काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद [२२९]
अग्निवेश संहिता में तक्षशिला का उल्लेख न होने से परन्तु पाणिनि¹ के सूत्रो में तक्षशिला का उल्लेख मिलने से तथा पाणिनि द्वारा गर्गादि² गण में जतूकर्ण, पराशर तथा अग्निवेश शब्द का उल्लेख दिया होने से अग्निवेश का समय पाणिनि से भी पूर्व प्रतीत होता है। यद्यपि ऐसा कोई नियम नहीं है कि पाणिनि के उन-उन गणों में समानवर्गीय (समान श्रेणी के) शब्द ही दिये गये हों तथापि भाषा की दृष्टि से प्रायः एक जाति के शब्दों में प्रत्यय आदि की समानता होने से शब्दों की एकाकारता दिखाई देती है जिससे पाणिनि के गण में ऋषि, देश, नदी, नगर तथा प्राणिवाचक शब्द प्रायः साथ-साथ दिये हुए हैं। इस गर्गादि गण में जतूकर्ण, पराशर, भिषज् तथा चिकित्सित आदि शब्दों के पाठ से भिषज् तथा चिकित्सित शब्दों के सान्निध्य से पराशर शब्द वैद्याचार्य पराशर का बोधक प्रतीत होता है। उस गण में आया हुआ अग्निवेश शब्द भी उसी न्याय से आत्रेय के शिष्य वैद्याचार्य अग्निवेश का बोधक होना चाहिए। इससे अग्निवेश पाणिनि से भी प्राचीन प्रतीत होता है।
पूर्वनिर्दिष्ट³ हेमाद्रि लक्षणप्रकाश में उद्धृत शालिहोत्र के श्लोकों में आयुर्वेदाचार्यों की सूची में हारीत, क्षारपाणि, जातूकर्ण, पराशर आदि सतीर्थ्यों सहित अग्निवेश का नामोल्लेख आचार्य आत्रेय के साथ मिलता है। पालकाप्यकृत हस्त्यायुर्वेद के चतुर्थस्थान के चतुर्थ अध्याय में स्नेह विशेष⁴ के वर्णन में अग्निवेश का नाम आता है। चरकसंहिता में पुनर्वसु के नाम से दिये हुए द्वैविध्यवाद को पालकाप्य में भरद्वाज के नाम से तथा चातुर्विध्यवाद को गौतम के मत के रूप में दिया हुआ। पालकाप्य में साप्तविध्यवाद को अग्निवेश के मत के रूप में दिया हुआ है। वर्तमान चरकसंहिता में अन्य स्नेहों का उल्लेख मिलने पर भी चार स्नेहों का ही मुख्य प्रयोग मिलता है। यह परिवर्तन संस्करण के कारण प्रतीत होता है।
स्थान-स्थान पर आये हुए विषयों से प्रतीत होता है कि प्राचीन महर्षि वेद-वेदाङ्गों की तरह आयुर्वेद के विषयों के भी पण्डित थे। यद्यपि एक नाम वाले अनेक व्यक्ति हो सकते हैं तो भी मज्झमनिकाय⁵ में गौतम बुद्ध के साथ आध्यात्मिक चर्चा करने वाले सञ्चक (सत्यक) नामक निगण्ठ (निर्ग्रन्थ) नाथ पुत्र का भी गोत्रपरक अग्निवेश शब्द द्वारा निर्देश किया गया है। पक्ष एवं विपक्ष की युक्तियों के अभाव में यह वही अग्निवेश है अथवा नहीं, यह निश्चय करना कठिन है क्योंकि किसी व्यक्ति विशेष के निर्णय करने के लिये दृढ साधनों की अपेक्षा होती है तथापि आत्रेय, ब्राह्मण ग्रन्थ एवं उपनिषदों के समय के सिद्ध किये हुए दिवोदास, प्रतर्दन आदि के ही समान काल वाले होने से उसका शिष्य अग्निवेश शतपथ ब्राह्मण में आयुर्वेदीय विषयों के मिलने से संभवतः वंश ब्राह्मण⁶ में निर्दिष्ट अग्निवेश्य (अग्निवेश का शिष्य अथवा सन्तति) का पूर्वपुरुष प्रतीत होता है। आत्रेय इस प्रस्थान में प्रधान आचार्य माना गया है। उसके अग्निवेश आदि ६ प्रधान शिष्यों ने उसके उपदेश को ग्रहण करके अपने-अपने विचारों के अनुसार पृथक्-पृथक् तन्त्र बनाये। उनमें से मुख्य तन्त्रकर्ता के रूप में चरकसंहिता में उल्लेख होने से अग्निवेश का तन्त्र सबसे अधिक प्रतिष्ठित माना जाता था। जिस प्रकार आकाश के मध्य में स्थित एक ही मणि की प्रभा उस-उस प्रदेश के तारतम्य के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है उसी प्रकार एक ही आचार्य आत्रेय के उपदेश अग्निवेश, हारीत, क्षारपाणि आदि विद्वान् शिष्यों के अन्तःकरणों में जाकर अपने-अपने ग्रहण, धारण, मनन, प्रयोग एवं अनुभव की शक्ति के भिन्न-भिन्न होने से भिन्न-भिन्न योग्यता वाले तन्त्रों के निर्माण के कारण हुए। इनमें से अग्निवेश तन्त्र सबसे विशिष्ट था। इसीलिये बाद में इस अग्निवेश तन्त्र का ही चरक ने संस्करण करके लोक में प्रसिद्ध किया। इसकी विशिष्टता के कारण ही हारीत तथा क्षारपाणि आदि अन्य आचार्यों के ग्रन्थों का प्रचार कम था और इसीलिये आज वे विलुप्त हुए हैं।
१. १-६ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ५८-५९ देखें।