौन है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। काश्यपसंहिता के रोगाध्याय में केवल कृष्ण भरद्वाज का उल्लेख है। यह भी विशेषणयुक्त कोई विभिन्न ही भरद्वाज प्रतीत होता है। काश्यपसंहिता के आयुर्वेदाध्ययन प्रकरण में प्रजापति, अश्वि, इन्द्र तथा सब विद्याओं के आचार्य परम पुरुष धन्वन्तरि के साथ अपने ग्रन्थ के मूल आचार्य कश्यप का भी स्वाहाकार देवताओं में जिस प्रकार निर्देश किया गया है, उसी प्रकार आत्रेयसंहिता (चरक. वि. अ. ८) में भी प्रजापति, अश्वि, इन्द्र तथा धन्वन्तरि के ही केवल स्वाहाकार का उल्लेख है। वहां 'सूत्रकारिणामृषीणाम्' इस सामान्य उल्लेख द्वारा यद्यपि भरद्वाज का ग्रहण भी हो सकता है परन्तु अपने ही ग्रन्थ में इन्द्र के बाद परम्परागत आचार्य एवं अपने ही गुरु रूप से निर्दिष्ट भरद्वाज के नाम तक का निर्देश न करना उचित प्रतीत नहीं होता है। जिस प्रकार काश्यप संहिता में कश्यप, वसिष्ठ, अत्रि तथा भृगु का इन्द्र से साक्षात् औपदेशिक सम्बन्ध दिखाया है, उसी प्रकार आत्रेयसंहिता के रसायनपाद में (च. चि. अ. १) भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, अङ्गिरा, अगस्त्य, पुलस्त्य, वामदेव, असित तथा गौतम आदि का इन्द्र द्वारा साक्षात् रसायन का उपदेश प्रदर्शित किया हैं। इसमें भी कहीं भरद्वाज का उल्लेख नहीं है। चरक के उपक्रम ग्रन्थ में मिलने वाले महर्षियों के समवाय में बहुत समय के पौर्वापर्य वाले आचार्यों का भी निर्देश होने से तथा उत्तरतन्त्र के समान लेख की प्रौढ़ता भी न दीखने से कुछ सन्देह उत्पन्न होता है। इस प्रकार चरक के उपक्रम में भरद्वाज द्वारा ही महर्षियों की जो विद्याप्राप्ति का निर्देश किया गया है उसका क्या तात्पर्य है यह नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार अनुसन्धान करने पर कश्यप, वसिष्ठ, अत्रि, भृगु, आदि महर्षियों द्वारा ही अति प्राचीन काल से अपने पुत्र एवं शिष्यसन्तति में आयुर्वेद विद्या का प्रचलन किया गया प्रतीत होता है। इसीलिये आत्रेय आदि शब्दों के गोत्रवाचक होने से आत्रेय परम्परा में चरक संहिता का मूल आचार्य आत्रेय पुनर्वसु, कृष्ण आत्रेय, भिक्षु आत्रेय आदि कई देखने में आते हैं। कश्यप परम्परा में भी कश्यप, वृद्ध काश्यप आदि बहुत से आचार्य मिलते हैं। एक आचार्य की गोत्र परम्परा में आया हुआ कोई व्यक्ति विशेष ज्ञान के लिए दूसरे आचार्य से भी विद्या ग्रहण कर सकता है। इस प्रकार चरक के उपक्रम के अनुसार अपनी पूर्व परम्परा से विद्या प्राप्त करके आत्रेय पुनर्वसु द्वारा भरद्वाज
१३ का.सं.
