भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २२७

प्रकार गाथाओं में परस्पर विरोध होने से किसको प्रमाण माना जाय ? इन उपर्युक्त विरोधी कथाओं में से केवल तिब्बतीय गाथाओं के आधार पर आत्रेय को अर्वाचीन सिद्ध करना युक्तिसंगत एवं शोभन प्रतीत नहीं होता। केवल इन दुर्बल प्रमाणों के आधार पर चरक संहिता के मूल आचार्य पुनर्वसु आत्रेय का समय निर्धारण करना दुःसाहस है। यदि आत्रेय जीवक का गुरु हो तो जीवक ने अपने ग्रन्थ में आत्रेय का गुरु रूप से निर्देश क्यों नहीं किया ? क्याङ्गुर विनय के तृतीय भाग के ६१ अध्याय (९२ से १०८ पृष्ठों पर) में जीवक कुमार (छ्वे गे सोन नु) नामक वैद्यराज के विषय में निम्न कक्षा मिलती है—'जीवक ने राजा से प्रार्थना करके आजीविका के लिये भैषज्य विद्या पढ़कर कपालभेदन की चिकित्सा के विशेष अध्ययन के लिये तक्षशिला (ध्येजोग्) स्थित उस विद्या में प्रवीण ध्युन् शेकि भु (नित्यप्रज्ञ) नामक वैद्य के पास जाने के लिये राजा से प्रार्थना की। तब राजा (बिम्बसार) ने पद्मसार (पद्म हि ङिङ् पो) नामक तक्षशिला के राजा के नाम पत्र लिख दिया कि मेरा पुत्र जीवक नित्यप्रज्ञ नामक विद्वान् से भैषज्य विद्या की प्राप्ति के लिये आरहा है, उसके अध्ययन का प्रबन्ध करने की कृपा करें। बिम्बसार का वह पत्र लेकर जीवक ने तक्षशिला जाकर वहां के राजा को दिया। तब राजा के कहने पर नित्यप्रज्ञ (ध्युन् शेकि भु) नामक वैद्य से जीवक ने भैषज्य विद्या का ग्रहण किया'। ध्युन्=सदा अथवा नित्यः, शेकि=प्रज्ञायाः, भूः=सूनूः, सम्बन्धी—इस अर्थ के अनुसार तिब्बती भाषा में उसके गुरु वाचक ध्युन् शेकि भु नाम के अनेक बार व्यवहृत होने से ज्ञात होता है कि जीवक का गुरु तक्षशिला में रहने वाला तथा कपाल भेदन चिकित्सा में विशेष निपुण तथा प्रसिद्ध नित्यप्रज्ञ नामक कोई वैद्य था। राहुल साङ्कृत्यायन नामक बौद्ध पण्डित द्वारा पाली भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित विनय पिटक में भी लिखा है कि—'उस समय तक्षशिला में (एक) दिशाप्रमुख (दिगन्त प्रसिद्ध) वैद्य रहता था'। यहां भी आत्रेय नाम से जीवक के गुरु का निर्देश नहीं मिलता है। तिब्बतीय गाथाओं के आधार पर आत्रेय को जीवक का गुरु मानने वाले विद्वानों पास कोई अन्य प्रबल प्रमाण है या नहीं, यह विचारणीय प्रश्न है। इसके अतिरिक्त आत्रेय पुनर्वसु ने अग्निवेश को दिये गये उपदेश का स्थल 'जनपदमण्डले पाञ्चालक्षेत्रे काम्पिल्यराजधान्याम्' द्वारा स्पष्टरूप से काम्पिल्य प्रदेश बताया है। यदि तिब्बतीय एवं जातक कथाओं के आधार पर बुद्ध सामयिक जीवक के तक्षशिला में आत्रेय द्वारा अध्ययन के उल्लेख के अनुसार तक्षशिला के अध्यापक आत्रेय को ही अग्निवेश का गुरु माना जाय तो अग्निवेशसंहिता में तक्षशिला का उल्लेख क्यों नहीं मिलता है। तक्षशिला में भूगर्भ से निकले हुए तीन नगरों में से दक्षिण दिशा वाले विर्माउण्ड नामक भाग को ऐतिहासिक विद्वान् १०००-१२०० वर्ष ईस्वी पूर्व का मानते हैं। पाणिनि¹ ने भी अपने सूत्र में तक्षशिला का निर्देश किया है। इतिहास के विद्वान बुद्ध से भी पूर्व तक्षशिला में विद्या का प्रचार मानते हैं। महावग्ग तथा जातकों के अनुसार मगधनिवासी जीवक तथा काशी के राजा ब्रह्मदत्त का वैद्यक शास्त्र के अध्ययन के लिये तक्षशिला जाने का उल्लेख मिलने से प्रतीत होता है कि उस समय तक्षशिला अन्य विद्याओं के समान आयुर्वेद विद्या का भी प्रधान विद्यापीठ (University) था। पुनर्वसु आत्रेय तथा उसके शिष्य अग्निवेश को यदि उस समय माना जाय तो अग्निवेशसंहिता तथा आत्रेयसंहिता के रचयिताओं ने उस प्रसिद्ध विद्यापीठरूप तक्षशिला का अपने ग्रन्थों में वर्णन क्यों नहीं किया। अग्निवेशसंहिता में पुनर्वसु आत्रेय के जितने भी उपदेश² स्थानों का उल्लेख किया है, उनमें एक भी स्थान पर तक्षशिला का नाम नहीं है। इतनी प्रसिद्ध तक्षशिला का ग्रहण न करके काम्पिल्य आदि में उपदेश का उल्लेख करने से प्रतीत होता है कि उस समय तक्षशिला की प्रसिद्धि ही नहीं थी। इसलिये तक्षशिला की विद्यापीठ के रूप में प्रसिद्धि से पूर्व ही काम्पिल्य में आत्रेय पुनर्वसु द्वारा अग्निवेश को उपदेश दिया गया प्रतीत होता है। काम्पिल्य³ देश वैदिक समय से प्रसिद्ध है। शुक्लयजुर्वेद, तैत्तिरीय, मैत्रायणीय तथा काठकसंहिताओं में भी काम्पिल्य शब्द मिलता है। पाञ्चालशब्द⁴ भी वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ तथा उपनिषदों में मिलता है।


१. १ से ४ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ५६-५७ देखें।