भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 246
२३२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

मधु (शराब) के ब्रह्मचर्य का बाधक न होकर साधक के रूप में निर्देश है। इसके साथ ही वाजसनेयियों के वचन दिये होने से तथा उनके साहचर्य से यह स्पष्ट है कि यहां चरक शब्द चरक शाखा वालों के लिये ही प्रयुक्त हुआ है। काशिकावृत्ति के लेखानुसार भी वैशम्पायन के लिये जो चरक शब्द का व्यवहार हुआ है वह भी चरक शाखा के प्रवर्तक होने से ही है। (वैशम्पायन का नाम चरक है। इसीलिये उसके सब शिष्य भी चरक कहलाते हैं—काशिकावृत्तिः ४-३-१०४)

शुक्ल यजुःसंहिता के ३० अध्याय के पुरुषमेधप्रकरण के १८वें मन्त्र में ‘दुष्कृताय चरकाचार्यम्’ यह मन्त्र खण्ड आता है। उसकी व्याख्या करते हुए हिन्दी भाषा भाष्यकार मिश्रजी ने चरकाचार्य का अर्थ वैद्याचार्य किया है इससे वैद्याचार्य चरक अत्यन्त प्राचीन हुए हैं, ऐसा भी कोई-कोई कहते हैं। परन्तु इस प्रकार व्यक्ति परक अर्थ करने में क्या कारण हो सकता है। पुरुषमेध में चरकाचार्य को दुष्कृत देवता को अर्पण करने के बाद फिर यज्वा किस वस्तु को उपहार में दे। महीधर ने तो केवल चरकों का आचार्य अर्थात् गुरु इस प्रकार सामान्यरूप से अव्यक्त ही विवरण दे दिया है। चरक शाखा वालों का आचार्य यह अर्थ भी प्रकरण विरुद्ध प्रतीत होता है क्योंकि इस प्रकरण में भिन्न-भिन्न जाति तथा भिन्न-भिन्न वृत्ति (आजीविका) वाले पुरुषों का मेधोपहरणीय के रूप में उपादान दिखाई देता है, (अर्थात् यज्ञ में बलि के रूप में संभवतः लाये जाते हुए दीखते हैं) न कि किसी शाखाविशेष के अनुयायी या व्यक्ति विशेष का। इसी मन्त्र में कितव-(जुवारी) आदि दुर्वृत्तिमान् (दुष्ट आचरण वाले) निम्नश्रेणी के लोगों को अपने योग्य देवताओं को अर्पण किया जाता हुआ दिखाई देता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि दुष्कृत देवता को अर्पण किया जाने वाला चरकाचार्य भी कोई दुर्वृत्तिमान ही होना चाहिये। मराठी के ज्ञान कोश (Encyclopedia) के कर्ता का मत है कि यह पद चरक शाखा वालों पर आक्षेप है। परन्तु शतपथ ब्राह्मण में चरक शाखा का बोध कराने वाला चरक पद कई बार दिखाई देने पर भी केवल उस संप्रदाय मात्र का बोधक होता है, न कि उस पर कोई आक्षेप। तैत्तिरीय ब्राह्मण के मन्त्र में भी ‘दुष्कृताय चरकाचार्यम्’ यह पद है, वहां सायन ने चरकाचार्य का बांसों पर खेल करने वालों का आचार्य अर्थात् नट अर्थ किया है किन्तु वहां चरक शाखा के आचार्य का कहीं बोध नहीं होता। कृष्णयजुर्वेद के मन्त्र में दिखाई देने वाले पद का, आक्षेप की दृष्टि से, उस विभाग की चरकशाखा कां आचार्य परक अर्थ करना उपयुक्त नहीं है। इस प्रकार प्रकरण को दृष्टि में रखते हुए सायन की व्याख्या के समान यहां भी उसी प्रकार दुर्वृत्तिमान अर्थ ही उपयुक्त है। नैषध चरित¹ में जिस प्रकार चर का अर्थ स्पश=दूत किया है और चर से स्वार्थ में कन् प्रत्यय करके चरक बनाया है वैसे ही यहां भी स्पश=दूतवृत्ति वालों का प्रधान यह भी अर्थ हो सकता है। इस अवस्था में प्रकरण शुद्धि कितव-(जुवारियों) की संगति तथा दुर्वृत्ति होने से योग्य को योग्य व्यक्ति के लिये ही अर्पित करना चाहिये—इस न्याय के अनुसार दुष्कृत देवता को अर्पण किया जाना उचित प्रतीत होता है। यजुर्वेद के भाष्यकार श्रीस्वामी दयानन्द जी ने खाने वालों का आचार्य (भोजनभट्ट) अर्थ किया है। यह अर्थ ‘चर् गतिभक्षणयोः’ इस धातु से किया प्रतीत होता है।

नागेश भट्ट (व्याकरण के पण्डित) की ‘चरके पतञ्जलिः’ तथा चक्रपाणि की ‘पातञ्जलमहाभाष्यचरकप्रतिसंस्कृतैः’ इन उक्तियों के आधार पर स्थिर की हुई विज्ञानभिक्षु, भोज, भावमिश्र आदि के वचनों को प्रवण मानकर कुछ लोग चरक और पतञ्जलि को एक ही मानते हैं तथा कुछ लोग भिन्न-भिन्न मानते हैं। इस विषय में हमारे विचार निम्न हैं—

१. जिस समय दमयन्ती नल राजा के प्रेम में मूर्च्छित हो गई उसकी सहेलियों ने राजा को इसकी सूचना दी। तब राजा ने मन्त्री तथा वैद्य के सहित प्रवेश किया। उस समय मन्त्री तथा वैद्य दोनों ने राजा से कहा—कन्या के शरीर के रोग के विषय में राजा का कोई दोष नहीं है। हे राजन् ! आप सुनें-अच्छी प्रकार सुने हुए चरक (दूत) के वचन से मैं सब कुछ जानता हूँ कि इस दमयन्ती को नल राजा को दिये विना इसका सन्ताप दूर नहीं होगा अथवा चरक तथा सुश्रुत के वचनों के अनुसार मैं सब कुछ जानता हूँ कि इस दमयन्ती का ताप (ज्वर) नलद (खस) के बिना दूर नहीं हो सकता है। (यह श्लोक द्व्यर्थक है)