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से भी किसी विशेष विद्या का ग्रहण किया जाना सम्भव है। जिस प्रकार भृगु परम्परागत जीवक का मारीचकश्यप द्वारा भी विद्या ग्रहण किये जाने का निर्देश इस संहिता में भी मिलता है। महाभारत में यद्यपि भरद्वाज द्वारा धन्वन्तरि को विद्या की प्राप्ति तथा दिवोदास का भरद्वाज के आश्रम में जाने का उल्लेख मिलता है तथापि सुश्रुतसंहिता के अनुसार धन्वन्तरि दिवोदास का साक्षात् इन्द्र द्वारा ही विद्या-प्राप्ति का वर्णन मिलता है। परन्तु सब में इन्द्र को परम आचार्य होने से साक्षात् अथवा परम्परा द्वारा मूल उपदेष्टा स्वीकार किया गया है। इन धन्वन्तरि, मारीच कश्यप, आत्रेय पुनर्वसु आदि ऋषियों ने लोकोपकार के लिये इस विज्ञान का संहिता रूप से अपने शिष्यों को उपदेश किया। इस प्रकार वैदिक विज्ञान रूपी भूमिका में ब्रह्मा के विज्ञान सम्बन्धी बीज को लेकर उत्पन्न हुआ तथा अश्वि, इन्द्र, कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, भृगु आदि परम्परा तथा धन्वन्तरि, आत्रेय, कश्यप आदि अन्य पूर्वाचार्यों द्वारा प्रयत्न पूर्वक प्रत्येक शाखा का परिष्कार करके पल्लवित, पुष्पित, एवं फलित किया गया यह प्राचीन आयुर्वेदरूपी कल्पवृक्ष काल के ग्रास से बचे हुए कुछ फलों से शिष्य परम्परा द्वारा आज भी लोगों को जो जीवन दान कर रहा है यह भी सन्तोष का ही विषय है।
यद्यपि वैदिकसाहित्य में आयुर्वेद के आठ विभाग तथा उनके नामों का उल्लेख नहीं मिलता। तथा आत्रेय के लेखानुसार ब्राह्म विज्ञान (ब्रह्मा ने जब आयुर्वेद का उपदेश किया) के समय यह विज्ञान हेतु¹ (Cause), लिङ्ग (Symptoms) तथा औषध (Treatment) के ज्ञानवाला त्रिसूत्र रूप में ही था। इस प्रकार वैदिक आयुर्वेद विज्ञान प्राचीनकाल में त्रिस्कन्धात्मक ही प्रतीत होता है। तथापि वैदिक आयुर्वेद के विषयों के संग्रह तथा पूर्वोक्तानुसार अश्वियों के वर्णन में जङ्घा का जोड़ना, टुकड़े किये हुये शरीर का सन्धान, दृष्टि तथा श्रवण शक्ति का प्राप्त कराना, कुष्ठादि का निवारण, च्यवनरसायन, अपुत्रा के पुत्रोत्पादन आदि तथा इन्द्र की स्तुति में भी इसी प्रकार के नाना विषयों के मिलने से तथा ऋक्, यजु और अथर्ववेद आदि में अनेक प्रकार की भैषज्य, ओषधि विद्या, भूतविद्या तथा विषयपरिहार विद्या के स्थान-स्थान पर मिलने से शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, अगद, भूतविद्या, रसायन आदि आठों भागों के विषय पृथक्-पृथक् रूप में भी उस समय थे ऐसा प्रतीत होता है। भूतविद्या का आचार्य अथर्वा, महाभारत में आया हुआ अगद-तन्त्राचार्य काश्यप, कौमारभृत्याचार्य कश्यप, शालाक्याचार्य गार्ग्य एवं गालव तथा शल्याचार्य शौनकादि एक-एक प्रस्थान (विभाग) के आचार्य रूप में विद्यमान प्राचीन महर्षियों के उल्लेख मिलने से आयुर्वेद का आठ विभागों में विभक्त होना भी प्राचीन ही सिद्ध होता है। इसीसे एक-एक विभाग की विशिष्टता (Specialisation) के कारण कुछ महर्षियों की प्रसिद्धि हो गई। कोई-कोई सब विभागों (ज्ञानों) के सामूहिक रूप से भी