भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २३१

(लाक्षणिक) ही समझना चाहिये। अथर्ववेद में आयुर्वेद के विषयों के विशेषरूप से मिलने से कश्यप तथा सुश्रुत की संहिता के समान चरकसंहिता में भी अथर्ववेद के प्रधानरूप से वर्णन होने से उसका चरक शाखा वाला होने पर भी चरकाचार्य होने में कोई व्याघात नहीं होता।

इस प्रकार गोत्र¹ नाम से आत्रेय की तरह शाखा के नाम से भी इसकी चरकरूप में प्रसिद्धि हो सकती है। अथवा उस व्यक्ति का चरक यह नाम रूढि रूप से भी हो सकता है। अथवा प्राचीन काल में पश्चिम दिशा में नागजाति का इतिहास मिलता है, भावप्रकाश के अनुसार उस जाति का कोई विद्वान् शेषनाग के अवतार के रूप में चरक नाम से प्रसिद्ध हुआ हो। बृहज्जातक के व्याख्याकार रुद्र के अनुसार वह आयुर्वेद विद्या का विशेष पण्डित था। वह लोकोपकार की दृष्टि से मधुकरी वृत्ति धारण करके गांव-गांव में घूम-घूम कर वैद्यक के उपदेश तथा चिकित्सा द्वारा लोगों का उपकार करता था। अतः संचरणशील (घूमने वाले) भिक्षु का रूप धारण करने से चरक नाम से उसकी प्रसिद्धि हुई हो यह भी सम्भव है। अस्तु, इसका किसी भी कारण चरक नाम प्रसिद्ध हुआ हो, परन्तु इस चरकाचार्य का आत्रेयसंहिता के उपदेशों को ग्रहण करके अग्निवेश द्वारा बनाए हुये तन्त्र का प्रतिसंस्कर्ता होने से आयुर्वेद विद्या में अतिनिपुण होने के कारण प्राचीन समय से ही आचार्यों की श्रेणी में सम्मान था, ऐसा प्रतीत होता है। इसीलिये वाग्भट आदियों ने भी चरकाचार्य का विशेष रूप से कीर्तन किया है। जयन्त भट्ट (मध्यकालीन काश्मीरी दार्शनिक) ने भी अपनी न्यायमञ्जरी में 'प्रत्यक्षीकृत-देशकालपुरुषदशाभेदानुसारिसमस्तव्यस्तपदार्थशक्तिनिश्चयाश्चरकादयः' इस प्रकार से चरकाचार्य को बहुत सम्मान के साथ स्मरण किया है।

चरक के समय का विचार करते हुये पाणिनिके 'कठचरकाल्लुक्' (४-३-१०९) सूत्र में चरक शब्द देखकर कुछ विद्वान् कहते हैं कि चरक पाणिनि से भी पूर्व हुए हैं। परन्तु इस सूत्र में आया हुआ चरक शब्द कठ शब्द के साहचर्य से तथा चरणव्यूह (वेद की शाखा) में गिनाये होने से चरकशाखा संहिता का निर्माता है अथवा उसी सम्प्रदाय का कोई अन्य ही प्राचीन महर्षि होना चाहिये। आजकल चरक शाखा संहिता मुद्रिता हुई मिलती भी है। इसी प्रकार 'माणवकचरकाभ्यां खञ्' (५-१-१४) सूत्र में आया हुवा चरक शब्द भी चरक नामक एक लौकिक व्यक्ति परक होने की अपेक्षा चरकशाखापरक होना अधिक उचित प्रतीत होता है क्योंकि ञित् का स्वरविषयक विधान है तथा स्वर का विशेषरूप से वैदिक प्रक्रिया में ही प्रयोग होता है।

याज्ञवल्क्य स्मृति की व्याख्या में विश्वरूपाचार्य (८वीं शताब्दी) द्वारा उद्धृत 'तथा च चरकाः² पठन्ति' इस वाक्य में अश्वियों द्वारा भैषज्य का उपदेश दीखने से आपाततः यह वैद्यक का विषय प्रतीत होने पर भी आपत्काल में


१. गोत्र—'अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्' । (४-१-१६२) (अनुवादक)
२. चरक ऐसा कहते हैं—आरुणी के पुत्र श्वेतकेतु को उसने ब्रह्मचर्य धारण कराया। उसे अश्विनीकुमारों^क ने मधु^ख तथा मांस ओषधिरूप में बताया। उसने कहा—ब्रह्मचर्य को धारण करने वाला मैं मधु (शराब) कैसे सेवन करूं। उन्होंने उत्तर दिया कि यदि मनुष्य अपनी आत्मा द्वारा जीवित रहता है तो वह दूसरे पुण्य भी कर सकता है। इस प्रकार मनुष्य सब तरह से अपनी रक्षा करे (अर्थात् चिकित्सा के रूप में आवश्यकता होने पर मांस तथा शराब का भी सेवन किया जा सकता है) इसपर वाजसनेयियों (शुक्ल यजुर्वेद की एक शाखा वाले) ने कहा—इत्यादि ..... (याज्ञवल्क्य टीका बालक्रीड़ा १-२-३२)


क. चिकित्सा की सर्जिकल तथा मेडिकल दोनों पद्धतियों को जानने वाले। आजकल के अनुसार उन्हें M.B.B.S. कहा जा सकता है।
ख. मधु—शराब। चरक में भी मधु शब्द शराब के लिये आया हैं—'विबन्धघ्नं कफघ्नं च मधु लध्वल्पमारुतम्' । (च.सू. २७ अ. १८६) (अनुवादक)।

१६ का.सं.

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