काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
चरक
पुनर्वसु आत्रेय के उपदेश को ग्रहण करके बनाई हुई अग्निवेश संहिता का पीछे प्रतिसंस्कर्ता के रूप में मिलने वाला चरक कौन हुआ है तथा किस समय हुआ है इसका विचार करने पर हम देखते हैं कि यद्यपि भिन्न-भिन्न ग्रन्थों में विभिन्न जगहों पर चरक शब्द का प्रयोग आता है तथापि उनसे विभिन्न¹ अर्थों का बोध होता है, फिर भी चरक नाम से प्रसिद्ध आयुर्वेद के कोई आचार्य हुये हैं, वे आचार्य चरक अमुक व्यक्ति ही थे यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता।
भावप्रकाश² में जहां आयुर्वेद के आचार्यों का वर्णन मिलता है वहां शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष तथा छन्द आदि ६ वेदाङ्गों सहित वेद तथा अथर्ववेद के अन्तर्गत आयुर्वेद के ज्ञाता शेषनाग ने भूमण्डल का वृत्तान्त जानने के लिये चर (गुप्तचर) रूप में वेद तथा वेदाङ्गों के ज्ञाता किसी मुनि के यहां आयुर्वेद के पण्डित के रूप में अवतार ग्रहण किया तथा ‘चर इव’ इस निर्वचन के अनुसार चरक नाम से प्रसिद्ध हुआ। फिर उसने आत्रेय के शिष्य अग्निवेश आदि द्वारा बनाये हुये आयुर्वेद के तन्त्रों का संस्कार करके चरकसंहिता नामक ग्रन्थ का निर्माण किया। इस प्रकार चरक संहिता के प्रणेता तथा आयुर्वेद के आचार्य चरक का इतिहास मिलता है।
चरक शब्द वैद्यमात्र का ज्ञान कराता है इसीसे एक दो स्थलों पर अन्य व्यक्तियों के लिये भी चरक शब्द का व्यवहार दिखाई देता है, ऐसा भी बहुत से लोग कहते हैं। परन्तु चरक शब्द का वैद्यमात्र के पर्याय के रूप में अभिधान ग्रन्थों (कोश) में प्रयोग होने पर सुश्रुत आदि अन्य आचार्यों के लिये भी चरक शब्द का प्रयोग होना चाहिये था, परन्तु ऐसा नहीं है, अपितु चरक संहिता के प्रणेता व्यक्ति विशेष के लिये रूढ हुआ यह चरक शब्द स्वभावतः उसी का बोध कराता है। इस प्रकार कुछ अन्य व्यक्तियों के लिये प्रयुक्त हुआ यह चरक शब्द ‘कलियुगी भीम’ की तरह औपचारिक
१. (i) कृष्ण यजुर्वेद की एक शाखा भी चरक नाम से प्रसिद्ध है। उस शाखा को मानने वाले भी चरक कहलाते हैं—ऐसा शतपथ आदि ब्राह्मणों में लिखा मिलता है।
(ii) ललितविस्तर नामक बौद्ध ग्रन्थ के १म अध्याय में—‘अत्यतीर्थिकश्रमणब्राह्मणचरकपरिव्राजकानाम्’ में श्रमणों के साथ चरक शब्द आता है जो कुछ भ्रमणशील तपस्वियों का बोधक है।
(iii) वराहमिहिरने बृहज्जातक (१५-१) में संन्यास के वर्णन में—‘शाक्या जीविक-क भिक्षुवृद्धचरका निर्ग्रन्थ-ख वन्याशनाः’ आदि में चरक शब्द दिया है जिसकी व्याख्या करते हुए भट्टोत्पल ने ‘चरकश्चक्रधरः अर्थात् चक्र धारण करने वाले तथा रुद्र ने ‘चरका योगाभ्यासकुशला मुद्राधारिणश्चिकित्सानिपुणाः पाखण्डभेदाः’ अर्थात् योगाभ्यास में कुशल मुद्रा (योगासन की अवस्था विशेष) को धारण करने वाले तथा चिकित्सा में निपुण संप्रदाय विशेष वाले—यह अर्थ किया है।
(iv) श्री हर्ष ने नैषधचरित (४-११६) में ‘देवाकर्णय सुश्रुतेन चरकस्योक्तेन जानेऽखिलम्’ इस द्व्यर्थक पद्यांश में ‘चरः स्पश एव चरकः’ अर्थात् गुप्तचर अर्थ किया है।
(v) ब्रह्मणे ब्राह्मणमिति’ तैत्तिरीय संहिता के इस मन्त्र में आये हुये चरक शब्द का भाष्यकार सायन ने बांस के अग्रभाग पर खेल करने वाला नट अर्थ किया है।
२. ‘अनन्ताश्चिन्तयामास ।.ग .... ग्रन्थोऽयं चरकः कृतः।
इत्यादि (भावप्रकाश पूर्वखण्ड १म प्रकरण ६०-६५) (अनुवादक)
क. जीविक—आजीविक सम्प्रदाय जिसका प्रर्वतक गौतमबुद्ध का समकालीन मङ्खलिपुत्र गोसाल हुवा है।
ख. निर्ग्रन्थ—जैन।
ग. सहस्रजिह्व शेषनाग का अवतार पतञ्जलि को माना है तथा आगे पतञ्जलि और चरक का अभेद प्रदर्शित किया है अतः यहां अनन्त (शेष) का अवतार चरक को माना है। (अनुवादक)