ज्ञाता हो सकते हैं। जिस प्रकार ऋग्वेद की अपेक्षा अथर्ववेद में ओषधि, भैषज्य, भूतचातन, विषापहरण आदि विषय विकसित रूप में मिलते हैं उसी प्रकार उसका एक-एक अंश कालक्रम से विज्ञान द्वारा पुष्ट होकर ग्रहण, धारण तथा प्रयोग के सौकर्य की दृष्टि से पृथक्-पृथक् प्रस्थान (विज्ञान) रूप से विभागों में विभक्त हो गया। आर्ष समय में आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीनों प्रकार के दुःखों को पृथक्-पृथक् दूर करने के लिये अदृष्ट उपायों की तरह दृष्ट उपायों के भी क्रमशः विकसित होने से अथर्ववेद में होने वाले विकास को दृष्टि में रखते हुए निम्न आठ विभाग हो गये। शारीरभैषज्य में शरीरक्रिया की प्रधानता को लेकर शल्य, बहुत सी मुख्य इन्द्रियों की स्थिति के कारण प्रधान माने जाने वाले उत्तमाङ्ग (शिर) को लेकर शालाक्य, बल तथा वीर्य की वृद्धि संबन्धी वाजीकरण, वयःस्थापन रूप महाफल वाले तथा लम्बे विशेष प्रयोगों को लेकर रसायन, ऋतु, गर्भ तथा बालक की प्राथमिक अवस्था से संबनिधत कौमारभृत्य, इनसे भिन्न शारीरिक तथा मानसिक भैषज्यसंबन्धी कायचिकित्सा, बाह्य आगन्तुक विकार को शान्त करने तथा सांप, विच्छू आदि प्राणियों के विष विकार से संबन्धित अगदतन्त्र, भूतग्रहस्कन्द आदि देवताओं के विकारसंबन्धी भूतविद्या इत्यादि। इस प्रकार तीनो दुःखों के प्रत्येक विभाग
१. हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम् । त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं विबुधे यं पितामहः ॥
सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः । यथावद् चरात्सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ॥ (चरके सू. अ. १)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८५
को लेकर उस-उस के प्रतीकार की दृष्टि से आठ प्रस्थान (विभाग) विभक्त हुए प्रतीत होते हैं। प्राचीन आचार्यों में ब्रह्मा तथा इन्द्र सर्वप्रस्थानों (आठों विभागों) के आचार्य थे। महाभारत के अनुसार इन्द्र द्वारा उपदिष्ट भरद्वाज तथा हरिवंश पुराण के अनुसार भरद्वाज से तथा सुश्रुतसंहिता के अनुसार साक्षात् इन्द्र द्वारा उपदिष्ट धन्वन्तरि सर्वप्रस्थानों के आचार्य माने गये हैं। एक-एक विषय के अधिक विकसित हो जाने के कारण जिस प्रकार आजकल एक-एक अङ्ग की विशेष चिकित्सा द्वारा एक-एक विभाग के विशेषज्ञ (Specialist) होते हैं। उसी प्रकार उस-उस विषय में विशेष नैपुण्य प्राप्त करने तथा शिष्यों के ग्रहण एवं धारण के सौकर्य के लिए महाभारत के अनुसार भरद्वाज ने तथा हरि^१वंश के अनुसार धन्वन्तरि ने आयुर्वेद विज्ञान को आठ भागों में विभक्त करके तथा एक-एक विभाग को विकसित करके पृथक्-पृथक् शिष्यों को उपदेश दिया तथा उसका प्रचार किया। इससे प्रतीत होता है कि आठों प्रस्थान पृथक्-पृथक् प्रवाहरूप में लोक में प्रचलित थे। कायचिकित्सा संबन्धी आत्रेय संहिता में तथा कौमारभृत्य संबन्धी काश्यप संहिता में प्रजापति, इन्द्र आदि आचार्यों के साथ धन्वन्तरि का हौम्य देवरूप से निर्देश किया जाना तथा नाना प्रस्थानों में धान्वन्तर घृत आदि