भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

तक्षशिला का इस प्रकार वेद, ब्राह्मण तथा उपनिषद् आदि प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख नहीं मिलता है। महाभारत¹ में भी उपक्रम तथा उपसंहार में और रामायण² में भी केवल उत्तरकाण्ड में तक्षशिला का उल्लेख मिलने से तक्षशिला की बाद में प्रसिद्धि प्रतीत होती है। न केवल आत्रेय तथा अग्निवेश ने उसका वर्णन नहीं किया अपितु नाना देशों का वर्णन करते हुए मारीच कश्यप तथा उसके शिष्य वृद्धजीवक ने भी तक्षशिला का उल्लेख नहीं किया है। सुश्रुतसंहिता तथा भेडसंहिता में भी उसका नाम नहीं मिलता है। बुद्धसामयिक जीवक के आचार्य का केवल आत्रेय तथा तक्षशिला निवासी के रूप में निर्देश मिलता है तथा चरकसंहिता में आचार्य आत्रेय का आत्रेय पुनर्वसु नाम से तथा काम्पिल्यनिवासी के रूप में वर्णन मिलता है। यदि जीवक और अग्निवेश दोनों एक ही आत्रेय के शिष्य होते तो जीवक की कथा में उसके इतने प्रसिद्ध सतीर्थ्य (सहाध्यायी) अग्निवेश का नाम तथा अग्निवेश के लेख में उस विशिष्ट बुद्धि एवं प्रतिभासम्पन्न प्रसिद्ध जीवक के नाम का निर्देश क्यों नहीं मिलता है। अग्निवेश का आचार्य आत्रेय पुनर्वसु केवल कायचिकित्सा का ही विद्वान् प्रतीत होता हैं। इसीलिये अग्निवेश आदि उसके शिष्यों ने भी उसी विषय में अपने ग्रन्थों की रचना की है। इसके विपरीत जीवक का गुरु आत्रेय कायचिकित्सा के अतिरिक्त शल्यचिकित्सा में विशेष कुशल था जैसा कि उसके शिष्य जीवक की चिकित्सा प्रक्रिया द्वारा स्पष्ट है। इस प्रकार चिकित्सा के विभागों की विभिन्नता भी दोनों आत्रेयों को भिन्न-भिन्न व्यक्ति सिद्ध करती है। उपर्युक्त वर्णन के अनुसार यह कहा जा सकता है कि तक्षशिला की विद्यापीठ के रूप में उन्नति एवं प्रसिद्धि से पूर्व ही काश्यप, आत्रेय, अग्निवेश, भेड तथा दिवोदास आदि का आयुर्वेद के उपदेश के ग्रहण एवं धारण का समय है। इसी प्रकार पाणिनि के कच्छादि गण (४-२-१३३) तथा तक्षशिलादि गण (४-३-९३) में आये हुए देशवाचक काश्मीर शब्द के वेद तथा ब्राह्मण ग्रन्थों की तरह आत्रेय तथा अग्निवेशसंहिताओं में न मिलने से प्रतीत होता है कि काश्मीर की उस समय विद्यमानता होने पर भी विद्यापीठ रूप में प्रसिद्धि होने से पूर्व उसकी स्थिति गौण (अप्रसिद्ध) थी। अन्यथा पाञ्चाल (गङ्गा यमुना का प्रदेश) तथा काम्पिल्य (कम्पिल-फर्रुखाबाद) के आसपास लिखी गई आत्रेय संहिता में काम्पिल्य के समीपवर्ती तथा इतने प्रसिद्ध काश्मीर का उल्लेख न होना आश्चर्य का विषय है।

इसके अतिरिक्त तिब्बतीय गाथाओं को प्रमाण मानकर यदि जीवक के आचार्य को आत्रेय माना भी जाय तो भी गोत्रवाचक आत्रेय शब्द द्वारा अनेक व्यक्तियों का उल्लेख मिलने से केवल गोत्रवाचक आत्रेय शब्द से ही उसे पुनर्वसु आत्रेय नहीं कहा जा सकता। किन्तु तिब्बतीय कथाओं के अनुसार बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक के अध्ययन स्थान तक्षशिला का अध्यापक आत्रेय, पुनर्वसु आत्रेय के पश्चात् बौद्धकालीन तथा केवल गोत्र की समानता वाला कोई अन्य ही आत्रेय प्रतीत होता है। राजर्षि वार्योविद का बुद्ध के समय या उसके बाद इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं मिलता। वार्योविद के समकालीन पुनर्वसु आत्रेय का मारीच कश्यप के साथ तथा उपनिषत्कालीन समय प्रतीत होता है। इसलिये आत्रेय पुनर्वसु को बुद्धकालीन निश्चित करना अत्यन्त दुर्बल प्रमाणों पर आश्रित है।

अग्निवेश

चरकसंहिता में आत्रेय पुनर्वसु के प्रधान शिष्यरूप में निर्दिष्ट अग्निवेश तथा उसके सतीर्थ्य (सहपाठी) भी उसीके समकालीन होने चाहिये।


१. उपलब्ध महाभारत में तक्षशिला शब्द आदिपर्व के तृतीयाध्याय में दो बार तथा स्वर्गारोहण पर्व के पांचवें अध्याय में आता है। 'गुरवे प्राङ्नमस्कृत्य' (१-५५ अध्याय) से महाभारत का उपक्रम है। उससे पहला भाग सूत द्वारा बाद में पूरा किया गया है-ऐसा महाभारत के विमर्श में (Bhandarkar O.R.I. Vol. XVI part III, IV) मैंने निर्देश किया है।
२. १ की टि उपो. संस्कृत पृ. ५७ देखें।