भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 240
२१६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

आत्रेय द्वारा वार्योविद तथा मारीच कश्यप का प्रतिपक्षी के रूप में तथा काश्यप संहिता में कश्यप द्वारा वार्योविद को उपदेश देने का उल्लेख मिलने से समकालीन अनेक प्रसिद्ध आचार्यों के परस्पर मत तथा नामोल्लेख की संभावना होने से भेड से कुछ समय पूर्व तथा परम्पर नामोल्लेख सहित एक दूसरे मत का निर्देश करने वाले आत्रेय तथा मारीच कश्यप परस्पर समकालीन प्रतीत होते हैं। अथवा जिस प्रकार इस काश्यपसंहिता में अपने ग्रन्थ के निबन्धा एवं प्रतिसंस्कर्ता वृद्धजीवक तथा वात्स्य के नाम तथा मत का उल्लेख कश्यप द्वारा संभव होने से बाद में संस्कार अथवा प्रतिसंस्कार के समय का माना जाना चाहिये। उसी प्रकार बाद में होने वाले भेड आदि का नाम तथा मतोल्लेख भी पीछे संस्करण के अवसर पर अनुप्रविष्ट हुआ प्रतीत होता है।

इसके अनुसार कौटिलीय अर्थशास्त्र आदि प्राचीन ग्रन्थों में मानव, बृहस्पति, वातव्याधि आदि तथा यास्क द्वारा गृहीत अन्य पूर्वाचार्यों का भी पक्ष प्रतिपक्षरूप से उल्लेख होने पर भी इतने मात्र से इन्हें समकालीन नहीं कहा जा सकता। पुस्तकों में लिखे हुए अतीत आचार्यों के विषयों को देखकर भी परस्पर विमर्शरूप से लिखने की भी प्राचीन शैली है। इससे अन्य आचार्यों के एकत्र नाम एवं मतोल्लेख मात्र से उन्हें समकालीन कहना उचित नहीं है। पूर्व एवं पश्चात् के दो आचार्यों का जहां परस्पर एक दूसरे का नाम एवं मतोल्लेख करना संभव प्रतीत नहीं होता वहां भी बाद में किये गये संस्करणों में पूर्व एवं उत्तरकालीन आचार्य का परस्पर नाम एवं मतोल्लेख संभव है, जैसा कि इस ग्रन्थ में प्रतिसंस्करण के कारण जीवक एवं वात्स्य का नाम एवं मतोल्लेख कई स्थानों पर किया गया है। अथवा दो समकालीन आचार्यों का स्वयं भी परस्पर नाम एवं एतोल्लेख संभव है। इस प्रकार बाद में प्रतिसंस्करण किये हुए ग्रन्थों में परस्पर नाम आदि देखकर उनके पौर्वापर्य अथवा समकालीनता का निश्चय करने के लिये सूक्ष्म दृष्टि एवं अन्य साधनों से इनका विवेचन करना आवश्यक है।

बहुत से विद्वान् तिब्बतीय उपकथाओं (Tibbatian Tales) में आये हुए तक्षशिला निवासी आत्रेय से जीवक के अध्ययन के उल्लेख के आधार पर बुद्धकालीन जीवक के गुरु आत्रेय को ही चरक संहिता का मूल आचार्य पुनर्वसु आत्रेय मानकर उसको बुद्धकालीन निश्चित करते हैं। परन्तु जीवक के विषय में तिब्बतीय गाथाओं के समान ब्रह्मदेशीय तथा सिंहलदेशीय गाथाएं भी प्रचलित हैं। इन गाथाओं में परस्पर अनेक भेद दिखाई देते हैं। जीवक के अध्ययन के विषय में महावग्ग के अनुसार किसी आचार्य से उसके अध्ययन का उल्लेख मिलता है, उसके अनुसार उसका गुरु आत्रेय था ऐसा प्रतीत नहीं होता। चुल्लक सेट्ठि जातक में भी तक्षशिक्षा में ५०० शिष्यों के गुरु किसी प्रसिद्ध बोधिसत्त्व का निर्देश मिलता है। उसकी कथाओं में पापक तथा जीवक का भी निर्देश मिलता है। सिंहल¹ की गाथाओं में शक्र द्वारा विशेष विद्या पायेहुए कपलक्ष्य (कपिलाक्ष) नामक गुरु से जीवक के अध्ययन का उल्लेख मिलता है। तथा ब्रह्मदेश² की गाथाओं में तक्षशिला का वर्णन नहीं है। अपितु वाराणसी जाकर जीवक के अध्ययन का उल्लेख मिलता है। इस


१. जीवक चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन के लिये तक्षशिला गया। वहां का आचार्य उसे पढ़ाने के लिये सहमत हो गया। उस समय इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा क्योंकि जीवक कपलक्ष्य के द्वारा विद्या में विशेष निपुणता प्राप्त करने लगा। जिसके बाद उसे गौतम बुद्ध की चिकित्सा की अनुमति मिली थी। देखिये—Maunal of Buddhism by Spence hardy पृष्ठ २३९. २. जीवक ने लोगों को आरोग्य प्रदान करने तथा रोगों से मुक्ति दिलाने के लिये चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन प्रारम्भ किया। उसने वाराणसी जाकर एक प्रसिद्ध चिकित्सक का शिष्यत्व स्वीकार करके शीघ्र ही अपनी प्रतिभा के कारण इस शास्त्र में नैपुण्य प्राप्त कर लिया। देखिये—Legend of the Burmese Buddha by Right Revrent P. Bigandet पृष्ठ १९७.