का विधान होना धन्वन्तरि का अष्टाङ्गविभागों का आचार्य होना सूचित करता है। न केवल मूलधन्वन्तरि अपितु उसके सम्प्रदाय वाला द्वितीय धन्वन्तरि दिवोदास भी 'आयुर्वेद के आठों अङ्गों में से किसका उपदेश करूं' इस प्रकार सुश्रुत से पूछकर इस प्रश्न के उत्तर में 'शल्यशास्त्र का उपदेश कीजिये' ऐसी सुश्रुत द्वारा प्रार्थना किये जाने पर उसे शल्यशास्त्र का उपदेश दिया। इस प्रकार सुश्रुतसंहिता के उपक्रम के लेख द्वारा तथा पीछे अपने मुंह^२ से भी अष्टाङ्ग आयुर्वेद का ज्ञाता होना स्वीकार करने से भी अष्टाङ्ग विभाग का आचार्य होना सिद्ध होता है। अष्टाङ्ग के ज्ञाता भरद्वाज या इन्द्र द्वारा उपदिष्ट आत्रेय पुनर्वसु के अग्निवेश आदि ६ शिष्यों द्वारा पृथक्-पृथक् तन्त्रों के निर्माण के उल्लेख से तथा धन्वन्तरि दिवोदास से शल्यशास्त्र का उपदेश लेकर सुश्रुत द्वारा सुश्रुतसंहिता के निर्माण के उल्लेख से यद्यपि उन दोनों में कहीं-कहीं प्रसङ्गवश अन्य प्रस्थानों के विषय भी आ जाने से 'प्राधान्यतो व्यपदेशा भवन्ति' इस न्याय से भरद्वाज के अष्टाङ्गसम्प्रदाय में एक आत्रेय पुनर्वसु का कायचिकित्सा विभाग तथा धन्वन्तरि दिवोदास के अष्टाङ्ग सम्प्रदाय में से एक सुश्रुत का शल्यप्रधान सम्प्रदाय है। इस प्रकार आजकल भी चिरकाल से दोनों सम्प्रदाय हैं। इसके अतिरिक्त कौमारभृत्य के विषय में आत्रेय से भी प्राचीन मारीचकश्यप सम्प्रदाय के भी अब मिल जाने से आजकल तीन सम्प्रदाय हो गये हैं। चरक तथा सुश्रुत संहिता में लेशरूप से आये हुए कौमारभृत्य के विषय में स्वतन्त्र प्रस्थानरूप में पृथक् संहिता के मिल जाने से हम कह सकते हैं कि सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में संक्षिप्त रूप से आये हुए शालाक्य आदि अन्य विषय के भी इसी प्रकार से सर्वाङ्गपूर्ण स्वतन्त्र संहिताएँ तथा आचार्य होंगे। अन्य प्रस्थान यद्यपि कालवश आजकल लुप्त हो चुके हैं तो भी महा^३भारत, हरिवंश, सुश्रुत आदि में वर्णित यह अष्टङ्ग विभाग प्राचीन ही है। इस प्रकार यह कल्पना करना ठीक नहीं है। कि कायचिकित्सा में भरद्वाज का सम्प्रदाय तथा शल्यचिकित्सा में धन्वन्तरि सम्प्रदाय ये दो विभाग पुनः आठ विभागों में विभक्त हुए हैं।
इस प्रकार आर्ष समय में भी अष्टाङ्गों में से कालक्रम से विकसित एक-एक विभाग का विशेष रूप से निरूपण करने से उस विभाग में वे २ ऋषि प्रधान आचार्य माने गये हैं। सुश्रु^४त संहिता में शालाक्यतन्त्र के कर्ता के रूप में विदेहनिमि का, सुश्रु^५त, औपधेनव, औरभ्र, पौष्कलावत आदियों का शल्यचिकित्सक के रूप में शौन^६क, कृतवीर्य,
१. तस्य गेहे समुत्पन्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा। काशिराजो महाराजः सर्वरोगप्रणाशनः ॥
आयुर्वेदं भरद्वाजात् प्राप्येदं भिषजां क्रियाम्। तमष्टधा पुनर्व्यस्य शिष्येभ्यः प्रत्यपादयत् ॥ (हरिवंशे अ. २९)
२. अष्टाङ्गवेदविद्वांसं दिवोदासं महौजसम्। विश्वामित्रसुतः श्रीमान् सुश्रुतः परिपृच्छति ॥ (सु. उ. तं. अ. ६६)
३. महाभारते सभापर्वणि- 'आयुर्वेदस्तथाऽष्टाङ्गो देहवांस्तत्र भारत' ! एवं पूर्वनिर्दिष्टयोर्महाभारतहरिवंशलेखयोः। (११/१७)
