काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 942 में से
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पतञ्जलि ने ‘अरुणद्यवनः साकेतम्’ अर्थात् यवनों (यूनानियों) ने अयोध्या पर आक्रमण किया—इस वाक्य द्वारा यूनानियों के आक्रमण को अतीतरूप में तथा ‘पुष्यमित्रं याजयामः’ अर्थात् ‘पुष्यमित्र की स्तुति करते हैं’ इस वाक्य द्वारा अशोक के बाद वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक पुष्यमित्र को वर्तमानरूप से उल्लेख किया है। इस प्रकार पतञ्जलि विक्रम संवत् के प्रारंभ से दो सौ वर्ष पूर्व का निश्चित होता है। भाण्डारकर महोदय ने भी महाभाष्य, पुराण पाश्चात्य इतिहास आदि की आलोचना करके महाभाष्यकार पतञ्जलि का समय ईसा से दो सौ पूर्व निश्चित किया है। ज्यादा प्राचीन न जाकर केवल त्रिपिटक के लेख के अनुसार ही चरक को यदि कनिष्क का समकालीन स्वीकार करें तो कनिष्क और पुष्यमित्र के समय में दो तीन सौ वर्ष का अन्तर होने से क्रमशः इनके समयों में होने वाले चरक और पतञ्जलि को एक मानने की कल्पना समाप्त हो जाती है।
योग और व्याकरण में व्यवहृत पतञ्जलि नाम को वैद्यक में न देकर वहां अन्य ही चरक नाम देने में क्या हेतु हो सकता है। महाभाष्य में ‘गोनर्दीयस्त्वाह’ ऐसा निर्देश होने से भाष्यकार अपने आपको गोनर्द देशवासी प्रकट करता है। ‘एङ् प्राचां देशे’ इस इस सूत्र की व्याख्या में काशिकाकार ने गोनर्दीय उदाहरण दिया है, इससे गोनर्द देश पश्चिम भाग में प्रतीत होता है। भाण्डारकर महोदय ने इसे वर्तमान ‘गोण्डा’ बतलाया है। कश्मीर राज्य के प्राचीन इतिहास में गोनर्द नामक राजा का वर्णन मिलने से कश्मीर ही गोनर्द देश है ऐसा भी किसी-किसी का मत है। यदि भाष्यकार पतञ्जलि ही गोनर्दीय हो और उसका चरक से अभेद हो तो चरकसंहिता के प्रतिसंस्करण में चरक अपने देश गोनर्द का कहीं भी उल्लेख क्यों नहीं करता। चरकसंहिता में पाञ्चाल (रुहेलखण्ड और मेरठ डिवीजन), पंचनद (पंजाब), काम्पिल्य (फर्रुखाबाद जिले में कम्पिल ग्राम) आदि प्रदेशों का उल्लेख है परन्तु वहाँ गोनर्द का कहीं नाम तक भी नहीं है। यदि पतञ्जलि का ही दूसरा नाम चरक हो तो व्याकरणमहाभाष्यकार पतञ्जलि ‘गोनर्दीयस्त्वाह’ कहता हुआ ‘चरकस्त्वाह’ ऐसा एक बार भी क्यों नहीं कहता। इस प्रकार समय, नाम तथा देशों के भेद से ये दोनों पृथक्-पृथक् ही सिद्ध होते हैं। पतञ्जलि के महाभाष्य में बीच-बीच में लोकोक्तियां, समासोक्तियां एवं व्यासोक्तियों का बाहुल्य है तथा उसकी भाषा एक दम दुर्बोध है परन्तु चरक संहिता में चरक द्वारा संभावित लेखांश गंभीर अर्थ वाला होता हुआ भी सरस एवं मनोहर रचना से सहृदय व्यक्तियों के हृदय को आनन्दित करता हुआ अन्य ही शैली का प्रतीत होता है। इस प्रकार लेख की शैली का भेद भी दोनों के अनैक्य (भेद) को ही प्रकट करता है। इसके अतिरिक्त यदि पतञ्जलि ही चरक हो तो व्याकरण के नये तथा विशाल ग्रन्थ महाभाष्य एवं योग के विषय में शीर्षण्य (सर्वश्रेष्ठ) पातञ्जल योगसूत्र का निर्माण करने वाला पतञ्जलि, वैद्यक में अपने प्रतिभायुक्त नये ग्रन्थ का निर्माण न करके केवल दूसरे के लेख पर संस्कारमात्र करके कैसे सन्तोष कर सकता था।
चक्रदत्त की टीका में शिवदास ने ‘तदुक्तं पातञ्जले’ इस उद्देश्य से जो श्लोक दिया है उसके रसविषय प्रतीत होने से, तथा इस श्लोक के चरक संहिता में उपलब्ध न होने से ऐसा प्रतीत होता है कि रसवैद्यक में पतञ्जलि का कोई अन्य ही ग्रन्थ है। रसवैद्यक के विषय में ग्रन्थ लिखने वाला रसायनाचार्य पतञ्जलि अपने दूसरे ग्रन्थ चरकसंहिता में रस धातु आदि औषधों को क्यों नहीं प्रविष्ट करता। चरक में तो धातुओं का केवल नाममात्र आता है तथा पारदका भी केवल एक बार वर्णन है। इसके सिवाय कहीं भी इस विषय का विशेष उल्लेख नहीं किया है, और न इस विषय को अपने रसवैद्यक के दूसरे ग्रन्थ में विस्तृत रूप से देने की सूचना दी है। एक ही वैद्यक के विषय में रसवैद्यक में पातञ्जलतन्त्र नाम से तथा ‘अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते’ के अनुसार कायचिकित्सा में चरकसंहिता इन दो विभिन्न नामों से ग्रन्थ निर्माण का क्या प्रयोजन हो सकता है। जब स्वयं चरक, प्रतिसंस्कर्ता दृढ़बल, प्राचीन टीकाकार भट्टार हरिचन्द्र आदि तथा अन्य वाग्भट आदि आचार्यों ने सब जगह समानरूप से एक ही चरक नाम से व्यवहार किया है, तब अर्वाचीन चक्रपाणि तथा नागेश ने ही क्यों पतञ्जलि नाम से उल्लेख किया है? पतञ्जलि के आयुर्वेद के भी आचार्य होने से योग, व्याकरण तथा वैद्यक में ग्रन्थ निर्माण करने से भोज आदि द्वारा इसका निर्देश न होना ठीक नहीं है।