४. सुश्रुते- शालाक्यतन्त्राभिहिता विदेहाधिपकीर्तिताः ॥ (सु. उ. अ. १४)
५. सुश्रुते- औपधेनवमौरभ्रं सौश्रुतं पौष्कलावतम्। शेषाणां शल्यतन्त्राणां नामान्येतानि निर्दिशेत् ॥ (सु. सू. अ. ४)
६. सुश्रुते- शरीरनिर्मितिविषये शौनकमतोल्लेखः ॥ (सु. शा. अ. ३)
| १८६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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पाराशर्य, मार्कण्डेय, सुभूतिगौतम आदि का पूर्वाचार्य के रूप में वर्णन है। चरक¹ संहिता में अग्निवेश, भेड आदि छहों का कायचिकित्सा के आचार्य के रूप में, कांका²यन, वायोर्विद, हिरण्याक्ष, कौशिकमैत्रेय, कुश, साङ्कृत्यायन, कुमारशिरा भरद्वाज, वडिश, धामार्गव, मारीचि काष्य, काशीपति वामक, पारीक्षित् मौद्गल्य, शरलोम, कौशिक, भद्रकाप्य, धन्वन्तरि आदि का मतोल्लेख, अङ्गिरा³ जमदग्नि, काश्यप आदि बहुत से ऋषियों के नाम दिये हैं। इसी प्रकार इस वृद्धजीवकीय तन्त्र के भी सूत्रस्थान रोगाध्याय, सिद्धिस्थान राजपुत्रीयाध्याय, वमनविरेचनीयाध्याय तथा ग्रन्थ में भिन्न-भिन्न मत आने पर भार्गव, वायोर्विद, कांकायन, कृष्ण भरद्वाज, दारुवाह, हिरण्याक्ष, वैदेहनिमि, गार्ग्य, माठर, आत्रेय पुनर्वसु, पाराशर्य, भेड तथा कौत्स आदि नामों वाले बहुत से पूर्व आचार्यों का स्मरण किया गया है।
इनमें से पराशर, भेड, काङ्ख्यायन, हारीत, क्षारपाणि जातूकर्ण, आश्विन, भारद्वाज, भोज, भानुपुत्र, कपिलबल, भालुकि, खरनाद तथा विश्वामित्र आदि कुछ आचार्यों के मधूकोश, चरक तथा सुश्रुत की व्याख्या में तथा ताडपत्र लिखित प्राचीन 'ज्वरसमुच्चय' तथा 'ज्वरचिकित्सित' आदि पुस्तकों में उद्धृत वचन मिलने से इनके ग्रन्थों की सत्ता प्रकट होती है। तथा जिनके आजकल वचन उपलब्ध नहीं होते हैं उनके भी स्थान-स्थान पर तन्त्रकर्ता एवं सूत्रकार के रूप में निर्देश तथा मतों के दिखाई देने से ग्रन्थों का होना स्पष्ट है। हेमा⁴द्रि के लक्षणप्रकाश तथा शालिहोत्रोक्त अश्वशास्त्र के अश्वाभिषेक मन्त्रों में भी आयुर्वेद के कर्ता के रूप में बहुत से ऋषियों के नाम दिये हुए हैं।
इस प्रकार दैवयुग से लेकर आजतक देवर्षि तथा महर्षि आदि बहुत से आयुर्वेद के आचाय हुए हैं। अष्टाङ्ग आयुर्वेद के एक-एक विभाग को उन-उन आचार्यों ने ग्रन्थ निर्माण एवं उपदेश द्वारा बहुत बढ़ाया है। उस सब का यदि संकलन किया जाय तो आयुर्वेद का एक बड़ा भारी ग्रन्थ बन सकता है। परन्तु कालप्रवाह में अन्य शास्त्रों की तरह आयुर्वेद के भी बहुत से अमूल्य रत्न लुप्त हो चुके हैं। इन प्राचीन विलुप्त ग्रन्थों के विषय में मेरे परम मित्र श्रीयुत गण⁵नाथ सेनजी तथा गिरीन्द्र⁶नाथ मुखोपाध्याय आदि भारतीय तथा बहुत से पाश्चात्य विद्वानों ने पर्याप्त विवेचन किया है अतः उसके पिष्टपेषण की आवश्यकता नहीं है।
१. चरके—अग्निवेशश्च भेडश्च जतूकर्णः पराशरः। हारीतः क्षारपाणिश्च जगृहुस्तन्मुनेर्वचः ॥
तन्त्रस्य कर्ता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत्। अथ भेडादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च ॥ (च. सू. अ. १)
२. सूत्रस्थाने वातकलाकलीय (१२) यज्जः पुरुषीय (२५) आत्रेयभद्रकाप्यीया (२६) ध्यायेषु। (च. सू. अ. १)
३. चरकोपक्रमग्रन्थे।
४. विक्रम संवत् १५२५ में लिखी हुई हेमाद्रि की 'लक्षण-प्रकाश' नामक एक प्राचीन जीर्ण पुस्तक मेरे संग्रहालय में है। उसमें हाथियों के प्रकरण में पालकाप्य आदियों के वचन के समान अश्वप्रकरण में अनेक स्थानों पर शालिहोत्र के वचन दिये हैं। वे निम्न हैं—
वसिष्ठो वामदेवश्च च्यवनो भारविस्तथा। विश्वामित्रो जमदग्निर्भारद्वाजश्च वीर्यवान् ॥
असितो देवलश्चैव कौशिकश्च महाव्रतः। सावर्णिंगालवश्चैव मार्कण्डेयस्तु वीर्यवान् ॥
गौतमश्च ..... भागंश्च आगरुप (?) काश्यपस्तथा। आत्रेयः शाण्डिलश्चै तथा नारदपर्वतौ ॥
काण्वगो नहुषश्चैव शालिहोत्रश्च वीर्यवान्। अग्निवेशो मातलिंश्च जतुवर्णः पराशरः ॥
हारीतः क्षारपाणिश्च निमिश्च वदतांवरः। अदालिकश्च भगवान् श्वेतकेतुर्भृगुस्तथा ॥
जनकश्चैव राजर्षिस्तथैव हि विनन्गजित्। विश्वेदेवाः समरुतो भगवांश्च बृहस्पतिः ॥
इन्द्रश्च देवराजश्च सर्वलोकचिकित्सकाः। एते चान्ये च बहव ऋषयः संश्रितव्रताः ॥
आयुर्वेदस्य कर्तारः सुस्नातं तु दिशन्तु ते ॥ (पृ. १५९)
५. प्रत्यक्षशारीरभूमिकायाम् ॥
६. History of Indian Medicine.
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १८७
आत्रेय तथा सुश्रुतसंहिताएँ—बहुत से प्राचीन ग्रन्थों के विलोप के कारण क्षतिग्रस्त आयुर्वेद की बची हुई महिमा को स्थिर रखने के लिए अत्यन्त प्राचीन काल से आत्रेय तथा धन्वन्तरि की संहिताएँ क्रमशः चरक तथा सुश्रुतसंहिता नाम से प्रसिद्ध आज भी मिलती हैं। इनके अत्यन्त प्रसिद्ध होने के कारण सूर्य तथा चन्द्रमा के लिये अन्य प्रकाश के समान इनके परिचय की आवश्यकता नहीं है।
अष्टाङ्गहृदय के लेखक वाग्भट के समय यद्यपि आयुर्वेद के अन्य आचार्यों की भी संहिताएँ विद्यमान थीं परन्तु फिर भी—
यदि चरकमधीते तद्ध्रुवं सुश्रुतादिप्रणिगदितगदानां नाममात्रेऽपि बाह्यः।
अथ चरकविहीनः प्रक्रियायामखिन्नः किमिव खलु करोति व्याधितानां वराकः ।।
इत्यादि श्लोक द्वारा मालूम पड़ता है कि यदि चरक का ही अध्ययन किया जाय तो सुश्रुत में आये हुए रोगों का नाम मात्र भी ज्ञान नहीं हो सकता तथा यदि केवल सुश्रुत का अध्ययन किया जाय तो रोगों के प्रतीकार की प्रक्रिया का ज्ञान असम्भव है। इसलिये चरक तथा सुश्रुत दोनों का अध्ययन ही आवश्यक है। इस प्रकार मध्यकाल में वाग्भट के समय में भी ये दोनों ग्रन्थ ही सर्वोपरि माने जाते थे। हजार वर्ष पूर्व के ज्वरसमुच्चय नामक पुस्तक में भी चरक तथा सुश्रुत के बहुत से वचन दिये हुए हैं। इसी प्रकार चतुर्थ शताब्दी के नावनोतक नामक पुस्तक में भी चरक तथा सुश्रुत का उल्लेख है। बाणभट्ट के हर्षचरित में पौनर्वसव (पुनर्वसु के पुत्र या शिष्य) वैद्यकुमार के निर्देश से आत्रेय पुनर्वसु के सम्प्रदाय का उस समय भी प्रचार मालूम पड़ता है। जब से चरक तथा सुश्रुत संहिता का उद्भव हुआ है तभी से ही अपने विचारों की गुरुता एवं गुणों की महिमा से भारत तथा उससे बाहर भी ये अत्यन्त प्रचलित रहे हैं तथा आज भी ये ग्रन्थ वैद्यों के लिये सर्वस्व हैं। सप्तम¹ अष्टम तथा नवम शताब्दी में जब कि अरब तथा पारसीक (पर्शिया) देश अत्यन्त उन्नत अवस्था में थे उस समय भारतीय चिकित्सा विज्ञान के आदर की ही दृष्टि से चरक तथा सुश्रुत संहिताओं का अनुवाद हुआ था। अरबी में अनूदित चरक-सरक नाम से तथा सुश्रुत सस्त्रद नाम से प्रसिद्ध हैं। अबूसीना (Abusina), अबूरासी (Abu Rasi), तथा अबूखिराबि (Abusirabi) नामक अरबी के चिकित्सा ग्रन्थों के लैटिन भाषा के अनुवाद में भी स्थान-स्थान पर चरक का नाम आता है। अ²लबेरूनी (Alberuni) नामक यात्री के पुस्तकालय में चरक का अनुवाद था ऐसा उसके अंगरेजी अनुवाद से ज्ञात होता है। अलम³नसूर (Almansur) ई. प. ७५३-७७४ ने बहुत से आयुर्वेदिक ग्रन्थों, चरक के सर्पचिकित्सा प्रकरण तथा सुश्रुत का अनुवाद किया था। रजस् (Rhazas) नाम का उसका वैद्य चरक का बहुत सम्मान करता था। सिरसीन नामक पाश्चात्य विद्वान् के पू⁴र्वज भी भारतीय आयुर्वेद तथा चरक सुश्रुत को जानते थे ऐसा पुरावृत्त के लेखकों से मालूम पड़ता है। अशोक राजा के पोते (सम्प्रति) के समय बौद्ध धर्म के साथ भारतीय आयुर्वेद भी सिंहल द्वीप में पहुंचा था। भारतीय आयुर्वेद विशेषकर बहुत सी टीकाओं से युक्त वाग्भट तिब्बत में अपना प्रकाश फैलाकर वहां से मंगोल तक पहुंच गया। भारत में विलुप्त बहुत सी वाग्भट की टीकाएँ आज भी तिब्बत में अनूदित हुई मिलती हैं।
भेडसंहिता—आज कल भेडसंहिता नाम की पद्यमय तथा संक्षिप्त लेख वाली एक अन्य संहिता भी कलकत्ता से प्रकाशित हुई है ? आर्ष छाया के अनुरूप रचना होने से वह भी प्राचीन तथा आर्ष प्रतीत होती है। परन्तु उपक्रम (प्रारम्भ)
१. H. H. wilson
२. Pr. Sachu.
३. Hindu Superiority by Har Bilas Sarada.
४. किताबे अलफेरिस्त एण्टिक्विटी ऑफ हिन्दू मैडिसिन।
१८८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
उपसंहार (समाप्ति) तथा बीच-बीच में भी इसमें बहुत से त्रुटित अंश एवं अशुद्धियां हैं। आजकल एक हजार वर्ष पूर्व की ताडपत्रों पर लिखी हुई ज्वरसमुच्चय नामक पुस्तक मिली है जिसमें आश्विन, भरद्वाज आदियों की तरह भेड के भी केवल ज्वरप्रकरण के बहुत से वचन उद्धृत किये गये हैं। उनमें से उपलब्ध मुद्रित भेडसंहिता में केवल दो तीन श्लोक ही मिलते हैं। उसके अन्य श्लोक इसमें नहीं मिलते हैं। इस प्राचीन पुस्तक में इतने श्लोकों के भी मिलने से यह संहिता प्राचीन नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। परन्तु उसी ज्वरप्रकरण में भेड नाम से उद्धृत अन्य श्लोक, तन्त्रसार नामक अन्य संग्रह ग्रन्थ में भेडसंहिता नाम से दिये हुए अन्य प्रकरण के श्लोक तथा इसी प्रकार टीकाकारों द्वारा स्थान-स्थान पर भेड नाम से उद्धृत १ श्लोक भी इस मुद्रित भेडसंहिता में प्रायः नहीं मिलते है। इस वृद्धजीवकीय तन्त्र (काश्यपसंहिता) में बस्तिकर्म के समय का निर्देश करते हुए 'षड्वर्षप्रभृतीनां तु भेड' द्वारा भेड के मत में ६ वर्ष के बाद बस्तिकर्म का विधान बताया है। परन्तु उपलब्ध भेडसंहिता में 'बालानाामथवृद्धानां युवमध्यमयोस्तथा। स्वस्थानामातुराणां च बस्तिकर्म प्रशस्यते' द्वारा सर्वसाधारण के लिये बस्ति का विधान दिया है। यह परस्पर विरोध है। इस प्रकार भिन्न ग्रन्थों में भेड के नाम से मिलने वाले वचनों के यहां न मिलने से यह भेडसंहिता बहुत से अंशों से विच्छिन्न तथा सन्देहास्पद प्रतीत होती है। इन्हीं विच्छिन्न अंशों के न मिलने तथा चरक सुश्रुत के समान इसमें विषय निरूपण को अस्पष्टता के कारण ही वाग्भट ने भी निम्न श्लोक द्वारा भेड के विषय में कटाक्ष किया है—
ऋषिप्रणीते भक्तिश्चेन्मुक्त्वा चरकसुश्रुतौ । भेडाद्याः किं न पठ्यन्ते तस्माद् ग्राह्यं सुभाषितम् ।।
(अष्टाङ्गहृदये उ. तं. अ. ४०)
हारीतसंहिता—प्रायः इसी के अनुरूप दो तीन सौ वर्ष पूर्व लिखित हारीत संहिता भी प्रकाशित हुई आजकल मिलती है। इसमें प्राचीन आर्ष लेख की छाया न होकर केवल साधारण संग्रह मात्र होने से यह न तो प्राचीन तथा न आर्ष ही प्रतीत होती है। प्राचीन ज्वरसमुच्चय नामक पुस्तक में हारीत नाम से उद्धृत बहुत से श्लोक दिये हैं। अन्य ग्रन्थों में भी स्थान स्थान पर हारीत के वचन उद्धृत किये गये हैं। परन्तु वे वचन उपलब्ध हारीतसंहिता में न मिलने से किसी अन्य ही प्राचीन हारीतसंहिता की पूर्वस्थिति का अनुमान होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि संभवतः प्राचीन हारीतसंहिता के लोप को देखकर उस (हारीत) के नाम से स्थिर रखने के लिये पीछे होने वाले किसी विद्वान ने हारीत के नाम से इस ग्रन्थ की रचना की हो ?।
नवोपलब्ध काश्यपसंहिता—अत्यन्त प्राचीन काल से प्रसिद्ध चरक सुश्रुत संहिताएँ तथ अभी (वर्तमान समय में) मिली हुई भेडसंहिता की अपेक्षा उपलब्धि (प्राप्ति) की दृष्टि से चौथे नम्बर पर होती हुई भी प्राचीन आर्ष लेख, विषय की गम्भीरता तथा सारयुक्त होने की दृष्टि से चरक तथा सुश्रुत की समकक्ष कौमारभृत्य विषय की यह प्राचीन काश्यपसंहिता प्रतिकूल दैव के कारण बहुत समय तक विलुप्त रहकर फिर सौभाग्य से कहीं दबी हुई जीर्णशीर्ण अवस्था में प्राचीन ताडपत्र की पुस्तक के रूप में प्राण शेष तथा स्थान-स्थान पर खण्डित अंशों से युक्त वृद्धजीवकीय तन्त्र रूप में अब मिली है। करालकाल के द्वारा इसके अवयवों के खण्डित हो जाने पर शेष अवयवों द्वारा भी अपने विषय की गम्भीरता को प्रकट करती हुई तथा नाम से भी लुप्त हुई इस प्राचीन आर्ष संहिता का मिलना भी विद्वानों के लिये सन्तोष का ही विषय है।
पहले किसी समय नेपाल देश में आकर विद्वद्वर महामहोपाध्याय श्रीयुत पण्डित हरप्रसाद शास्त्री ने निम्न विवरणसहित काश्यपसंहिता का उपलब्धि वृत्तान्त Report on the Search of Sanskrit Manuscripts (1895 to-1900) नामक पत्र में प्रकाशित किया था तथा उस विवरण को जूलियस जौली नामक विद्वान् ने मैडिसन की पुस्तक में भी दिया है—'नेपाल में मुझे काश्यप भार्गवसंवाद रूप वैद्यक विषय की ३८ पृष्ठों की अपूर्ण प्राचीन काश्यपसंहिता मिली है जिसके प्रारम्भ में भेषज्योपक्रमणीय में आठवें पृष्ठ से ज्वर निदान दिया हुआ है। इसमें चरक,